अक्सर ऐसा होता है कि वास्तविक रूप से पीड़िता कोई पत्नी या फिर अपने
ससुराल वालों को तंग करने के इरादे से या फिर उन से पैसे ऐंठने के इरादे से
झूठी शिकायत करने वाली पत्नी अपने प्रलाप को लेकर महिला अपराध प्रकोष्ठ से
मुखातिब होती है। ऐसी स्थिति में पुलिस विभाग एक तय कार्रवाई का पालन करता
है। इस कार्रवाई को इस आधार पर निर्धारित किया गया है कि झगड़ा पति पत्नी का
है, और सरकार को या राज्य को ऐसे स्थान में अपनी टांग नहीं अड़ानी चाहिए जिस
पर आम तौर से सिर्फ पति और पत्नी का दखल हो। सरकार की यह धारणा है की मियां
बीवी को अपना झगड़ा अपने आप सुलटाने दो या बिगाड़ने दो। जैसे कि भली भांति
ज्ञात है, पत्नी द्वारा शिकायत
पूरे देश में जगह जगह पर मौजूद महिला विरोधी अपराधों से निपटने वाले
महिला प्रकोष्ठों
में से किसी एक पर लगायी जाती है।
बड़ी अच्छी बात है कि पुलिस विभाग ने इतनी अक्लमंदी से काम लिया है और ऐसी
उत्तम प्रक्रिया की परिकल्पना की है। परन्तु फिर भी इस प्रक्रिया का
परिचालन वह पक्ष करता है जो प्रक्रिया को समझौते से दूर ले जाना चाहता है।
ऐसी नीयत रखने वाला पक्ष प्रक्रिया में जब चाहे रूकावट डाल सकता है और
प्रक्रिया को समय की बर्बादी का एक साधन मात्र बना के छोड़ सकता है। ऐसे
पक्ष का रोल अदा करने का पहला मौका हमेशा पत्नी को दिया जाता है।
महिला प्रकोष्ठ प्रक्रिया का पहला कदम प्रकोष्ठ में अपनी पहली मुलाकात के
लिए पहुंची, और हाथ में वो शिकायत लिए जिसे वह दर्ज़ करना चाहती है आई पत्नी
को परामर्श देना होता है। प्रकोष्ठ के कर्मचारी उसे उस के अधिकारों और
सीमाओं से अवगत कराते हैं, और साथ ही उस के पति के अधिकारों और सीमाओं का
भी वर्णन करते हैं। वे उसे प्रक्रिया द्वारा लिए जाने वाले मार्ग से अवगत
कराते हैं। इस चरण पर पत्नी अपनी शिकायत लिखित रूप में प्रेषित करती है।
पत्नी का आक्षेप निरीक्षण हेतु महिला प्रकोष्ठ के वैधानिक (कानूनी)
प्रकोष्ठ भेजा जाता है। वैधानिक प्रकोष्ठ निरीक्षण करने के उपरांत अपना मत
व्यक्त करता है और शिकायत के बारे में अपनी सिफारिशें बताता है। सैद्धांतिक
रूप से सिफारिश मांगते वक्त वैधानिक प्रकोष्ठ से यह अपेक्षा की जाती है कि
वह शिकायत पे कार्रवाई करने या न करने की राय देगा। लेकिन कोई भी व्यक्ति
किसी ऐसी शिकायत के बारे में नहीं जानता है जिस पर कि कार्रवाई न की गयी
हो। तो आप तस्सली से मान लें कि प्रकोष्ठ शिकायत पर कार्रवाई करेगा ही
करेगा। तथापि यदि शिकायत के हिसाब से किसी व्यक्ति विशेष पर कोई कानूनी
जुर्म की कारगुज़ारी नहीं बनती है तो यह मान लें कि ऐसे व्यक्ति को या तो
महिला थाने
द्वारा आरोप पत्रित नहीं किया जायेगा, या फिर जज उसे बरी कर देगा।
वैधानिक कक्ष की सिफारिशों के उपरान्त शिकायत उस पुलिस उपायुक्त या
सहायुक्त को भेजी जाती है जो उस महिला प्रकोष्ठ विशेष की संचालक होती है।
इस चरण पर प्रकोष्ठ जांच अधिकारी की नियुक्ति करता है। यह नियुक्ति सीधे
सीधे प्रकोष्ठ की अध्यक्ष के द्वारा की जाती है। जांच अधिकारी आम तौर से
महिला ही होती है, और उसे साफ़ साफ़ आदेश दिया जाता है कि उसे अपनी
सुहानुभूति पीड़िता महिला (या "पीड़िता" महिला) के साथ रखनी पड़ेगी, हालांकि
ऐसा हमेशा होता नहीं है। जांच अधिकारी सिर्फ वरिष्ठ अफसरों को बनाया जाता
है, जो प्रायः इंस्पेक्टर यानी निरीक्षक स्तर से नीचे नहीं होते, और जिन्हे
काम से काम २० साल का तजुर्बा होता है। अपनी नियुक्ति होने के तुरंत बाद
जांच अधिकारी शिकायतकर्ता महिला और उस के माता पिता से मिलती है। यहाँ वह
उन्हें पुनः पूरी प्रक्रिया वर्णित करती है, और वे उसे कैसे आगे बढ़ा जाए के
बारे में अपनी इच्छा से अवगत कराते हैं।
जांच अधिकारी पति और पत्नी के लिए नोटिस बनाती है, और उस की निकटतम वरिष्ठ
अधिकारी इस नोटिस को हस्ताक्षरित कर के दोनों को भेजती है। यह निकटतम
वरिष्ठ अधिकारी आम तौर से सहायक पुलिस आयुक्त होती है और जैसा कि अब तक
स्पष्ट हो चुका होगा, महिला होती है। इसे भी आदेश दिया गया होता है की
सुहानुभूति पत्नी के लिए आरक्षित रखे। पूरा महिला प्रकोष्ठ पत्नी की ओर
झुके रहने को ऊँचे स्तर से अधिदिष्ट होता है।
प्रकोष्ठ के एक कर्मचारी को नोटिस और उस की लगभग हूबहू नक़ल थमा के पति और
पत्नी के घर रवाना कर दिया जाता है। वह दोनों जगह एक ही दिन दोनों दस्तावेज़
ले के पहुँचता है। इस दिन पति को पहली बार पता चलता है कि वह ४९८अ (498a)
के मामले में आरोपी है। नोटिसों में पति पत्नी दोनों से आग्रह किया गया
होता है कि उन्हें फलां दिन फलां वक़्त पे महिला प्रकोष्ठ पहुँच कर जांच
अधिकारी से मिलना है। इस आग्रह को मात्र आग्रह मान लेना भूल होगी। वास्तव
में यह नोटिस एक कानूनी दस्तावेज़ है और इस में लिखी बात को मानना अनिवार्य
है। यदि पति इस नोटिस की अवहेलना करता है तो उसे आगे जा कर अग्रिम ज़मानत
मिलने में दिक्कत हो सकती है। इधर यह बताना उपयुक्त होगा कि
दहेज़ / ४९८अ (498a) प्रकरणों में अग्रिम ज़मानत
के लिए अर्ज़ी डालने का कोई सही या गलत चरण नहीं होता। काफी हद तक यह इस पर
निर्भर करता है कि आप कितने अनाड़ी हैं या डरे हुए हैं, और अपने
वैवाहिक झगडे में वकीलों
पर कितने पैसे खर्च करने को तैयार बैठे हैं।
जांच अधिकारी से पहली मुलाकात के दिन पति पत्नी उस के सामने इक्कट्ठे
बैठते हैं और अपनी अपनी पीड़ा का बखान सुनाते हैं। वे एक दुसरे पर इलज़ाम और
जवाबी इलज़ाम लगाते हैं। बैठक के अंत पर जांच अधिकारी पत्नी से उसकी इच्छा
पूछती है। जवाब में पत्नी कहती है कि वह समझौता कर के फिर से साथ रहना
चाहती है। समझौता करने के लिए पहले महिला प्रकोष्ठ में काम करने वाले
पारिवारिक सलाहकारों में से एक से मिल कर पति पत्नी दोनों को सलाह लेनी
पड़ेगी। पत्नी यह भी कह सकती है कि वह मध्यस्थता चाहती है। यह उस प्रक्रिया
का नाम है जिस के अंतर्गत पति पत्नी मध्यस्थ के साथ बैठ कर उन शर्तों को तय
करते हैं जिन के आधार पर दोनों पारस्परिक सहमति से विवाह विच्छेद करने को
तैयार हो सकें। इन शर्तों में (आम तौर से) पति की ओर से पूरे और आखरी
मौद्रिक भुगतान की रक़म को तय करना भी शामिल होता है। पत्नी के बाद जांच
अधिकारी पति से मुखातिब होती है और उस से पूछती है कि वह क्या चाहता है।
साथ ही साथ वह उस को कहती है कि पत्नी की बात ना मानने की स्थिति में उस को
प्राथमिकी दर्ज होने की अवस्था में अग्रिम ज़मानत मिलने में कठिनाई आ सकती
है। यहां पर जांच अधिकारी अपनी फाइल में लेखा जोखा लिखती है और दोनों
पक्षों से अपनी फाइल को हस्ताक्षरित करवाती है। यह हाज़री दर्ज करने का
तरीका है। फिर वह दोनों को अपनी निकटतम वरिष्ठ अधिकारी के पास ले कर जाती
है। यह अफसर जांच अधिकारी की बातें सुनती है और उन को सच्चा बयान मान लेती
है। फिर वह पत्नी से बात करती है और आखिर में पति से बात करती है।
अब पति पत्नी से कहा जाता है की वे सलाह कक्ष की ओर प्रस्थान करें। दोनों
वहां जा कर एक क्लर्क यानि लिपिक से मिलते हैं, जो की उन्हें सलाहकार से
मिलने की तारीख और समय बताता है। यह अमूमन एक हफ्ते बाद होता है।
तय दिन पर जब वे वापस आते हैं तो वे अपनी सलाह के लिए निर्धारित सलाहकार से
दो चार होते हैं। सलाहकार पत्नी को रोक लेती है और पति को बाहर इंतज़ार करने
को कहती है। पत्नी अपनी विरह गाथा सुनती है और अपनी मांगें पेश करती है। आम
तौर से वह सास ससुर से अलग घर की मांग करती है और बाकी मांगें श्रद्धानुसार
करती है। पत्नी से यह भी पूछा जाता है कि वह समझौता चाहती है या नहीं चाहती
है। ऐसा इस बात के बावजूद किया जाता है कि सुलह समझौता कार्रवाई की मांग
उसी ने उठाई थी। फिर पति को बुलाया जाता है, फिर वह झगडे का अपना संस्करण
व्यक्त करता है और समझौता चाहने या न चाहने के बारे में अपनी राय बयान करता
है। तत्पश्चात दोनों को बुलाया जाता है और सुलह प्रक्रिया का नतीजा सुनाया
जाता है। कभी कभी उन्हें एक और तारिख दी जाती है, और कभी कभी उन्हें आपसी
रज़ामंदी से विवाह विच्छेद कर लेने की सलाह दी जाती है। सलाहकार द्वारा
दूसरी तारिख दी जाने की सूरत में दोनों फिर से सलाह के लिए आते हैं और इतनी
बार आते है जितनी बार सलाहकार इस प्रक्रिया को ज़रूरी और कामगार माने।
यदि और तारिख नहीं दी जाती तो सलाहकार एक पक्ष से या फिर दोनों पक्षों से
यह लिखत में ले लेती है कि वे परामर्श और सुलह की और अधिक कोशिशें नहीं
चाहते हैं। तदोपरांत पति पत्नी जांच अधिकारी के पास जाते हैं। जांच अधिकारी
दोनों को हफ्ते भर बाद बुलाती है। यदि दोनों में से कोई सा किसी और शहर से
आता है तो वह उन्हें और ज़्यादा लम्बे अरसे के बाद बुलाती है। अगली बार जब
दोनों आते हैं तो उन से बारी बारी से मध्यस्थता के बारे में उन की राय पूछी
जाती है। यदि पत्नी हाँ कहती है तो पति को उस की बात माननी पड़ती है अन्यथा
उसे (जांच अधिकारी के अनुसार) बाद में अग्रिम ज़मानत मिलने में मुश्किल का
सामना करना पद सकता है। अब जांच अधिकारी पत्नी द्वारा दी गयी स्त्रीधन की
उन वस्तुओं की सूची पति को देती है जो कि पत्नी के कथनानुसार पति के कब्ज़े
में हैं। इस के कुछ दिन बाद पति स्वीकृति सूची बना के लाता है। इस सूची में
वह उन वस्तुओं को शामिल करता है जिनका वह अपने कब्ज़े में होना तस्लीम करता
है।
यह फेहरिस्त प्रेषित होने के बाद दोनों को मध्यस्थता प्रकोष्ठ भेजा जाता
है। वहां मौजूद लिपिक उन्हें मध्यस्थता प्रक्रिया से सम्बंधित दृश्य श्रव्य
प्रस्तुति (ऑडियो विज़ुअल प्रेजेंटेशन) की तारिख देता है। यह प्रस्तुति /
कार्यक्रम नगर के मुख्या महिला प्रकोष्ठ में आयोजित किया जाता है। इस
मुख्या प्रकोष्ठ को विशेष पुलिस इकाई (महिला एवं बाल) के नाम से जाना जाता
है। दिल्ली में यह नानकपुरा में स्थित है। दृश्य श्रव्य प्रस्तुति के दिन
शहर भर से लगभग पचास से दो सौ विवाहित जोड़े विशेष पुलिस इकाई (महिला एवं
बाल) आते हैं, और एक उच्च न्यायालय का वकील उन सब की उपस्थिति में
प्रस्तुति प्रेषित करता है। प्रस्तुति लगभग ३ घंटे की होती है। वास्तव में
यह प्रस्तुति समझौते की ओर निर्देशित सामूहिक सलाह ज़्यादा होती है और
प्रस्तुति कम होती है। जन धन को बर्बाद करने का यह एक उम्दा तरीका है। यदि
पुलिस संगठन इसे पहले से ही मंत्रणा परामर्श घोषित कर दे तो लोग बीच में उठ
के जाने के बजाये इस प्रस्तुति पर ज़्यादा ध्यान देंगे। इस सत्र में जो
एकमात्र ठोस जानकारी मिलती है वो यह होती है कि मध्यस्थता सत्रों की गिनती
पांच से अधिक नहीं होगी, और यदि मध्यस्थता सफल होती है तो उस के अंत में
राजीनामा बनाया जायेगा और दोनों पक्षों द्वारा हस्ताक्षरित किया जायेगा।
जनता को यह भी बतलाया जाता है कि प्रकोष्ठ हर ५ में से ३ झगडे निपटा देता
है और उन्हें आगे (अर्थात थाने / अदालत तक, या फिर किन्ही और कानूनी
विकल्पों तक) नहीं जाने देता है।
यह फेहरिस्त प्रेषित होने के बाद दोनों को मध्यस्थता प्रकोष्ठ भेजा जाता
है। वहां मौजूद लिपिक उन्हें मध्यस्थता प्रक्रिया से सम्बंधित दृश्य श्रव्य
प्रस्तुति (ऑडियो विज़ुअल प्रेजेंटेशन) की तारिख देता है। यह प्रस्तुति /
कार्यक्रम नगर के मुख्या महिला प्रकोष्ठ में आयोजित किया जाता है। इस
मुख्या प्रकोष्ठ को विशेष पुलिस इकाई (महिला एवं बाल) के नाम से जाना जाता
है। दिल्ली में यह नानकपुरा में स्थित है। दृश्य श्रव्य प्रस्तुति के दिन
शहर भर से लगभग पचास से दो सौ विवाहित जोड़े विशेष पुलिस इकाई (महिला एवं
बाल) आते हैं, और एक उच्च न्यायालय का वकील उन सब की उपस्थिति में
प्रस्तुति प्रेषित करता है। प्रस्तुति लगभग ३ घंटे की होती है। वास्तव में
यह प्रस्तुति समझौते की ओर निर्देशित सामूहिक सलाह ज़्यादा होती है और
प्रस्तुति कम होती है। जन धन को बर्बाद करने का यह एक उम्दा तरीका है। यदि
पुलिस संगठन इसे पहले से ही मंत्रणा परामर्श घोषित कर दे तो लोग बीच में उठ
के जाने के बजाये इस प्रस्तुति पर ज़्यादा ध्यान देंगे। इस सत्र में जो
एकमात्र ठोस जानकारी मिलती है वो यह होती है कि मध्यस्थता सत्रों की गिनती
पांच से अधिक नहीं होगी, और यदि मध्यस्थता सफल होती है तो उस के अंत में
आपसी रज़ामंदी से विवाह विच्छेद हेतु राजीनामा
बनाया जायेगा और दोनों पक्षों द्वारा हस्ताक्षरित किया जायेगा। जनता को यह
भी बतलाया जाता है कि प्रकोष्ठ हर ५ में से ३ झगडे निपटा देता है और उन्हें
आगे (अर्थात थाने / अदालत तक, या फिर किन्ही और कानूनी विकल्पों तक) नहीं
जाने देता है।
यह बात अपने आप में काफ़ी विचित्र है, क्यूंकि धरा ४९८अ (498a) संज्ञेय
अपराधों की श्रेणी में सम्मिलित है, और इस धरा के अंतर्गत आई हर शिकायत पर
प्राथमिकी दर्ज करना अनिवार्य है। कुछ न्यायालयों और टीकाकारों ने यह विचार
व्यक्त किया है कि पुलिस को पहले प्राथमिकी लिखनी चाहिए और बाद में
मध्यस्थता प्रक्रिया आरम्भ करनी चाहिए। लेकिन ऐसा प्रतीत होता है की इन
माननीय सज्जनों से ज़्यादा ठन्डे दिमाग वाले लोगों की बात मान ली गयी है,
क्यूंकि प्राथमिकी दर्ज हो जाने के बाद उसे रिक्त करने में काम से काम १८
से २४ महीने लग जाते हैं। ठन्डे दिमाग, या फिर वे लोग जो फटाफट कामयाब
कानूनी उगाही के समर्थक हैं।
दृश्य श्रव्य प्रस्तुति के बाद मध्यस्थता की पहली तारिख दी जाती है। इस
तारिख पर उच्च न्यायालय की एक वकील –जो कि उच्च न्यायालय की मुलाज़िम
नहीं होती है अपितु पुलिस की सलाहकार होती है– पति और पत्नी के बीच
मध्यस्थता सत्र संचालित करती है। पहले वह पति और पत्नी दोनों के साथ बात
करती है, फिर सिर्फ पत्नी के साथ, फिर सिर्फ पति के साथ। पत्नी से वह उसकी
मौद्रिक मांग पूछती है और साथ में वो कितना नीचे आने को तैयार है यह भी
पूछती है। पति से वो उस की आर्थिक क्षमता और वित्तीय प्रस्ताव मालूम करती
है। अंत में वो फिर से पति पत्नी दोनों को बुलाती है और ये बयान करती है कि
दोनों मौद्रिक मांग और प्रस्ताव को ले कर समझौते तक पहुँच पाये या नहीं।
फिर वह उन्हें अगली तारिख दे कर रवाना कर देती है। इस तरह पूरे और आखरी
भुगतान का निर्धारण करने के लिए पांच या पांच से कम सत्र आयोजित किये जाते
हैं। ज़ाहिर है कि एक से कम सत्र नहीं हो सकते। यदि इन सत्रों में पक्षों को
कामयाबी मिलती है तो राजीनामा बनाया जाता है। यदि नहीं, तो पति पत्नी को
वापस भेज दिया जाता है।
इस चरण पर जांच अधिकारी पति पत्नी को एक बार फिर डाक द्वारा लिखित ज्ञापन
प्रेषित करती है। दोनों निर्धारित दिवस को उस के समक्ष उपस्थित होते हैं और
फिर से अपने बयान देते हैं। वह फिर उन से समझौते के बारे में उन की राय
पूछती है और नकारात्मक जवाब मिलने पर पति से पत्नी की मांग को मानने के
बारे में उस की राय पूछती है और पत्नी से पति के प्रस्ताव को मानने के बारे
में उस की राय पूछती है। कहीं भी एक राय न मिलने पर वह पति से किसी भी
न्यायालय द्वारा पारित अग्रिम ज़मानत आदेश प्रेषित करने की मांग करती है
(हालांकि पति ऐसा करने को वैधानिक रूप से कतई बाध्य नहीं होता है)। पत्नी
से वह मांग करती है कि वह शादी के छायाचित्र, निमंत्रण पात्र की एक
प्रतिलिपि, और शादी के खर्चे की रसीदें प्रेषित करे।
एक सप्ताह पश्चात दोनों वांछित आलेखों सहित फिर से जांच अधिकारी के सम्मुख
प्रस्तुत होते हैं और जांच अधिकारी फिर से पिछली बार पूछे गए सवाल दोहराती
है। नकारात्मक उत्तर मिलने की सूरत में वह फाइल को अपनी निकटतम वरिष्ठ
अधिकारी को भेज देती है, जो फाइल को और आगे यानी प्रकोष्ठ निदेशक उपायुक्त
या सहायुक्त को भेजती है। यह अधिकारी फाइल को (आक्षेप को प्राथमिकी में
परिवर्तित करने हेतु) शिकायतकर्ता पत्नी के घर के इलाके में स्थित पुलिस
स्टेशन भेजती है, या फिर (यदि शिकायत नगर के मुख्य महिला प्रकोष्ठ में दर्ज
की गयी थी) उस थाने को भेज देती है जो विशेष पुलिस इकाई (महिला एवं बाल) से
संलग्न होता है।