आपराधिक प्रक्रिया के तहत निरस्तीकरण: रोजमर्रा की भाषा में अर्थ
पृष्ठ शीर्षभागदंड प्रक्रिया के प्रावधानों के संदर्भ में निरसन / निरस्तीकरण (क्वॉशिंग) का अर्थ –आम प्रचलन के चलते– भारत में जो बन गया है, वो इस प्रकार है—
किसी उच्च न्यायालय द्वारा –किसी आपराधिक प्रकरण-विशेष में अथवा किसी घरेलू हिंसा प्रकरण-विशेष में – कार्रवाई को, अथवा कार्रवाई के स्त्रोत (अर्थात् प्रथम सूचना रिपोर्ट या घरेलू हिंसा आक्षेप) को अथवा कार्रवाई और उसके स्त्रोत, दोनों को पूर्णतः समाप्त किया जाना।
इसे प्रकरण निरस्तीकरण भी कहा जा सकता है।
प्रकरण निरस्तीकरण निमित्त आवेदन आरोपित / आरोपितों द्वारा प्रेषित किया जाता है, और आमतौर पर सुनवाई की प्रक्रिया के बहुत शुरुआती चरण में प्रेषित किया जाता है –अभियोजन पक्ष द्वारा तर्क प्रस्तुति आरम्भ होने से पहले। इसका ये मतलब कतई नहीं है कि आपराधिक प्रक्रिया के किसी अधिक उन्नत चरण में ऐसा आवेदन प्रेषित नहीं किया जा सकता है।
प्रकरण निरस्तीकरण हेतु प्रेषित कोई याचिका यदि सफल हो जाती है तो वो घरेलू हिंसा के मुकद्दमे से बाहर निकलने का मार्ग बन जाती है। मुकदमे से बच निकलने का यह पहला व्यवहार संभव मार्ग है। यहाँ यह दावा नहीं किया जा रहा है कि प्रकरण निरस्तीकरण (अंग्रेजी में "क्वॉशिंग") मुकदमे से बाहर निकलने का पहला संभव मार्ग है। जीवन में बहुत सी ऐसी चीज़ें हो सकती हैं –जैसा कि किसी शिकायतकर्ता अथवा आरोपित की मृत्यु हो जाना– जो कानूनी अभ्यास में योजनाबद्ध और निष्पादित करी जा सकने वाली वस्तुओं के दायरे से बाहर हैं। इसीलिए यहाँ "व्यवहार्य" शब्द का प्रयोग किया गया है –न कि "संभव" का।
यह भी ध्यान दें कि यहां व्यावहार संभवता का निर्धारण भारतीय आपराधिक कानून के विशाल दायरे के भीतर करी जा सकने वाली सभी चीज़ों को ध्यान में लेते हुए किया गया है, और इसका इस से संकीर्ण किसी दायरे में आवश्यक रूप से लागू होना आवश्यक नहीं है। कोई पैंतरा यदि आपराधिक कानून में संभव है, तो इसका मतलब यह नहीं हो जाता कि वही पैंतरा आपके घरेलू हिंसा प्रकरण की विशेष परिस्थितियों में भी सहज रूप से व्यव्हार संभव बन जाएगा।
निरस्तीकरण (क्वॉशिंग) याचिका दाखिल करवाने में निहित जोखिमों और उसके संभव फ़ायदों का एक आकलन प्रस्तुत लेख में आगे पेश ए ख़िदमत है।
आपराधिक कानून में क्वॉशिंग का ज़िक्र कहाँ पर किया गया है?
पृष्ठ शीर्षभागप्रकरण-निरस्तीकरण (क्वॉशिंग) किसी भी विधिक प्रावधान-विशेष में सीधे रूप में उल्लिखित नहीं है। यह भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 528 द्वारा आच्छादित है। उक्त धारा उच्च न्यायालय की उस शक्ति –जो एक अंतर्निहित शक्ति होती है– की व्याख्या करती है जिसकी बदौलत वो किसी भी आपराधिक मुकदमे में अपनी इच्छा के अनुसार कोई भी आदेश पारित कर सकता है। वस्तुतः भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) दण्ड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की एवज़ में (तत्कालीन भारत सरकार की) हिन्दी शीर्षक वाली किसी भी शै को नाफ़िज़ कर देने की इच्छा से प्रेरित एक प्रतिस्थापन मात्र से अधिक कुछ भी नहीं है, और BNSS की यह धारा-विशेष CrPC की धारा 482 की हूबहू नकल से अधिक कुछ भी नहीं है। दोनों धाराओं का प्रलेख मात्र निम्नलिखित है।
भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) धारा 528 – उच्च न्यायालय की अंतर्निहित शक्तियों की व्यावृत्ति / बचतपृष्ठ शीर्षभाग
(स्त्रोत : indiacode.nic.in)
इस संहिता की कोई भी बात उच्च न्यायालय की ऐसे आदेश देने की अन्तर्निहित शक्तियों को सीमित या प्रभावित करने वाली नहीं समझी जाएगी, जो इस संहिता के अधीन किसी आदेश को प्रभावी करने के लिए या किसी न्यायालय की कार्यवाही का दुरुपयोग निवारित करने के लिए या किसी अन्य प्रकार से न्याय के उद्देश्यों की प्राप्ति सुनिश्चित करने के लिए आवश्यक हो।
दण्ड प्रक्रिया संहिता (CrPC) धारा 482 : उच्च न्यायालय की अंतर्निहित शक्तियों की व्यावृत्ति / बचतपृष्ठ शीर्षभाग
(स्त्रोत : indianemployees.com)
इस संहिता की कोई भी बात उच्च न्यायालय की ऐसे आदेश देने की अन्तर्निहित शक्तियों को सीमित या प्रभावित करने वाली नहीं समझी जाएगी, जो इस संहिता के अधीन किसी आदेश को प्रभावी करने के लिए या किसी न्यायालय की कार्यवाही का दुरुपयोग निवारित करने के लिए या किसी अन्य प्रकार से न्याय के उद्देश्यों की प्राप्ति सुनिश्चित करने के लिए आवश्यक हो।
एक आम जिज्ञासा : घरेलू हिंसा प्रकरण फ़ौजदारी मामले होते हैं या दीवानी मामले?
पृष्ठ शीर्षभागघरेलू हिंसा प्रकरण दीवानी प्रकरण होते हैं। यह सर्वोच्च न्यायालय ने कुनापारेड्डी उर्फ़ नूकाला शंका बालाजी बनाम कुनापारेड्डी स्वर्णा कुमारी एवं अन्य [1] [2] (2016) में निर्णित किया है—
कुनापारेड्डी उर्फ़ नूकाला शंका बालाजी बनाम कुनापारेड्डी स्वर्णा कुमारी एवं अन्य
पृष्ठ शीर्षभागसर्वोच्च न्यायालय
आपराधिक अपील संख्या 516 / 2016
(विशेष अनुमति याचिका (आपराधिक) संख्या 1537 / 2016 से उत्पन्न)
समतुल्य उद्धरण : (2016) 11 SCC 774; AIR 2016 SC 2519;
कुनापारेड्डी उर्फ़ नूकाला शंका बालाजी बनाम कुनापारेड्डी स्वर्णा कुमारी एवं अन्य
निर्णय तिथि : 18/04/2016
सर्वोच्च न्यायालय की एक खंडपीठ द्वारा निर्णीत
सीकरी, ए. के. (J)
अग्रवाल, आर. के. (J)
निर्धारित हुआ (निर्णय के 12वें अनुच्छेद में):
“घरेलू हिंसा अधिनियम की धारा 18 (अत्र) एवं धारा 20 (अत्र) के अंतर्गत राहत की मांग करते हुए दायर याचिका के संदर्भ में कार्रवाई, घरेलू हिंसा अधिनियम की धारा 28 के अनुरूप, संहिता (दण्ड प्रक्रिया संहिता) द्वारा संचालिय होती है। साथ ही, यह विवाद योग्य नहीं है कि ये कार्रवाइयाँ मुख्यतः दीवानी प्रकृति की होती हैं।” (प्रमुखता आपूर्तित)
ध्यान दें कि उपरोक्त प्रलेख यदि अपने इर्द गिर्द के प्रलेख से पृथक कर के उद्धृत किया जाए –जैसा कि यहाँ किया गया है– तो (दुर्भाग्य से) इसकी भाषा थोड़ी अस्पष्ट प्रतीत होती है। इसे इस प्रकार लिखना अधिक स्पष्ट होगा—
“घरेलू हिंसा अधिनियम की धारा 12 के अंतर्गत दायर ऐसी याचिका –जिसमें अधिनियम की धारा 18 एवं धारा 20 के अंतर्गत राहत की मांग की गई हो– के संदर्भ में कार्रवाई अधिनियम की धारा 28 के अनुरूप दण्ड प्रक्रिया संहिता द्वारा संचालिय होती है। साथ ही, यह विवाद योग्य नहीं है कि ये कार्रवाइयाँ मुख्यतः दीवानी प्रकृति की होती हैं।”
वो क्या वजह है जिसने भारत में घरेलू हिंसा प्रकरणों को हाई कोर्टों द्वारा निरस्त (क्वॉश) होने योग्य बना दिया है?
पृष्ठ शीर्षभागऊपर यह संप्रेषित किया जा चुका है कि प्रकरण निरस्तीकरण (क्वॉशिंग) ऐसी संहिताओं के तहत आता है जो आपराधिक प्रक्रिया (criminal procedure) को –न कि दीवानी प्रक्रिया (civil procedure) को– संयंत्रित करती हैं, यानि दण्ड प्रक्रिया संहिता (CrPC) और भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) के। यह भी संप्रेषित किया जा चुका है कि घरेलू हिंसा प्रकरण नागरिक (दीवानी) प्रकरण माने जाते हैं। इन दोनों तथ्यों को इकट्ठे प्राप्त करने पर एक तार्किक व्यक्ति यह निष्कर्ष निकाल सकता है कि घरेलू हिंसा प्रकरणों को निरस्त (क्वॉश) नहीं किया जा सकता है।
लेकिन ऐसा नहीं है। वास्तव में घरेलू हिंसा प्रकरणों का निरस्तीकरण (उच्च न्यायालयों द्वारा) किया जा सकता है। सर्वोच्च न्यायालय ने शौरभ कुमार त्रिपाठी बनाम विधि रावल [3] [4] (2024–2025) (नीचे) में यह निर्णित किया है। इस निर्णय को वी. कृष्णम्मा बनाम गरिमा बैस / बाईस [5] [6] (2025) (नीचे) शीर्षक वाले एक प्रकरण में सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय से बल प्राप्त हुआ है।
शौरभ कुमार त्रिपाठी बनाम विधि रावल निर्णय की तार्किक संरचना यहाँ प्रस्तुत करी जा रही है—
शौरभ कुमार त्रिपाठी बनाम विधि रावल
पृष्ठ शीर्षभागसर्वोच्च न्यायालय
आपराधिक अपील संख्या 2688 / 2025
(विशेष अनुमति याचिका (आपराधिक) संख्या 9493 / 2024 से उत्पन्न)
समतुल्य उद्धरण : 2025 INSC 734;
शौरभ कुमार त्रिपाठी बनाम विधि रावल
निर्णय तिथि : 19/05/2025
सर्वोच्च न्यायालय की एक खंडपीठ द्वारा निर्णीत
ओका, अभय श्रीनिवास (J)
भुइयाँ, उज्जल (J)
निर्धारित हुआ (निर्णय के अनुच्छेद संख्या 23.1 में):
अतैव प्रथम श्रेणी न्यायिक दंडाधिकारी अथवा महानगरीय मैजिस्ट्रेट (यथास्थिति अनुसार) को घरेलू हिंसा अधिनियम 2005 की धारा 12 के अंतर्गत प्रस्तुत आवेदनों की सुनवाई संचालित करने का क्षेत्राधिकार है, जैसा कि घरेलू हिंसा अधिनियम 2005 की धारा 12 तथा धारा 27 को धारा 2 की उपधारा (i) के साथ पढ़ने पर ज्ञात हो जाता है। (प्रमुखता आपूर्तित)
साथ ही निर्धारित हुआ (निर्णय के 26वें अनुच्छेद में):
दण्ड प्रक्रिया संहिता (CrPC) के अंदर दूसरा अध्याय आपराधिक न्यायालयों और कार्यालयों की संरचना से संबंधित है। संहिता की धारा 6 के अनुसार सत्र न्यायालय, प्रथम श्रेणी न्यायिक दंडाधिकारी, महानगरीय क्षेत्रों में महानगरीय मैजिस्ट्रेट, द्वितीय श्रेणी न्यायिक दंडाधिकारी तथा कार्यपालक मैजिस्ट्रेट, ये सभी आपराधिक न्यायालय होते हैं। अतः जो (दो प्रकार के) न्यायालय धारा 12, घरेलू हिंसा अधिनियम 2005 के अंतर्गत आवेदन सुनने, और इसके साथ धारा 18 से 23 तक के अंतर्गत राहत प्रदान करने हेतु क्षमता युक्त होते हैं, यानि प्रथम श्रेणी न्यायिक दंडाधिकारी एवं महानगरीय मैजिस्ट्रेट न्यायालय, वे दोनों आपराधिक न्यायालय ही होते हैं। (प्रमुखता आपूर्तित)
साथ ही निर्धारित हुआ (निर्णय के 26वें अनुच्छेद में ही):
इसी प्रकार, भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) के अंतर्गत भी धारा 6 यह प्रावधान करती है कि सत्र न्यायालय, प्रथम श्रेणी एवं द्वितीय श्रेणी के न्यायिक दंडाधिकारी तथा कार्यपालक मैजिस्ट्रेट, ये सब आपराधिक न्यायालय होते हैं। (प्रमुखता आपूर्तित)
साथ ही निर्धारित हुआ (निर्णय के अनुच्छेद संख्या 30.1 में):
धारा 482 में प्रयुक्त शब्द 'न्यायालय' साफ़ तौर से दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 6 में परिभाषित आपराधिक न्यायालय है, जिसमें न्यायिक दंडाधिकारी अथवा महानगरीय मैजिस्ट्रेट (यथास्थिति अनुसार) की अदालत भी सम्मिलित हैं। (प्रमुखता आपूर्तित)
साथ ही निर्धारित हुआ (निर्णय के 31वें अनुच्छेद में):
धारा 482 के दो भाग हैं। दोनों भाग उच्च न्यायालय की अंतर्निहित शक्तियों को सुरक्षित रखते हैं। (प्रमुखता आपूर्तित)
साथ ही निर्धारित हुआ (निर्णय के 32वें अनुच्छेद में):
धारा 482 का दूसरा भाग उच्च न्यायालय की (उस) अंतर्निहित शक्ति को सुरक्षित रखता है, जिसका उपयोग किसी भी न्यायालय की प्रक्रिया के दुरुपयोग को रोकने हेतु अथवा अन्यथा न्याय के उद्देश्यों को सुरक्षित करने हेतु किया जा सकता है। अतः जहां कोई विद्वान मैजिस्ट्रेट किसी प्रकरण-विशेष में धारा 12(1) के अंतर्गत आवेदन की सुनवाई संचालित कर रहा हो, तो उच्च न्यायालय धारा 482 के दूसरे भाग के अंतर्गत शक्ति का प्रयोग करके न्यायालय की प्रक्रिया के दुरुपयोग को रोकने हेतु अथवा न्याय के हित हेतु आदेश पारित कर सकता है। (प्रमुखता आपूर्तित)
साथ ही निर्धारित हुआ (निर्णय के 32वें अनुच्छेद में ही):
अतः, उच्च न्यायालय दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 482 के अंतर्गत क्षेत्राधिकार प्रयोग कर के घरेलू हिंसा अधिनियम 2005 की धारा 12(1) के अंतर्गत प्रस्तुत आवेदन की कार्रवाई को अथवा धाराओं 18 से लेकर 23 के अनुसार पारित आदेशों को निरस्त (क्वॉश) कर सकता है। (प्रमुखता आपूर्तित)
वी. कृष्णम्मा बनाम गरिमा बैस / बाईस का सार और उसका प्रभावी भाग भी यहाँ (प्रज्ञात्मक कौतूहल की तुष्टि हेतु) प्रस्तुत किए जा रहे है।
वी. कृष्णम्मा बनाम गरिमा बैस / बाईस
पृष्ठ शीर्षभागसर्वोच्च न्यायालय
आपराधिक अपील संख्या 4640 / 2025
(विशेष अनुमति याचिका (आपराधिक) संख्या 9534 / 2025 से उत्पन्न)
समतुल्य उद्धरण :
वी. कृष्णम्मा बनाम गरिमा बैस / बाईस
निर्णय तिथि : 28/10/2025
सर्वोच्च न्यायालय की एक खंडपीठ द्वारा निर्णीत
बिंदल, राजेश (J)
मनमोहन (J)
निर्धारित हुआ (निर्णय के 4थे अनुच्छेद में):
इस न्यायालय द्वारा घोषित उपर्युक्त निर्णय के (अर्थात शौरभ कुमार त्रिपाठी के –मनीष उदार) मद्देनज़र, उच्च न्यायालय द्वारा व्यक्त –प्रकरण-निरस्तीकरण को अस्वीकार्य ठहराने वाला– मत विधिवत सतत नहीं है। (प्रमुखता आपूर्तित)
साथ ही निर्धारित हुआ (निर्णय के 5वें अनुच्छेद में):
उच्च न्यायालय द्वारा पारित विवादित आदेश दर किनार किया जाता है और मामले को तथ्यों पर आधारित पुनर्विचार हेतु लौटाया जाता है।
निरस्तीकरण (क्वॉशिंग) याचिका प्रेषित करने में निहित जोखिमों और उसके संभव फ़ायदों का आकलन
पृष्ठ शीर्षभागकिसी आपराधिक कार्रवाई के निरस्तीकरण (क्वॉशिंग) हेतु आवेदन करने में कुछ जोखिम होते हैं। ये जोखिम सिर्फ़ घरेलू हिंसा प्रकरणों में ही नहीं होते है, अपितु समस्त प्रकार के प्रकरणों में समान रूप से लागू होते हैं।
एक जोखिम यह है कि आवेदक आपराधिक विचारण की सुनवाई पर स्थगन आदेश / रोक आदेश प्राप्त करने में असफल हो जाएगा, जिसके परिणामस्वरूप उसे मूल आपराधिक मुकदमे और निरस्तीकरण याचिका –दोनों को समानांतर संचालित करना पड़ेगा। एक अन्य जोखिम बेकार की मेहनत का है। प्रकरण निरस्तीकरण एक आम राहत नहीं है और असफलता की संभावनाएं मौजूद होती हैं।
सबसे प्रतिकूल संभव स्थिति उस याचिकाकर्ता की है जो पहले तो घरेलू हिंसा कार्रवाई पर स्थगन पाने में असफल हो जाए और तत्पश्चात अनुकूल निर्णय प्राप्त करने में असफल रहे।
संभावित लाभ क्या हैं? तो, आरोपित के दृष्टिकोण से निरस्तीकरण याचिका में सफलता घरेलू हिंसा मामले में (ध्यान दें, निरस्तीकरण मामले में नहीं) सर्वश्रेष्ठ संभव परिणाम है। ऐसी सफलता के विविध लाभ हैं।
यदि आरोपित व्यक्ति जीत जाते हैं, तो वे दोषसिद्धि, जुर्मानों, कारावास, और मुकदमा हारने के अन्य संभावित नकारात्मक परिणामों से बच जाते हैं। ऐसा भी हो सकता है कि में वे अंतरिम भरण–पोषण आवेदन का सामना किए बिना ही अंतरिम भरण–पोषण भुगतान करने से बच जाएँ। इसके अतिरिक्त उन्हें अपना बचाव तैयार करने और तारीख़ों पर हाजिर होने की परेशानियों से भी अधिक अंश तक छुटकारा मिल जाता है। और अगर वे प्रकरण-निरस्तीकरण याचिका की सुनवाई की शुरुआत में ही अपने घरेलू हिंसा मुकदमे की कार्रवाई में स्थगन प्राप्त कर लेवें और बाद में अनुकूल निर्णय भी पा जाएँ (ऐसी युगपत सफलता क्वॉशिंग मामलों में स्वप्नमय आदर्श परिणाम मानी जाती है) तो वे घरेलू हिंसा मुकदमे की समस्त कार्रवाई से ही बच निकल सकते हैं।
संदर्भ सूची :
पृष्ठ शीर्षभाग1) कुनापारेड्डी उर्फ़ नूकाला शंका बालाजी बनाम कुनापारेड्डी स्वर्णा कुमारी एवं अन्य, Criminal Appeal No.516 of 2016, (2016) 11 SCC 774, AIR 2016 SC 2519 (भारतीय सर्वोच्च न्यायालय, 18 अप्रैल 2016), Indiankanoon.org; दिल्ली; बिना तिथि; 16 नवम्बर 2025 को दृष्टिगोचर
2) कुनापारेड्डी उर्फ़ नूकाला शंका बालाजी बनाम कुनापारेड्डी स्वर्णा कुमारी एवं अन्य, Criminal Appeal No. 516 of 2016, (2016) 11 SCC 774, AIR 2016 SC 2519 (भारतीय सर्वोच्च न्यायालय, 18 अप्रैल 2016), sci.gov.in; दिल्ली; बिना तिथि; 16 नवम्बर 2025 को दृष्टिगोचर
3) शौरभ कुमार त्रिपाठी बनाम विधि रावल, Criminal Appeal No. 2688 OF 2025, 2025 INSC 734, (भारतीय सर्वोच्च न्यायालय, 19 मई 2025), Indiankanoon.org; दिल्ली; बिना तिथि; 16 नवम्बर 2025 को दृष्टिगोचर
4) शौरभ कुमार त्रिपाठी बनाम विधि रावल, Criminal Appeal No. 2688 OF 2025, 2025 INSC 734, (भारतीय सर्वोच्च न्यायालय, 19 मई 2025), sci.gov.in; दिल्ली; बिना तिथि; 16 नवम्बर 2025 को दृष्टिगोचर
5) वी. कृष्णम्मा बनाम गरिमा बैस, Criminal Appeal No. 004640 / 2025 (भारतीय सर्वोच्च न्यायालय, 28 अक्टूबर 2025), sci.gov.in; दिल्ली; बिना तिथि; 13 नवम्बर 2025 को दृष्टिगोचर
6) वी. कृष्णम्मा बनाम गरिमा बैस, Criminal Appeal No. 004640 / 2025 (भारतीय सर्वोच्च न्यायालय, 28 अक्टूबर 2025), Indiankanoon.org; दिल्ली; बिना तिथि; 13 नवम्बर 2025 को दृष्टिगोचर