पत्नियों द्वारा पतियों के विरुद्ध दायर किये जाने वाले प्रकरणों की सबसे आम संख्या क्या है?
पृष्ठ शीर्षभागक्या आपकी पत्नी ने आपके विरुद्ध कोई मुक़द्दमा दायर किया है? क्या उसने एक से अधिक मुकदमे दायर किए हैं?
यदि आप अपनी पत्नी की ओर से किसी मुक़द्दमेबाज़ी का सामना कर रहे हैं, तो इस बात की ऊंची संभावना है कि उसमें एक से अधिक प्रकरण हैं। साथ ही, इस बात की भी ऊंची संभावना है कि उसने आपके खिलाफ़ घरेलू हिंसा का आक्षेप भी दायर किया है।
इस लेखक के ऐसे दावे करने का आधार क्या है? खैर, हम फ़िलहाल इस सवाल के जवाब को कि ये बात संभावित क्यों है कि आपकी पत्नी ने आपके विरुद्ध एक से ज़्यादा मुकद्दमे दायर किए हैं, और इस सवाल के जवाब को कि ये बात संभावित क्यों है कि उसने आपके खिलाफ़ घरेलू हिंसा का मुकदमा दायर किया है बाद के लिए छोड़ देते हैं। पहले हम ये पूछते हैं – क्या पत्नियों द्वारा अपने पतियों के खिलाफ़ दर्ज़ करवाए जाने वाले मुकदमों की कोई आम संख्या है?
जवाब यह है कि भारत में पत्नियों द्वारा अपने पतियों के विरुद्ध दर्ज़ करवाए जाने वाले मुकदमों की सबसे आम संख्या 2 है। यह संख्या इतनी अधिक आम है कि यह न सिर्फ़ पत्नियों द्वारा दर्ज़ करवाए जाने वाले मुकदमों की सबसे आम गिनती है, बल्कि यह पत्नियों द्वारा अपने पतियों के खिलाफ़ दायर किये जाने वाले मुकदमों की देशव्यापी औसत गिनती (के बहुत करीब) भी है।
पत्नियाँ साधारणतः पतियों के विरुद्ध दो प्रकरण ही क्यों दायर करती हैं?
पृष्ठ शीर्षभागपूछना लाज़मी है, आपकी पत्नी ने क्यों आपके ऊपर दो मुकदमे दायर किये हैं?
सवाल अच्छा है। ये अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि आपकी पत्नी द्वारा आपके विरुद्ध दो मुक़द्दमे दर्ज़ करवाने के पीछे कारण ये है कि वो एक ऐसे राष्ट्रीय प्रचलन (जिस को अब तलक भांपा नहीं गया है!) का अनुसरण कर रही है, जिस के अंतर्गत पत्नियाँ अपने पतियों पे दो मुकदमे डाल रहीं हैं।
एक और संभावना यह है कि आपने उसके विरुद्ध एक मुकदमा दायर किया है (जो कि तलाक़ का मुक़द्दमा है) और उसने 2 बनाम 1 के अनुपात में प्रत्युत्तर देने का फ़ैसला लिया है। लोगों का ये सोचना (और यहाँ तक कि कहना भी) बहुत आम है कि यदि कोई आपको एक थप्पड़ मारता है तो आपको उसे दो तमाचे रसीद करने चाहिएं। एक इंसान होने के कारण आपकी पत्नी भी अपने परिवेश में विद्यमान लोगों की आम मान्यताओं को धारित रखने के लिए अपने अंदर से बाध्य है।
इसके अलावा ध्यान दें कि आपके एक और उसके दो को मिला के आप दोनों के बीच कुल 3 मुकद्दमे बनते हैं। यदि मुकद्दमे दायर करने के पीछे उस का उद्देश्य आप को व्यस्त रखना था तो सामानांतर प्रकरणों की यह संख्या उस उद्देश्य की पूर्ति करने हेतु पर्याप्त है। और यदि उस का उद्देश्य स्वयं को व्यस्त रखना था तो भी प्रकरणों की यह संख्या एक पर्याप्त संख्या है। यहाँ तक कि यदि उस का उद्देश्य दोनों ही को व्यस्त रखना था, तो इतने मुकद्दमों से उसकी यह अभिलाषा भी पूर्ण हो जाएगी।
3 की बात करें तो यह कहना ग़लत नहीं है कि यह एक सुंदर और गोल अंक है – यहाँ तक कि संख्या रेखा में पहला सुंदर और गोल अंक 3 है। यह मानव मानस में भी एक महत्वपूर्ण संख्या है, क्योंकि अपने जीवनों में लोग "एक दो तीन" वाक्यांश को दौड़ना शुरू करने या कुछ करना शुरू करने के संकेत के रूप में सोचने के आदी हो जाते हैं। अतैव यह बिल्कुल भी आश्चर्यजनक नहीं है कि वे इसे प्रगति का द्योतक समझते हैं। "तीसरी कोशिश में कामयाब होना" न केवल भारत में अपितु दुनिया भर में एक आम लोक-धारणा है। यही कारण है कि लोग संख्या 3 को सौभाग्य से जोड़ते हैं। सांस्कृतिक रूप से भी, हिंदू धर्म में त्रिमूर्ति और तीन लोक जैसे विभिन्न 3 महत्वपूर्ण हैं। इसलिए यह पूर्णतयः संभव है कि भारतीय पत्नियाँ अवचेतन मन के स्तर तक अपने मुकदमों में 3 को एक शुभ संख्या मानने की अभ्यस्त होती हों।
पत्नियों के साधारणतः दो प्रकरण दायर करने की सांख्यिकीय परिकल्पना का समर्थन करते हुए कुछ आँकड़े
पृष्ठ शीर्षभागभारत में पत्नियाँ आमतौर से अपने पतियों के ख़िलाफ़ दो प्रकरण दायर करती हैं, इस निष्कर्ष / धारणा को समर्थित करने वाले कोई अनुभवजन्य आँकड़े हैं कि नहीं हैं?
एक तरह से हाँ, हैं। जहाँ तक इस लेखक को ज्ञात है, अभी तक किसी ने भी (भारत में मुकद्दमे डालने वाली पत्नियों द्वारा अपने पतियों के विरुद्ध प्रेषित करे जाने वाले मामलों की) औसत संख्या की गणना करने की ज़हमत नहीं उठाई है। लेकिन उक्त निष्कर्ष की तथ्यात्मकता विभिन्न प्रकरण-विशेषों के तथ्यात्मक लेखों-जोखों से संबंधित न्यायिक अवलोकनों के साधारण पठन द्वारा समर्थित है। इन में से कुछएक अवलोकन यहाँ नीचे रेखांकित हैं।
सौ. संध्या मनोज वानखड़े बनाम मनोज भीमराव वानखड़े एवं अन्य [1][2] (2010-2011) में देखा गया था कि पत्नी ने 2 प्रकरण दायर किये थे –घरेलू हिंसा से महिला संरक्षण अधिनियम, 2005 के तहत एक घरेलू हिंसा प्रकरण, और भारतीय दंड संहिता धारा 498ए के तहत दहेज़ उत्पीड़न का एक प्रकरण।
जुवेरिया अब्दुल मजीद पटनी (पाटनी?) बनाम आतिफ़ इक़बाल मंसूरी [3][4] (2013-2014) में भी पत्नी ने 2 प्रकरण दर्ज़ करवाए थे। पहला प्रकरण उसके पति, उसकी सास और उसकी ननद के खिलाफ़ था, और उस में भारतीय दंड संहिता की 406 (आपराधिक विश्वासघात की सज़ा) और 498ए धाराएं सम्मिलत थीं। दूसरा प्रकरण घरेलू हिंसा का आपेक्ष था।
शौरभ कुमार त्रिपाठी बनाम विधि रावल [5][6] (2024-2025) में जो पत्नी थी, उसने भी अपने पति के खिलाफ़ 2 प्रकरण दायर किए थे। पति का नाम प्रतीक त्रिपाठी है, और वो शौरभ कुमार त्रिपाठी का भाई है। प्रकरण हैं एक घरेलू हिंसा आपेक्ष, और भारतीय दंड संहिता धारा 498ए, 504, 506 और 34 (जानबूझकर अपमान करना, आपराधिक धमकी की सज़ा, समान इरादा) के तहत एक आपराधिक मामला।
नयना बनाम चिंतनकुमार मैसुरिया (मैसूरिया?) [7][8] (2024-2025) में नयना ने अपने पति के खिलाफ़ तलाक की याचिका और घरेलू हिंसा अधिनयम धारा 12 के तहत घरेलू हिंसा का आवेदन दायर किया था। पति ने जवाबी कार्रवाई करते हुए वैवाहिक अधिकारों की बहाली के लिए याचिका दायर करी थी।
एक मुकद्दमेबाज़ी विशेष में एक हल्का सा पेंच था। पत्नी द्वारा दायर प्रकरणों की संख्या अलबत्ता 2 थी, लेकिन उन 2 में से सिर्फ़ 1 प्रकरण उसने अपने पति के विरुद्ध दायर किया था। रिंकू बाहेती (बहेती? बहेटी? बाहेटी?) बनाम संदेश शारदा [9][10] (2023-2024) में यह दर्ज़ हुआ था कि पत्नी ने 2 आपराधिक मामले दायर किये थे। पहला प्रकरण अपने पति और ससुर के खिलाफ आईपीसी की धारा 354, 376, 377, 420, 498ए, 503, 506 और 509, और सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 की धारा 66 और 67 (छेड़छाड़, बलात्कार की सज़ा, अप्राकृतिक संभोग, धोखाधड़ी और बेईमानी, आपराधिक धमकी, महिला की शीलता भंग करना, कंप्यूटर से संबंधित अपराध, अश्लील सामग्री का प्रकाशन या प्रसारण) के तहत; और दूसरा मामला आईपीसी की धारा 360, 427, 452, 454 और 457 (भारत से किसी व्यक्ति का अपहरण, शैतानी, चोट पहुंचाने की तैयारी करके घर में घुसना, चुपके से घर में घुसना, रात्रि समय में चुपके से घर में घुसना) के तहत अपने पति की कंपनी के एक कर्मचारी के खिलाफ़!
संजय कुमार सिंह बनाम अर्दिजा सिंह [11][12] (2024-2025) में अर्दिजा सिंह ने अपने पति के विरुद्ध तलाक की याचिका और घरेलू हिंसा आवेदन दायर किये थे।
मनीष गोयल बनाम रोहिणी गोयल [13][14] मामले में रोहिणी गोयल ने अपने पति के खिलाफ़ आईपीसी की धाराओं 498ए, 406, और 34 के तहत ऍफ़.आई.आर और घरेलू हिंसा की शिकायत दर्ज़ करवाए थे। एक वर्ष की अवधि के लिए अलग-अलग रहने का इंतज़ार किए बगैर –जो कि हिंदू विवाह अधिनियम में निर्देषित न्यूनतम अवधि है– अपने पति के साथ मिल के आपसी सहमति से तलाक लेने के प्रयास के दौरान रोहिणी ने सर्वोच्च न्यायालय में दावा किया था कि उन्होंने अपने दोनों मामले वापस ले लिए हैं।
उपरोक्त आंकड़ों में आम सांख्यिकीय समानताएं / संयोग
पृष्ठ शीर्षभागतो हमने कुछ ऐसे उदाहरण देखे हैं जिनमें एक पत्नी ने अपने पति के खिलाफ़ एक से ज़्यादा मुकद्दमे दर्ज़ करवाए थे, और इन उदाहरणों में हमें दो स्पष्ट समानताएँ दिखाई देती हैं, जिन में पहली यह है कि पत्नियों की प्रवृत्ति अपने पतियों के विरुद्ध दो मुकद्दमे दायर करना है।
इन मामलों में दूसरी स्पष्ट समानता यह है कि घरेलू हिंसा का इल्ज़ाम पत्नियों द्वारा पतियों के विरुद्ध कानूनी आक्रमणों में प्रायः सम्मिलित किये जाने वाला एक तत्व है।
इस दूसरे स्पष्ट संयोग के विपरीत, यह अनुमान लगाया जा सकता है कि घरेलू हिंसा प्रकरण कभी भी एकल प्रकरण नहीं होते, बल्कि सदैव एक परेशान करने वाले सकल का एक छोटा या बड़ा हिस्सा होते हैं। इस विचार को याद रखें। आगे बढ़ते हैं।
संदर्भ सूची :
पृष्ठ शीर्षभाग1)Sou. Sandhya Manoj Wankhade vs Manoj Bhimrao Wankhade and Others, AIR 2011 SC (CRI) 567, (2011) 2 SCALE 94, 2011 (2) SCC (CRI) 21 (Supreme Court of India, 31 January 2011), Indiankanoon.org; Delhi; Undated; Retrieved on 30th August 2025
2)Sou. Sandhya Manoj Wankhade vs Manoj Bhimrao Wankhade and Others, AIR 2011 SC (CRI) 567, (2011) 2 SCALE 94, 2011 (2) SCC (CRI) 21 (Supreme Court of India, 31 January 2011), sci.gov.in; Delhi; Undated; Retrieved on 30th August 2025
3) Juveria Abdul Majid Patni vs Atif Iqbal Mansoori, (2014) 10 SCALE 738, (2014) 10 SCC 736, II (2015) CCR 559(SC) (Supreme Court of India, 18 September 2014), Indiankanoon.org; Delhi; Undated; Retrieved on 30th August 2025
4) Juveria Abdul Majid Patni vs Atif Iqbal Mansoori, (2014) 10 SCALE 738, (2014) 10 SCC 736, II (2015) CCR 559(SC) (Supreme Court of India, 18 September 2014), shadesofknife.in; Delhi; Undated; Retrieved on 30th August 2025
5)Shaurabh Kumar Tripathi vs Vidhi Rawal, 2025 INSC 734 (Supreme Court of India, 19 May 2025), Indiankanoon.org; Delhi; Undated; Retrieved on 30th August 2025
6)Shaurabh Kumar Tripathi vs Vidhi Rawal, 2025 INSC 734 (Supreme Court of India, 19 May 2025), sci.gov.in; Delhi; Undated; Retrieved on 30th August 2025
7)Nayana vs Chintankumar Maisuria, Transfer Petition (Civil) No. 1908 / 2024 (Supreme Court of India, 31 July 2025), Indiankanoon.org; Delhi; Undated; Retrieved on 30th August 2025
8)Nayana vs Chintankumar Maisuria, Transfer Petition (Civil) No. 1908 / 2024 (Supreme Court of India, 31 July 2025), sci.gov.in; Delhi; Undated; Retrieved on 30th August 2025
9)Rinku Baheti vs Sandesh Sharda, 2024 INSC 1014 (Supreme Court of India, 19 December 2024), Indiankanoon.org; Delhi; Undated; Retrieved on 30th August 2025
10)Rinku Baheti vs Sandesh Sharda, 2024 INSC 1014 (Supreme Court of India, 19 December 2024), sci.gov.in; Delhi; Undated; Retrieved on 30th August 2025
11)Sanjay Kumar Singh vs Ardija Singh, Transfer Petition (Civil) No. 1304 / 2024 (Supreme Court of India, 31 July 2025), Indiankanoon.org; Delhi; Undated; Retrieved on 30th August 2025
12)Sanjay Kumar Singh vs Ardija Singh, Transfer Petition (Civil) No. 1304 / 2024 (Supreme Court of India, 31 July 2025), sci.gov.in; Delhi; Undated; Retrieved on 30th August 2025
13)Manish Goel vs Rohini Goel, AIR 2010 Supreme Court 1099, (2010) 2 SCALE 332, 2010 (4) SCC 393 (Supreme Court of India, 05 February 2010), Indiankanoon.org; Delhi; Undated; Retrieved on 30th August 2025
14)Manish Goel vs Rohini Goel, AIR 2010 Supreme Court 1099, (2010) 2 SCALE 332, 2010 (4) SCC 393 (Supreme Court of India, 05 February 2010), sci.gov.in; Delhi; Undated; Retrieved on 30th August 2025