पत्नियों के घरेलू हिंसा हमले : आंकड़ा विश्लेषण – 3 मुकदमे दायर करने वाली पत्नियाँ

Statistical Patterns in DV Attacks by Wives: Wives who file 3 Cases
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पत्नियों द्वारा 3 प्रकरण दायर करने का सांख्यिकीय रुझान और उक्त रुझान का असर

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अब हम एक उभरती हुई रीति पर चर्चा करेंगे और इसके सांख्यिकीय पहलू की जांच करने का प्रयास भी करेंगे। यह रीति है पत्नियों द्वारा अपने पतियों के खिलाफ़ तीन मुकदमे दर्ज़ करवाना।

पत्नियों द्वारा उक्त संख्या में प्रकरण दायर करने की बढ़ती प्रवृत्ति और इस के साथ ही पतियों की तलाक के मुकदमे दायर करने की आदत के कारण ऐसी स्थिति पैदा हो गई है जिसमें पतियों और पत्नियों के बीच देश भर में कुलजोड़ जितनी मुकदमेबाज़ियाँ चल रहीं हैं, उन में फ़ी-मुकद्दमेबाजी मुकदमों की औसत संख्या अब 4 की ओर बढ़ रही है।

ऐसे कई मामले हमारी अदालतों में अक्सर सामने आते रहते हैं जिनमें यह कुल संख्या 4 से कम होती है –और हम इस लेखन प्रयास में पहले भी ऐसी कुछ स्थितियों की जाँच कर चुके हैं– लेकिन यहाँ हम औसत कुल संख्या, वर्तमान औसत कुल संख्या की बात कर रहे हैं।

ध्यान दें कि ऐसी मुकदमेबाज़ियाँ भी होती हैं जो इस औसत (जिसकी यहाँ परिकल्पना की जा रही है) के दूसरी ओर होती हैं। उन स्थितियों में कुल मुकद्दमों की संख्या 4 से ज़्यादा होती है और उनमें से कुछ (यानि कुछ मुकद्दमेबाज़ियाँ) विस्तार से देखने लायक हैं।

लेकिन हम अभी इतना आगे नहीं बढ़ेंगे। फ़िलहाल हम सिर्फ़ ऐसी मुकदमेबाज़ियों के उदाहरण ही देखेंगे जिनमें पत्नी ने पति के ख़िलाफ़ 3 मामले दायर किए थे।


पत्नी द्वारा पति के विरुद्ध 3 प्रकरण दायर करने वाली मुकद्दमेबाज़ियों के उदाहरण

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आइये ऐसे कानूनी हमलों के कुछ उदाहरण देखें।


एकता भटनागर बनाम आशुतोष भटनागर

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इस प्रकार की वैवाहिक मुकदमेबाज़ी के हमारे पहले उदाहरण का विवरण एकता भटनागर बनाम आशुतोष भटनागर [1][2] (2025) में देखा जा सकता है। इस में एकता भटनागर ने अपने पति के खिलाफ़ एक घरेलू हिंसा आपेक्ष, भारतीय दंड संहिता की धाराओं 498a, 323 (साधारण चोट पहुँचाने पर दंड), 504 और 506 के तहत दहेज़ का प्रकरण और सीआरपीसी की धारा 125 के तहत भरण-पोषण के लिए एक याचिका दायर करी थी। (उसने अपनी भरण-पोषण याचिका के बाद उसी कानूनी प्रावधान के तहत एक और भरण-पोषण याचिका दायर करी थी। इस लेखक द्वारा इन दोनों याचिकाओं को एक ही माना जा रहा है क्योंकि एक जोड़ी सीआरपीसी 125 याचिकाओं का उद्देश्य और अंतिम परिणाम उस प्रकार की इकलौती याचिका के समान ही है।) एकता ने प्रत्येक केस दायर करने और प्रत्येक उत्तरगामी केस को दायर करने के बीच अवकाश लिया। उसने वर्ष 2017, 2020, 2022 और 2023 में प्रति वर्ष एक नए कानूनी हमले की दर से अपनी शिकायतें, याचिकाएँ और अपीलें दायर करीं। उसके पति ने मुआमले को सहजता से लिया और 2024 तलक एक अदद तलाक याचिका दायर करने की ज़हमत तक उस ने नहीं उठाई।


संध्या आशीष लोहार बनाम आशीष धनसिंग लोहार

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संध्या आशीष लोहार बनाम आशीष धनसिंग लोहार [3] [4] (2024-2025) में पत्नी ने अपने पति के खिलाफ एक सादा दहेज़ का प्रकरण, 1 भरण-पोषण का मुकदमा (सीआरपीसी की धारा 125 के तहत), और 1 घरेलू हिंसा की शिकायत दायर करी थी –कुल 3 मामले। पति ने सूरत में वैवाहिक अधिकारों की बहाली के लिए 1 याचिका (जिसे आमतौर पर आरसीआर याचिका कहा जाता है) दायर की थी। इसके बाद पत्नी ने सुप्रीम कोर्ट में एक स्थानांतरण याचिका दायर करी, इस आशय से कि पति का मुकदमा सूरत से औरंगाबाद स्थानांतरित किया जाए। तदोपरांत सुप्रीम कोर्ट ने उनके विवाह-सम्बन्ध को भंग कर दिया।


जितेंद्र @ चिंकू बनाम बबली @ मानवी एवं अन्य

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जितेंद्र @ चिंकू बनाम बबली @ मानवी एवं अन्य [5] [6] (2024-2025) में बबली ने अपने पति के खिलाफ 3 मामले दर्ज़ करवाए थे। ये मामले थे: सीआरपीसी की धारा 125 के तहत भरण-पोषण याचिका, घरेलू हिंसा से महिलाओं का संरक्षण अधिनियम की धारा 12 के तहत घरेलू हिंसा आपेक्ष, और भारतीय दंड संहिता की धारा 498a / 406 / 34 के तहत एक प्राथमिकी।


श्री चंदन कुमार साहू एवं अन्य बनाम श्रीमती पुतुल साहू

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जहाँ तक पत्नी द्वारा अपने पति के विरुद्ध दर्ज़ करवाए गए मामलों की संख्या और प्रकार का संबंध है, श्री चंदन कुमार साहू एवं अन्य बनाम श्रीमती पुतुल साहू [7] [8] (2018-2019) का मामला उपरोक्त वैवाहिक मुकद्दमेबाज़ी के समान है। पुतुल साहू एकता भटनागर (ऊपर) से भी धीमी थी। उसे अपने कारतूस दागने में पूरे 8 साल लग गए। उस ने चंदन कुमार साहू के खिलाफ़ अपना पहला प्रकरण –जो कि दफ़ा ४९८a समेत आईपीसी की विभिन्न धाराओं के तहत दहेज़ का मुकदमा था– 2010 में दायर किया था। इसके बाद उसने 2011 में सीआरपीसी की धारा 125 के तहत एक भरण-पोषण याचिका और उस के सात साल बाद 2018 में एक घरेलू हिंसा शिकायत दायर करी।


पत्नियों द्वारा अपने पतियों के विरुद्ध 3 मामले दर्ज़ करवाने के उदाहरणों में एक प्रमुख समानता

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उपरोक्त सभी उदाहरणों में, और भारत भर में और भी असंख्य मुकदमों में एक उल्लेखनीय और सबसे महत्वपूर्ण समानता यह है कि जो पत्नियाँ अपने पतियों के विरुद्ध 3 मुकद्दमे दर्ज़ करवाती हैं, वे भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 498a के तहत दहेज़ का 1 मुकदमा, घरेलू हिंसा से महिला संरक्षण अधिनियम, 2005 (PWDVA 2005) के तहत 1 घरेलू हिंसा का मुकदमा और सी आर पी सी (CrPC) की धारा 125 के तहत 1 भरण-पोषण का मुकदमा दर्ज़ करवाती हैं।


पत्नियाँ अपने पतियों के विरुद्ध 3 प्रकरण क्यों दर्ज़ करवाती हैं?

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अब हम इस चरण पर पहुँच गए हैं कि यह समझने की कोशिश करें कि एक पीड़ित / असंतुष्ट पत्नी अपने पति के खिलाफ 3 प्रकरण क्यों दर्ज करवाती है।

सबसे पहले यह स्पष्ट कर दिया जाए कि आमतौर पर ऐसी स्थिति के उत्पन्न हो जाने का कोई एक कारण नहीं होता है। लेकिन अगर आप इस मुद्दे को गहराई से नहीं समझना चाहते हैं, तो इसका उत्तर संक्षिप्त और सरल है। पत्नियाँ गुमराह होने और अपने पतियों के प्रति दुर्भावना रखने के कारण ऐसा करती हैं।

और यदि आप इस घटना के पीछे के सभी संभावित कारणों को जानना चाहते हैं, तो आगे पढ़ते जाइये।

हमेशा और हर बार जब भी पहली बार कोई गुमराह या सचमुच पीड़ित पत्नी किसी वकील के पास जाती है, तो उसे बताया जाता है कि वह तलाक का मुकदमा, दहेज़ का मुकदमा, घरेलू हिंसा का मुकदमा या भरण-पोषण का आवेदन दायर कर सकती है –क्योंकि ये वैवाहिक मुकदमेबाज़ी में चार सबसे ज़्यादा आम विकल्प हैं। कहने की ज़रूरत नहीं कि उसे यह भी बताया जाता है कि वो चाहे तो एक, दो, तीन या सभी चारों मुकदमे दायर कर सकती है –औरअपनी पसंद की संख्या के किसी भी क्रमसंचय में दायर कर सकती है।

ये बात दुनिया में मशहूर है जॉर्ज मैलरी ने माउंट एवरेस्ट पर चढ़ने के अपने इरादे के बारे में पूछे गए सवाल का जवाब देते हुए कहा था, "क्योंकि वो वहाँ है।" ऐसी बहुत सी महिलाएँ वे सभी तीन मामले दायर करना चुनती हैं जो वे दर्ज़ करवा सकती हैं (उनके पति आमतौर पर पहले ही तलाक का मामला दर्ज कर चुके होते हैं)। ऐसा करने के पीछे उनका तर्क यह होता है कि एक ऐसा विकल्प मौजूद है। यह तर्क थोड़ा मूर्खतापूर्ण प्रतीत होता है। यहाँ यह ध्यान देने योग्य है कि जॉर्ज मैलरी के तर्क ने भी उन्हें एक मूर्खतापूर्ण दिशा में धकेल दिया था, जैसा कि बाद में पता चला।

महिलाओं का एक अलग और बहुत बड़ा समूह ऐसा इस मुख्य (एकमात्र नहीं) कारण से करता है कि वे ऐसा कर सकती हैं। यह कारण, कारण कम और सफ़ाई ज़्यादा है, और वो भी एक घटिया सफ़ाई। वास्तव में ये वो ही सफ़ाई है जो अत्याचारीअत्याचार करने की देते हैं।

पत्नियों द्वारा तीन मुकदमे दायर करवाए जाने का एक और कारण यह है कि "ज़्यादा" को लगभग सार्वभौमिक रूप से ("कम" से) बेहतर माना जाता है।

इन सभी अलग-अलग मामलों को दर्ज़ करवाने के पीछे पत्नियों के प्रेरक क्या होते हैं, इस विषय पर विचार करने पर अपना वक़्त खर्च करना भी हमारे लिए लाभप्रद है। जिन लोगों से वे नफ़रत करती हैं, उनके खिलाफ़ आपराधिक मामले दायर करने के पीछे विभिन्न संभव मनोवैज्ञानिक कारक हैं। ऐसे कारकों की फ़ेहरिस्त में ईर्ष्या, लालच और बदला लेने की ज़रुरत गैरमामूली कारक हैं। इन तीनों में से आखिरी कारक आमतौर पर एक काल्पनिक ज़रूरत से ज़्यादा कुछ नहीं होता है। बेरोज़गार महिलाओं, मानसिक विकारों से पीड़ित महिलाओं, और मादक द्रव्यों के सेवन की प्रवृत्त महिलाओं के प्रसंग में दो अन्य संभावित प्रेरणाएँ हैं, नामतः कुछ करने की चाहत, और इस चाहत से मिलती-जुलती जीवन में एक दिशा पाने की चाहत। ये अंतिम दो प्रेरक अवचेतन प्रेरक हैं, क्योंकि इन से प्रेरित होने वाले व्यक्तियों को इन के अस्तित्व की भनक भी नहीं लगती है।

दहेज़ प्रकरणों में महिलाओं को अपने पतियों और ससुराल वालों को जेल में डालने का –या कम से कम संभावित रूप से जेल में डालने का– मौका मिलता है। उन्हें अपने पतियों की दुर्दशा का आनंद लेने का मौका तब मिलता है जब उनके पतियों को एक अच्छे वकील की तलाश करनी पड़ती है और महिला प्रकोष्ठ की तारीखों, ज़मानत की सुनवाईयों और अदालती तारीखों पर जाना पड़ता है। इसके अतिरिक्त उन्हें मामला सुलझने पर पैसा भी मिलता है।

भरण-पोषण के मामलों में निहित नियमित आय प्राप्त करने की जो संभावनाएं होती हैं, वे मन को लालायित करती हैं। अतिरिक्त आनंद यह देखने से मिलता है कि अदालतें पहले तो उन लोगों से (अर्थात उनके पतियों से) खर्चा वसूली करती हैं जिनसे वे नफ़रत करती हैं, और उस के बाद उन्हें भुगतान करवाती हैं।

घरेलू हिंसा के मुकदमे उन्हें अपने पतियों और ससुराल वालों को परेशान करने और अदालतों से उन्हें संभावित सज़ा दिलाने का मौका देते हैं। उनमें नियमित आय प्राप्त शुरू हो जाने की संभावना भी विद्यमान होती है। अंतिम महत्वपूर्ण बात यह है कि संपत्ति पर नियंत्रण पा लेने की संभावना भी ऐसे अदालती मामलों में भाग लेने वाली पत्नियों की पहुँच में रहती है।

संक्षेप में, तीनों प्रकार के आपराधिक मामलों में संभावनाएँ आकर्षक हैं। कुछ लोग प्रलोभनों के आगे नहीं झुकते, और कुछ लोग झुक जाते हैं। शेक्सपियर इस तथ्य से वाकिफ़ था, और वो हैमलेट के अमर शब्दों को लिखते समय शायद गलत नहीं था: "कमज़ोरी, तेरा नाम नारी है!" इसलिए यह आश्चर्य की बात नहीं है कि पत्नियाँ अपने सामने रखे गए तीनों ही विकल्पों को चुन लेना पसंद कर लेती हैं।


संदर्भ सूची :

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1)Ekta Bhatnagar vs Ashutosh Bhatnagar, Transfer Petition (Civil) No. 405 / 2025 (Supreme Court of India, 24 July 2025), Indiankanoon.org; Delhi; Undated; Retrieved on 08th September 2025

2)Ekta Bhatnagar vs Ashutosh Bhatnagar, Transfer Petition (Civil) No. 405 / 2025 (Supreme Court of India, 24 July 2025), sci.gov.in; Delhi; Undated; Retrieved on 08th September 2025

3) Sandhya Ashish Lohar vs Ashish Dhansing Lohar, Transfer Petition (Civil) No. 2459 / 2024 (Supreme Court of India, 12 August 2025), Indiankanoon.org; Delhi; Undated; Retrieved on 08th September 2025

4) Sandhya Ashish Lohar vs Ashish Dhansing Lohar, Transfer Petition (Civil) No. 2459 / 2024 (Supreme Court of India, 12 August 2025), sci.gov.in; Delhi; Undated; Retrieved on 08th September 2025

5)Jitender @ Chinku vs Babli @ Manvi and Another, Criminal Revision Petition 636 / 2024, 2025 DHC 3690 (Delhi High Court, 08 April 2025), Indiankanoon.org; Delhi; Undated; Retrieved on 08th September 2025

6)Jitender @ Chinku vs Babli @ Manvi and Another, Criminal Revision Petition 636 / 2024, 2025 DHC 3690 (Delhi High Court, 08 April 2025), delhihighcourt.nic.in; Delhi; Undated; Retrieved on 08th September 2025

7)Sri Chandan Kumar Sahoo and Others vs Smt. Putul Sahoo, Criminal Revision 2981 / 2018, (Calcutta High Court, 22 January 2019), Indiankanoon.org; Delhi; Undated; Retrieved on 08th September 2025

8)Sri Chandan Kumar Sahoo and Others vs Smt. Putul Sahoo, Criminal Revision 2981 / 2018, (Calcutta High Court, 22 January 2019), calcuttahighcourt.gov.in; Delhi; Undated; Retrieved on 08th September 2025






द्वारा लिखित
मनीष उदार द्वारा प्रकाशित।

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अंतिम अद्यतन १० सितंबर २०२५ को किया गया