मुकदमेबाज़ी में बेकाबू हो जाने वाली पत्नियाँ: घरेलू हिंसा मुकदमेबाज़ी आंकड़ों में कुछ दिलचस्प अपवाद

Wives who go Berserk Litigating: Interesting Outliers in DV Litigation Statistics
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पतियों के खिलाफ़ 3 से अधिक मुकदमे दायर करने वाली पत्नियों में समानताएं

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हमने पिछले दो लेखों में दो सांख्यिकीय रीतियों की जाँच की है। इन दो रीतियों में पहली रीति पत्नियों द्वारा अपने पतियों के विरुद्ध दो मुकदमे दायर करने की रीति है, और दूसरी रीति पत्नियों द्वारा अपने पतियों के विरुद्ध तीन मुकदमे दायर करने की रीति है। मुकदमेबाज़ी में सांख्यिकीय रीतियों की पड़ताल करने वाले हमारे लेखों की श्रृंखला में यह तीसरा लेख है, इसलिए लोगों का यह अपेक्षा करना स्वाभाविक होगा कि लेखक उन स्थितियों पर चर्चा करेगा जिनमें पत्नियों ने अपने पतियों के विरुद्ध चार मुकदमे दायर किए हैं।

लेकिन (लेखक अपने शोध से जो समझ पाया है, उसके आधार पर) यह कहा जा सकता है कि इस प्रकार की स्थितियाँ इतनी आम नहीं हैं कि उनकी श्रेणी को एक रीति कहा जा सके। ऐसे मुकदमे जिनमें पत्नियाँ पतियों के विरुद्ध चार मुकदमे दायर करती हैं, दुर्लभ हैं।

ऐसी मुकदमेबाज़ियों, जिनमें पत्नियों ने अपने पतियों के खिलाफ़ चार से ज़्यादा मुकदमे दायर किए हों, के उदाहरणों से टकरना उक्त श्रेणी की मुकदमेबाज़ियों से टकरने से ज़्यादा आम है। ऐसी स्थितियों के प्रत्येक दृष्टान्त-विशेष में पत्नियों द्वारा दर्ज़ करवाए गए मामलों की संख्या सामान्यतः 6 से लेकर एक दर्जन से अधिक तक रहती है।

फलतः यह कहा जा सकता है कि अपने पतियों के खिलाफ़ तीन से अधिक प्रकरण दायर करने वाली पत्नियों में तीन समानताएं होती हैं—

1) वे 4 मुकदमे नहीं दायर करती हैं।

2) वे कम से कम आधा दर्जन प्रकरण दर्ज़ करवाती हैं।

3) अपने पतियों के विरुद्ध मुकदमे दायर करना कब बंद करना है, ये बात वे समझ नहीं पाती हैं।

ऐसी स्थितियाँ एक सवाल उठाती हैं। क्यों?

पत्नियों के इतनी बड़ी मात्राओं में मुकदमों को दायर करने के पीछे का कारण

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(पिछले भाग के अंत से जारी) जी। क्यों। अपितु कोई ऐसी "क्यों" नहीं जिसका जवाब देना मुश्किल हो।

ऐसी स्थिति केवल एक ही परिस्थिति में उत्पन्न हो सकती है। संबद्ध पत्नी में दिमागी बीमारी का विद्यमानत्व।


मानसिक रोग अत्यधिक प्रकरण दायर करने की एकमात्र संभव वजह क्यों है

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(पिछले भाग के अंत से जारी) इस उत्तर से एक प्रश्न उठता है। यह लेखक ऐसा क्यों कह रहा है कि एक पत्नी द्वारा अपने पति के विरुद्ध प्रचुर संख्या में प्रकरण दर्ज़ करवाने के पीछे मानसिक बीमारी ही एकमात्र संभव कारण है? आपको याद होगा कि लेखक ने गत दो लेखों में क्रमशः पत्नियों द्वारा दो मुकदमे दायर करने और तीन मुकदमे दायर करने की सांख्यिकीय पद्धतियों के कारणों को समझाने का प्रयास किया था। इन दोनों सांख्यिकीय रीतियों के पीछे हमें एक खास तर्क मिल गया था (या दो खास तर्क मिल गए थे)। लेकिन एक पत्नी के अतार्किक व्यवहार के पीछे कौन सा दाम्पत्यिक तर्क हो सकता है? इस तरह के व्यवहार के पीछे कोई अभिज्ञेय तर्क नहीं होता है। इस के बाद जो एकमात्र आकलन बच जाता है वो यह है कि मानसिक बीमारी के कारण ये पत्नियाँ यह तय नहीं कर पाती हैं कि उन्हें अपने पतियों के विरुद्ध प्रकरण दर्ज़ करवाते जाने पर कब रोक लगानी चाहिए।


ऐसी मुकदमेबाज़ियों जिनमें पत्नियों द्वारा पतियों के विरुद्ध विशाल संख्याओं में मामले दायर किए गए के कुछ उदाहरण

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आइये अब ऐसी पत्नियों द्वारा ढाए गए अत्याचारों के कुछ उदाहरणों पर नज़र डालें।


विशाल शाह बनाम मोनालिशा गुप्ता

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एक दिलचस्प मामला विशाल शाह बनाम मोनालिशा गुप्ता [1] [2] (2023-2025) का है। उक्त मामले में पत्नी मुकदमेबाज़ी को एक ऐसे बेतुके स्तर पर ले गई थी, जो (एक उदाहरण को छोड़कर, जिसका विवरण नीचे दिया गया है) अभूतपूर्व था, और शायद अप्रत्याशित भी। संबंधित पति ने अमेरिका में पत्नी के साथ रहते हुए दो बार स्थानीय पुलिस को टेलीफ़ोन करके पत्नी द्वारा अपने पर किए गए शारीरिक हमलों की शिकायत की थी। परिणामस्वरूप पत्नी पर उस देश में दूसरे दर्ज़े के शारीरिक हमले का इल्ज़ाम नाफ़िज़ किया गया था। तत्पश्चात वे भारत लौट आए, और पति अपनी पत्नी के बिना वापस चला गया।

इसके बाद पत्नी ने अपने पति के खिलाफ़ इतने फ़ौजदारी और दीवानी मामले दायर किए कि न्यायमूर्ति विक्रम नाथ ने 20 फरवरी 2025 के अपने फ़ैसले में उनकी सटीक गिनती देने की कोशिश भी करने की ज़हमत नहीं उठाई। उसके हमले में उसके पति और परिवार के विभिन्न सदस्यों के खिलाफ आईपीसी की धारा 498A, 307, 323, 324, 406, 506 दहेज़ का प्रकरण शामिल था; एक और आपराधिक मामला (अपने पति और (पिछले मामले से ज़्यादा) परिवार के सदस्यों के खिलाफ़) आईपीसी की धारा 405, 406, 407, 420, 379, 499, 500, 324 और 506 के तहत; और एक और आपराधिक मामला आईपीसी की धारा 379 (चोरी) के तहत पति, सास और एक ननद के ख़िलाफ़। उसने एक आरसीआर याचिका भी दायर की थी(!), शायद अपने पति और उसके परिवार के ज़ख्मों पर नमक छिड़कने के लिए।

इसके बाद पति की विवाहित बहन ने पत्नी के ख़िलाफ़ एक छुटमुट आपराधिक मामला दायर किया था, जिसके जवाब में पत्नी ने चौथा घरेलू हिंसा प्रकरण दायर कर दिया था!!

इस मुकदमेबाज़ी में अपील और पुनरीक्षण सहित कुल मामलों की संख्या स्पष्ट नहीं है, लेकिन यह 10 से अधिक थी। शब्द 'काउंटरब्लास्ट' (अर्थात जवाबी धमाका) (जिसका उपयोग न्यायमूर्ति विक्रम नाथ ने अपने फैसले में एक या दो बार किया था) उक्त मामले में पत्नी द्वारा किए गए कृत्य का वर्णन करने के लिए अपर्याप्त है।


नवीन कोहली बनाम नीलू कोहली

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नवीन कोहली की हृदय विदारक कहानी संक्षिप्त लेकिन पर्याप्त विस्तार में नवीन कोहली बनाम नीलू कोहली [3] [4] (2024-2006) में वर्णित की गई है। इस प्रकरण का फ़ैसला सर्वोच्च न्यायालय ने 21 मार्च 2006 को सुनाया था। इस मामले में पत्नी द्वारा प्रतिपादित आरोपों का जाल इतना व्यापक था कि इलाहाबाद उच्च न्यायालय के एक फ़ैसले के खिलाफ़ उसके पति द्वारा प्रेषित अपील पर विचार करने के लिए सर्वोच्च न्यायालय की एक पूर्ण पीठ का गठन करना पड़ गया था।

यह मामला न केवल घरेलू हिंसा कानून बनने से पहले का है, बल्कि इसकी जड़ें वैवाहिक मुकदमेबाज़ी की अवधारणा के (पिछले दस-पंद्रह साल से दिखने वाले बहुत बड़े पैमाने पर) प्रचलन में आने से दो पीढ़ियों पहले के एक विवाद में निहित हैं। इसी लिए यह स्पष्ट रूप से दर्शाता है कि पर्याप्त रूप से प्रेरित पत्नियाँ घरेलू हिंसा कानून (पीडब्ल्यूडीवीए PWDVA, 2005) बनने से भी बहुत पहले के समय-खंड से अपने पतियों के खिलाफ़ अमर्यादित मात्रा में मुकदमे दायर करती आ रही हैं; और बहुआयामी दाम्पत्यिक मुकदमेबाज़ी एक ऐसा प्रचलन नहीं है जो दुर्भावनाग्रस्त वादी पत्नियों के वर्तमान युग में, या यहां तक ​​कि इससे कुछ पहले की अवधि में उभरा हो। इसके अतिरिक्त ये वाकया एक ऐसा प्रमाण-पिंड भी है जो इस अनुमान का समर्थन करता है कि लिंगों के बीच युद्धस्थिति आदिकाल से विद्यमान है।

महिला विषैली थी, और वो श्री कोहली के साथ विवाहित क्यों रहना चाहती थी, यह समझ से परे है। उसके कानूनी कार्यकलापों को एक सूची (जैसा कि न्यायमूर्ति दलवीर भंडारी ने किया) से अधिक सरल किसी भी तरीके से स्पष्ट रूप से वर्णित नहीं किया जा सकता है। उन्हें यहाँ संक्षिप्त और थोड़े संशोधित रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है—

1) पत्नी ने पति के विरुद्ध थाना कोहना (कानपुर) में धारा 379/323 आईपीसी के अंतर्गत ऐफ़.आई.आर. संख्या 100/96 दर्ज़ करवाई।

2) पत्नी ने पति के विरुद्ध थाना पंकी, कानपुर नगर में धारा 323/324 आईपीसी के अंतर्गत प्रकरण दर्ज़ करवाया।

3) पत्नी के उत्प्रेरण से थाना पंकी में ऐफ़.आई.आर. संख्या 156/1996 भी दर्ज़ की गई।

4) पत्नी ने पति के विरुद्ध थाना कोतवाली (कानपुर) में धारा 420/468 आईपीसी के अंतर्गत ऐफ़.आई.आर. दर्ज़ करवाई।

5) पत्नी ने पति के विरुद्ध धारा 420/467/468 और 471 आईपीसी के अंतर्गत मामला दर्ज़ करवाया।

6) पत्नी ने पति के विरुद्ध धारा 498ए/323/ 504/506 आईपीसी के अंतर्गत थाना कोहना में शिकायत प्रेषित करी।

7) पत्नी ने थाना कोतवाली में दर्ज़ अपने आपराधिक मामले के संदर्भ में प्रेषित पति की ज़मानत याचिका का विरोध किया था।

8) जब पुलिस ने थाना कोतवाली और थाना कोहना में दो आपराधिक मामलों में अंतिम रिपोर्ट दाखिल की, तो पत्नी ने इन मामलों में आपत्ति याचिका प्रेषित करी।

9) पत्नी ने सितम्बर 1997 में महिला प्रकोष्ठ, दिल्ली में पति के वकील और दोस्त (संभवतः एक ही व्यक्ति) के खिलाफ़ आपराधिक धमकी का आरोप लगाते हुए शिकायत संख्या 125 वर्ष 1998 दर्ज़ करवाई।

10) पत्नी ने कंपनी अधिनियम की धारा 397/398 के तहत कंपनी लॉ बोर्ड, नई दिल्ली में पति के खिलाफ़ आपेक्ष दर्ज़ करवाया।

11) पत्नी ने मुकदमा संख्या 1365/1988 में पति के खिलाफ़ शिकायत दर्ज़ करवाई (निर्णय में क्षेत्राधिकार की तफ़सील नहीं है)।

12) 08/07/1999 को फिर से पत्नी ने पुलिस स्टेशन संसद मार्ग, नई दिल्ली में शिकायत दर्ज़ करवाई और पति को गिरफ़्तार करवाने के लिए हर संभव प्रयास किया।

13) 31/03/1999 को पत्नी ने हिंदू अविभाजित परिवार के नाभिक को तोड़ने का नोटिस भेजा।

14) पत्नी ने हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 24 के तहत पति के खिलाफ़ शिकायत दर्ज़ करवाई।

15) पत्नी ने पति के बैंक खाते से 9,50,000 रुपये गुपचुप निकाल लिए।

16) 22/01/01 को पत्नी ने उच्च न्यायालय में एक हलफ़नामा जमा कर के पति के खिलाफ़ गैर ज़मानती वारंट जारी करवा लिया।

17) पत्नी ने एक राष्ट्रीय समाचार पत्र में विज्ञापन छपवाया कि पति उसका कर्मचारी मात्र है।

18) उसने व्यावसायिक सहयोगियों को पति के साथ लेन-देन करने से बचने की चेतावनी देने वाला एक समाचार आइटम प्रकाशित करवाया।

19) पत्नी ने नवीन कोहली को जेल भेजने के आग्रह सहित उसे उसके छोटे से अपार्टमेंट से बाहर निकलवाने की कोशिश में कंपनी लॉ बोर्ड में उस के 25/09/2000 के आदेश के संदर्भ में एक अवमानना याचिका दायर की।

न्यायमूर्ति भंडारी ने अपने फ़ैसले में उल्लेख किया कि नवीन कोहली ने भी अपनी पत्नी के खिलाफ़ मामले दायर किए थे –लेकिन उन्होंने उन्हें सूचीबद्ध करने की ज़हमत नहीं उठाई। हो सकता है कि श्री कोहली द्वारा दर्ज़ करवाए गए मुकदमों की संख्या श्रीमती कोहली द्वारा दर्ज़ करवाए गए मामलों की संख्या की तुलना में इतनी कम रही हो कि वो महत्वहीन हो। ऐसा होने का एक और संभावित कारण यह है कि उस समय तक वे और उनके साथी न्यायाधीश पत्नी के विरुद्ध पक्षपात-ग्रस्त हो गए थे। यदि ऐसा हुआ था तो ये पूर्णतः तर्कसंगत था।

न्यायाधीश ने यह भी काबिल-ए-ज़िक्र समझा कि पत्नी ने अपने पति के आरोपों के जवाब में उस को बहुत ही भद्दी गालियां देने से इनकार नहीं किया था।

नवीन और नीलू कोहली के बीच गुज़री मुकद्दमेबाज़ी में मामलों, अपीलों और संशोधनों की कुल संख्या 20 से अधिक थी। यह शायद राष्ट्रीय कीर्तिमान है, और हो सकता है कि विश्व कीर्तिमान भी है।

के. श्रीनिवास राव बनाम डी.ए. दीपा

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के. श्रीनिवास राव की कानूनी लड़ाई –या कानूनी जंग, यदि आप इसे इस नाम से बुलाना चाहें– की मोटी रूपरेखा के. श्रीनिवास राव बनाम डी. ए. दीपा [5] [6] (2007-2013) में देखी जा सकती है। डी. ए. दीपा ने पहले उनके खिलाफ़ (भारतीय दंड संहिता की धारा 498A और दहेज़ निषेध अधिनियम की धारा 3/4 के तहत) दहेज़ का मुकदमा दर्ज़ करवाया, फिर उसे वापस ले लिया और फिर यह फैसला किया कि मामला वापस लेकर उसने गलती की है। फलस्वरूप उसने वापस ली जा चुकी हुई शिकायत की पैरवी करना शुरू कर दिया, और इस तरह उसने आपराधिक कार्रवाई को एक मखौल के स्तर पर पहुँच दिया। इतना बखेड़ा खड़ा करने के बाद भी वह संतुष्ट न हो पाई, और उसने एक आरसीआर (वैवाहिक अधिकार भरपाई) याचिका दायर करके पति को वैवाहिक सेज पर वापस लाने की कोशिश करने का आडंबर रचाया। इस के बाद उसने उसके खिलाफ़ एक और आपराधिक शिकायत दर्ज़ करवाई, इस बार आईपीसी की धारा 324 (साधारण चोट पहुँचाने की सज़ा) के तहत।

तत्पश्चात उसका भाई उसके पति के घर गया और उसकी सास के साथ शारीरिक छेड़छाड़ कर गुज़रा, जिसके परिणामस्वरूप उक्त सास ने उसके विरुद्ध भारतीय दंड संहिता की धारा 354 के तहत आपराधिक कार्रवाई आरंभ कर दी। इस चरण पर पत्नी के भाई ने भी अपनी बहन ही की तरह मुकदमेबाज़ होने का सबूत देते हुए उसकी सास के खिलाफ़ दंड संहिता की किसी धारा के तहत जवाबी प्राथमिकी दर्ज़ करवा दी। धारा का उल्लेख सुप्रीम कोर्ट के निर्णय में नहीं किया गया है।

आश्चर्यजनक रूप से पति (यानी के. श्रीनिवास राव) को पत्नी द्वारा दायर असमंजसपूर्ण दहेज़ प्रकरण में विचारण न्यायालय ने दोषी ठहरा दिया। बस फिर क्या था, पत्नी ने आंध्र प्रदेश उच्च न्यायालय में –जहाँ उसका पति सहायक रजिस्ट्रार के पद पर कार्यरत था– उसे एक आपराधिक मामले में दोषी पाए जाने के कारण नौकरी से बरखास्त किए जाने की मांग करती हुई शिकायतें प्रेषित करना प्रारंभ कर दिया। उसके मामा और उसके माता-पिता ने भी उक्त उच्च न्यायालय में आपेक्ष प्रेषित किए।

जैसा कि अपेक्षित है, राव ने दहेज केस में अपनी दोषसिद्धि के खिलाफ़ संबंधित सत्र न्यायाधीश की अदालत में एक आपराधिक अपील दायर कर दी। दीपा ने अपील का, स्वाभाविक है, विरोध किया।

किंतु वह केवल अपने पति की अपील का विरोध करने से संतुष्ट नहीं थी। प्रतीत होता है कि वह उच्च न्यायालय के स्तर पर कोई कार्रवाई चाहती थी (कई वादियों के मनों में ऐसी (सुप्त) इच्छा होती है)। उस धन्य महिला ने दहेज़ मामले में श्री राव के माता-पिता को बरी किए जाने के विरुद्ध एक आपराधिक अपील जमा करी, और साथ ही साथ उसी दहेज मामले में श्री राव को सुनाई गई कारावास अवधि बढ़ाने की मांग करते हुए एक आपराधिक पुनरीक्षण याचिका भी (यानि अतिरिक्त रूप से) दायर कर दी!

अग्रिम ज़मानत याचिकाओं के अलावा उनकी आपसी मुकदमेबाज़ी में कुल 11 मुकदमे, अपीलें और पुनरीक्षण याचिकाएँ थीं, जिनमें एक तलाक की याचिका और एक स्थानांतरण याचिका भी शामिल थी। इन में से अंतिम दोनों पति द्वारा दायर की गई थीं।


धन वती @ धन्नो बनाम सतीश कुमार

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धन वती @ धन्नो बनाम सतीश कुमार [7] [8] [9] (2022–2025) में उल्लेखित धनवती एक पागल पत्नी का एक और उदाहरण है; या यदि आप शिष्टता बरतना चाहें तो एक ऐसी पत्नी का जिसे प्रतिशोध की ज्वाला ने पागल कर दिया। उसकी मानसिक स्थिति ने उसके हाथों उसके पति और ससुराल वालों के खिलाफ़ तीन ऐफ़आईआरें दर्ज़ करवा दीं। यह अब तक किसी पत्नी द्वारा अपने पति के खिलाफ़ दर्ज़ करवाई गई सर्वाधिक प्राथमिकियों का राष्ट्रीय रिकॉर्ड है!

चर्चाधीन जोड़े का विवाह 3 मार्च 1990 को संपन्न हुआ था। पति-पत्नी के बीच संबंध शुरुआती तौर पे सौहार्दपूर्ण थे और 3 अक्तूबर 1997 को उनका एक शिशु भी हुआ था।

जब उक्त बालक तीन साल का होने वाला था, तब हालात बिगड़ने लगे। धनवती ने वर्ष 2000 में श्री कुमार के विरुद्ध आपराधिक शिकायतें प्रेषित करनी शुरू कर दीं –पहली उस वर्ष के फ़रवरी माह में। उसने उक्त शिकायत की अग्रतर पैरवी नहीं की, पर यह आवश्यक रूप से यह नहीं दर्शाता है कि उसके पति का उस पर भरोसा बना रहा होगा। हालांकि न्यायिक निर्णय से प्रतीत होता है कि सतीश कुमार एक सहनशील और शायद आसानी से धोखा खा जाने वाला व्यक्ति है, लेकिन भोले-भाले लोग भी अवचेतन अविश्वास से प्रभावित हो जाते हैं। यह बिलकुल सही कहा गया है कि रिश्ते शीशे की तरह होते हैं; दोनों की मरम्मत असंभव होती है।

पत्नी कुछ वर्षों के लिये शांत बैठी रही, लेकिन 2008 और 2009 में उसका झगड़ालू स्वभाव अपने पति और ससुराल वालों के विरुद्ध दर्ज़ करवाए गए आपराधिक आपेक्षों की श्रृंखला के रूप में फिर से उभरा। उसने 2008 में एक और 2009 में तीन आपराधिक आपेक्ष दर्ज़ करवाए, क्रमशः 21/12/2008, 30/08/2009, 15/11/2009 और 09/12/2009 को।

उसने इनमें से किसी भी शिकायत की पैरवी करने की ज़हमत नहीं उठाई, सिवाय आखिरी शिकायत के, जो आईपीसी की धारा 323 (साधारण चोट पहुँचाना), 354 (शारीरिक छेड़छाड़), 506 (आपराधिक धमकी) और 34 (समान आपराधिक नीयत) के तहत रिपोर्ट का आधार बन गई। यह प्रकरण दिल्ली के नांगलोई पुलिस स्टेशन में दर्ज़ किया गया था और इसे क्रम संख्या 118 / 2010 दी गई थी।

यह प्रथम सूचना रिपोर्ट तीन(!) प्रथम सूचना रिपोर्टों में मात्र पहली कड़ी निकली। उसने 2011 में दिल्ली के मुंडका थाने में एक और आपराधिक शिकायत दर्ज़ करवा दी। इसे उक्त पुलिस स्टेशन ने कर्तव्यानुसार प्राथमिकी में तब्दील कर दिया और इसे क्रम संख्या 110 / 2011 दे दी। फिर (जैसा उसने पहले भी किया था) वह चुप बैठ गई; और ऐसा लगने लगा कि वह अब कोई और आपराधिक शिकायत दर्ज़ नहीं करवाएगी। लेकिन उसके अंदर सोया हुआ कुछ जाग उठा और उसने 2015 में मुंडका थाने में दूसरी आपराधिक शिकायत दर्ज़ करवा दी –जो कि कुल मिलाकर उसकी तीसरी शिकायत थी– और जो अपेक्षानुरूप और नियमानुसार उसके पति और ससुराल वालों के खिलाफ़ उसकी तीसरी प्राथमिकी (जिसकी क्रम संख्या 89 / 2015 थी) बन गई।

अपनी 7 आपराधिक शिकायतों के अतिरिक्त उसने अपने घिसे-पिटे आरोपों का पुनर्नवीनीकरण कर के एक घरेलू हिंसा (DV) आपेक्ष भी प्रेषित कर दिया। समय आने पर उसने अपने पति को क्रूरता के आधार पर तलाक प्रदान करने वाले पारिवारिक न्यायालय निर्णय के विरुद्ध अपील भी दायर करी। इस सब को मिला कर उसके द्वारा दागे गए आक्रामक गोलों की संख्या नौ बनती है। उसके द्वारा दायर मामलों की सूची यह इंगित करती है कि वो आपराधिक मुकदमेबाज़ी को मनमर्ज़ी के मुताबिक इस्तेमाल करने वाला खिलौना समझती थी।

सतीश कुमार ने दिल्ली के तीस हज़ारी पारिवारिक न्यायालय में तलाक के लिए एक मुकदमा दायर किया, जिसकी क्रम संख्या थी HMA याचिका संख्या 526 / 2009 (जिसे बाद में उक्त न्यायालय ने 329 / 2014 और अंततः 590661 / 2016 कर दिया)। उन्होंने अपने पुत्र से मिलने का अधिकार पाने हेतु भी एक याचिका दायर की। वे बच्चे से मिलने का अधिकार जीतने में सफल रहे, लेकिन बच्चे ने उनसे मिलने से इनकार कर दिया। यह इनकार स्पष्ट रूप से उसकी माँ द्वारा उसके पिता के विरुद्ध उसके मन में ज़हर घोलने का परिणाम था।

इसके अलावा, सतीश कुमार के पिता ने धनवती के खिलाफ एक स्थायी निषेधाज्ञा की गुहार लगाते हुए एक मुकदमा दायर किया –ताकि उसे उनके घर पर किसी भी तरह का अधिकार जताने की कोशिश करने से रोका जा सके।

उनकी वैवाहिक मुकदमेबाज़ी में आपेक्षों और प्रकरणों की कुल संख्या एक दर्जन थी। जैसा कि ऊपर बताया गया है, इसमें धनवती द्वारा अपने पति के खिलाफ दर्ज़ करवाई गई 3 प्राथमिकियाँ भी शामिल थीं।


संदर्भ सूची :

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1)विशाल शाह बनाम मोनालिशा गुप्ता, 2025 INSC 254 (भारतीय सर्वोच्च न्यायालय, 20 फ़रवरी 2025), Indiankanoon.org; दिल्ली; बिना तिथि; 18 सितम्बर 2025 को दृष्टिगोचर

2)विशाल शाह बनाम मोनालिशा गुप्ता, 2025 INSC 254 (भारतीय सर्वोच्च न्यायालय, 20 फ़रवरी 2025), sci.gov.in; दिल्ली; बिना तिथि; 18 सितम्बर 2025 को दृष्टिगोचर

3) नवीन कोहली बनाम नीलू कोहली, AIR 2006 Supreme Court 1675, 2006 (3) SCALE 252 (भारतीय सर्वोच्च न्यायालय, 21 मार्च 2006), Indiankanoon.org; दिल्ली; बिना तिथि; 18 सितम्बर 2025 को दृष्टिगोचर

4) नवीन कोहली बनाम नीलू कोहली, AIR 2006 Supreme Court 1675, 2006 (3) SCALE 252 (भारतीय सर्वोच्च न्यायालय, 21 मार्च 2006), sci.gov.in; दिल्ली; बिना तिथि; 18 सितम्बर 2025 को दृष्टिगोचर

5)के. श्रीनिवास राव बनाम डी.ए. दीपा, AIR 2013 Supreme Court 2176, 2013 (2) SCALE 735, 2013 (5) SCC 226 (भारतीय सर्वोच्च न्यायालय, 22 फ़रवरी 2013), Indiankanoon.org; दिल्ली; बिना तिथि; 18 सितम्बर 2025 को दृष्टिगोचर

6)के. श्रीनिवास राव बनाम डी.ए. दीपा, AIR 2013 Supreme Court 2176, 2013 (2) SCALE 735, 2013 (5) SCC 226 (भारतीय सर्वोच्च न्यायालय, 22 फ़रवरी 2013), sci.gov.in; दिल्ली; बिना तिथि; 18 सितम्बर 2025 को दृष्टिगोचर

7)धन वती @ धन्नो बनाम सतीश कुमार, Mat. App. (F.C.) 8 / 2022 & CM Appl. 4523 / 2022 (Stay) (दिल्ली उच्च न्यायालय, 19 सितंबर 2025), Indiankanoon.org; दिल्ली; बिना तिथि; 25 अक्तूबर 2025 को दृष्टिगोचर

8)धन वती @ धन्नो बनाम सतीश कुमार, Mat. App. (F.C.) 8 / 2022 & CM Appl. 4523 / 2022 (Stay) (दिल्ली उच्च न्यायालय, 19 सितंबर 2025), delhihighcourt.nic.in; दिल्ली; बिना तिथि; 25 अक्तूबर 2025 को दृष्टिगोचर

9)धन वती @ धन्नो बनाम सतीश कुमार, Mat. App. (F.C.) 8 / 2022 & CM Appl. 4523 / 2022 (Stay) (दिल्ली उच्च न्यायालय, 19 सितंबर 2025), delhihighcourt.nic.in; दिल्ली; बिना तिथि; 25 अक्तूबर 2025 को दृष्टिगोचर






द्वारा लिखित
मनीष उदार द्वारा प्रकाशित।

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अंतिम अद्यतन २६ अक्तूबर २०२५ को किया गया