कानूनी प्रतिरोध करने वाले पति : जवाबी मुकद्दमों की ताकत

Husbands who put up a legal fight: The power of Counter Cases
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पतियों ने भी कानूनी हमले करना शुरू कर दिया है

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अब तक हमने देखा है कि भारत में वैवाहिक मुकदमेबाज़ियों में मुक़दमों की औसत संख्या में वृद्धि इसलिए हुई है कि औसत पत्‍नी पहले से अधिक मुकदमेबाज़ हो गई है। क्या इस तथ्य के मद्देनज़र यह अटकल लगाना बेतुका होगा कि कमसकम कुछएक पतियों ने तो अब तक इसी भाषा में पलटवार करना शुरू कर दिया होगा? आख़िरकार, हर क्रिया की एक समान और विपरीत प्रतिक्रिया होती है।

सत्यवचन। और यदि हम सांख्यिकीय साक्ष्यपिण्ड पर नज़र डालेंगे तो हमें इस बात की पुष्टि मिलेगी कि ऐसी परिकल्पना निराधार नहीं है। पिछले डेढ़ दशक में पतियों ने मुकदमे दर्ज़ करवाने शुरू कर दिए हैं –इनमें आपराधिक मामले भी शामिल हैं। यह प्रवृत्ति हमें बहुत तेज़ी से एक ऐसी स्थिति की ओर ले जा रही है जिसमें हमें विवाह संबंधों के दोनों साझेदारों का पहले से अधिक मुकदमेबाज़ हो जाने की वजह से वैवाहिक मुकदमेबाज़ियों में मुकदमों की औसत संख्या बढ़ी हुई मिलेगी; यदि हम आज की तारीख़ तक पहुँचते-पहुँचते ऐसी वस्तुस्थिति तक आ ही न चुके हों।

ताज़ा खबर यह है कि कुछ नमूने एक से ज़्यादा मुक़दमे दायर करने की हद तक जा रहे हैं। इस तरह के पति मुकदमों को पहले दायर करने के शौकीन होते हैं, यानि वे मुकदमेबाज़ी शुरू करने से पहले अपनी पत्‍नी की तरफ़ से मुकद्दमा दायर होने का इंतज़ार नहीं करते। पत्नियों द्वारा संचालित व्यापक मुकदमेबाज़ी और इस मुकदमेबाज़ी को मिलाकर एक भयावह राष्ट्रीय तस्वीर बन जाती है।


वैवाहिक मुकदमेबाज़ियां जिनमें पतियों ने प्रतिवाद किया (और उन पतियों की विधिक रणनीतियाँ)

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जिन पतियों ने ज़ोर लगा कर मुकदमे लड़े, उनकी कानूनी रणनीतियों पर गौर फ़राम करना शिक्षाप्रद है। आइए ऐसे पुरुषों के कुछ उदाहरण देखें।


एक पति जो अपनी पत्‍नी से गुज़ारा भत्ता मांगने की हद तक चला गया : प्रणीत मोदी बनाम शिखा शाह

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(पिछले भाग के अंत से आगे) प्रणीत मोदी बनाम शिखा शाह [1][2] (2024-2025) इसी प्रकार का एक मामला है। पति सफल रहा क्योंकि उसने अपनी मुकदमेबाज़ी की पैरवी करने में कोई कसर नहीं छोड़ी। अपनी पत्‍नी के खिलाफ़ मुकदमा-दर-मुकदमा दायर करके वो अपने कानूनी बचाव को चरम स्तर तक ले गया। इसे एक अच्छी कानूनी रणनीति कहा जा सकता है क्योंकि यह वास्तविक रूप से एक सफल रणनीति थी।

शिखा शाह ने वाराणसी के कोतवाली क्षेत्र स्थित महिला थाने में प्रणीत मोदी के विरुद्ध ऐफ़ आई आर संख्या 40 वर्ष 2023 दर्ज़ करवा कर मामले की शुरुआत की। उस ने उस के कानूनी हमले का जवाब दिल्ली के तीस हज़ारी पारिवारिक न्यायालय में विवाह-विच्छेद याचिका दायर करके दिया, जिसपर शिखा ने अपनी एक अलग विवाह-विच्छेद याचिका वाराणसी में दायर कर दी, और स्कोरकार्ड को 2-1 पर ले गई।

इस चरण पर पति और पत्‍नी ने सर्वोच्च न्यायालय में एक-एक स्थानांतरण याचिका प्रेषित करी। पति ने अपनी पत्‍नी के तलाक मुकदमे को दिल्ली स्थानांतरित करने की याचना की, और पत्‍नी ने अपने पति के तलाक मुकदमे को वाराणसी स्थानांतरित करने की।

अब पति ने अपनी पत्‍नी के ख़िलाफ़ दो जवाबी कदम उठाए, जिनमें से पहला हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 24 के तहत उसके विरुद्ध भरण-पोषण आवेदन(!) प्रेषित करना था। तीस हज़ारी ज़िला अदालत में एक मैजिस्ट्रेट के समक्ष उसके खिलाफ़ एक आपराधिक शिकायत उसका दूसरा कदम था।

सतह पर ऐसा लगता है कि श्री मोदी ने अपनी पत्‍नी के ख़िलाफ़ बेहद आक्रामक रुख अपनाया –लेकिन वास्तव में उनकी मुकदमेबाज़ी रक्षात्मक और आक्रामक कदमों का एक कुटिल कॉकटेल था। उन्होंने अपनी पत्‍नी द्वारा दर्ज़ करवाए गए प्रकरणों का जवाब एक के बदले एक से अधिक अनुपात में दिया, जिससे उस पर यह दबाव बन गया कि वो समझौते के लिए राज़ी हो जाए।

इस युगल की मुकदमेबाज़ी में कुल सात मामले थे। जैसा कि ऊपर उल्लेख किया गया है, सर्वोच्च न्यायालय में प्रेषित दो परस्पर विरोधी स्थानांतरण याचिकाएँ भी इन में शामिल थीं।


एक पति जिसने कानूनी कार्रवाईयों को बिजली की रफ़्तार से अंजाम दिया : गगनजोत कौर बनाम तरण जीत सिंह

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ज़िंदगी की तरह, मुकदमेबाज़ी में भी चौकस रहना बेहद ज़रूरी है। तरणजीत सिंह का मामला हमें एक ऐसे पति का उदाहरण देता है जिसने अपनी वैवाहिक मुकदमेबाज़ी के किसी भी चरण में ज़रा सा भी वक़्त बर्बाद नहीं होने दिया। जैसा कि आजकल सोशल मीडिया पर कहा जाता है, he understood the assignment

गगनजोत कौर बनाम तरणजीत सिंह [3][4] (2024-2025) में सुप्रीम कोर्ट ने निम्‍नलिखित तथ्य अभिलिखित किए।

तरणजीत और गगनजोत की शादी 3 दिसंबर, 2023 को जम्मू में हुई, जिसके बाद वे उसके माता-पिता के घर, –जो जम्मू में ही था– में साथ रहने लगे। उनके बीच मतभेद पैदा हो गए और इन्हीं मतभेदों के चलते गगनजोत ने अपनी ससुराल छोड़ दी। यह 9 फ़रवरी 2024 की बात है। पति कार्रवाई में फ़ुर्तीला निकला। उसने दो दिन बाद, 11 फ़रवरी को गुमशुदगी रिपोर्ट प्रेषित कर दी।

उन्होंने इस पहले कदम के बाद अपने चाचा को नियुक्त पुलिस तलाशी दल के साथ गुड़गांव रवाना कर दिया। यह उनकी मुकदमेबाज़ी का दूसरा बेहद व्यवस्थित कदम था, और यह एक ऐसा कदम था जिसने फल दिया। इससे यह स्थापित हो गया कि मुकदमेबाज़ी के प्रति तरणजीत का रवैया अनुशासित रवैया था।

सम्बन्धित न्यायालय को 9 मई, 2024 को श्री सिंह की गुमशुदगी रिपोर्ट से सम्बद्ध वस्तुस्थिति विवरणी प्राप्त हुई। उन्होंने फिर से शीघ्रता से कार्रवाई की, और विवाह-विच्छेद याचिका प्रेषित कर दी। इस के साथ उन्होंने गगनजोत कौर के साथ अपने विवाह-सम्बन्ध के स्थापित होने की तिथि से एक वर्ष की अवधि की समाप्ति से पहले ही उक्त विवाह-विच्छेद याचिका को न्याय-प्रक्रिया में दाखिल किये जाने के लिए एक आवेदन भी प्रेषित किया। हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 14 के अनुसार उक्त एक वर्ष की अवधि का गुज़रना अनिवार्य बाध्यता है। इस बाध्यता से छूट पाने हेतु एक आवेदन प्रेषित करना पड़ता है। यदि वो स्वीकार हो जाता है तो विवाह-विच्छेद याचिका पर सुनवाईयां एक वर्ष का इंतज़ार किये बगैर शुरू हो जाती हैं।

तरणजीत ने 29 मई, 2024 को उक्त आवेदन के साथ अपनी विवाह-विच्छेद याचिका प्रेषित करी।

फिर उन्होंने जम्मू के एक नागर मैजिस्ट्रेट की अदालत में अपनी पत्‍नी के खिलाफ़ एक आपराधिक प्रकरण दायर किया और अपने तलाक के मुकदमे की सुनवाइयों में पेश होने लगे।

उनकी मेहनत रंग लाई। 2 अगस्त 2024 को उनके छूट आवेदन को जम्मू की पारिवारिक अदालत ने मंज़ूरी दे दी। यह एक दुर्लभ जीत थी। आमतौर पर ऐसे आवेदनों (यानी विवाह पश्चात एक वर्ष की अनिवार्य अवधि समाप्त होने से पहले प्रेषित विवाह-विच्छेद याचिकाओं को दाखिल करने हेतु प्रेषित आवेदनों) के साथ यह होता है कि पारिवारिक अदालतें उन्हें जाँचने में इतना ज़्यादा समय लगा देती हैं कि उन पर फ़ैसला हो पाने से पहले ही वे निष्फल हो जाते हैं।

उनकी पत्‍नी दिसंबर 2024 में अपनी कानूनी नींद से जागी और जवाबी कार्रवाई में उसने उनके खिलाफ़ तीन मुकदमे दायर कर दिए– सीआरपीसी की धारा 125 के तहत एक भरण-पोषण याचिका, एक घरेलू हिंसा आपेक्ष, और आईपीसी की धारा 498A, 294 (अश्लील कृत्य या गाने), 506 (आपराधिक धमकी) और 34 के तहत एक आपराधिक आपेक्ष। इसके बाद उसने जम्मू में चल रहे मुकदमे को ग्वालियर स्थानांतरित करवाने हेतु सुप्रीम कोर्ट में एक स्थानांतरण याचिका प्रेषित की। इससे 7 मुकदमों की वैवाहिक मुकदमेबाज़ी बन गई– 6 प्रकरण (3 उनके द्वारा उसके खिलाफ़ दायर और 3 उसके द्वारा उनके खिलाफ़) और 1 स्थानांतरण याचिका!

तरणजीत सिंह को 18 अगस्त 2025 को सुप्रीम कोर्ट से तलाक मिल गया –शादी के बाद 21 महीने बीतने से भी कम समय पहले। भारत में हिंदू / सिख / जैन / बौद्ध विवाहों में तलाक लेने के लिए यह अतिउत्तम रूप से कम समयावधि है।

संक्षेप में, उनकी परिस्थिति में जितना यथासंभव हो सकता था, उन्होंने अपनी कानूनी स्थिति को उतना सुरक्षित बनाया, पहले –और सबसे महत्वपूर्ण– अत्यंत तत्परता से काम करके और दूसरा, दीवानी और फ़ौजदारी मुकदमों का मिश्रण दायर करके। इसके बाद वे शांति से बैठ गए और मंगल होने की कामना करने लगे। ईश्वर ने उनकी मदद करी क्योंकि उन्होंने अपनी मदद स्वयं करी।


एक मर्द जिसने अपनी मुकदमेबाज़ी को तीन राज्यों तक फैला दिया : स्‍नेहा सिंह बनाम अश्विनी कुमार

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स्‍नेहा सिंह नाम की एक महिला और अश्विनी कुमार नामक एक पुरुष की शादी 7 जुलाई, 2021 को हुई। वे ज़्यादा समय तक साथ नहीं रहे और उसी साल 26 अगस्त को अलग हो गए। इसके बाद, स्‍नेहा ने 2023 की शुरुआत में (शायद जनवरी में, क्योंकि उसकी ऐफ़ आई आर संख्या 03/2023 थी) बिहार के रोहतास ज़िले के डेहरी थाने में अश्विनी के खिलाफ़ दहेज़ का प्रकरण दर्ज़ करवा दिया। उसने अपनी शिकायत में चोरी और जबरन वसूली के आरोप लगाए और, ऊपर से, अपने पति के माता-पिता और तीन बहनों के नाम भी शामिल कर दिए।

पति ने रचनात्मक तरीके से जवाबी कार्रवाई करते हुए उत्तर प्रदेश के लखनऊ में उसके खिलाफ़ तलाक की अर्ज़ी दायर कर दी। उनके इस कदम का नतीजा यह था कि पत्‍नी को भी अदालती सुनवाईयों में शामिल होने के लिए हर बार अपने गृह नगर से निकल के जाना पड़ गया, ठीक उसी तरह जैसे उसकी ऐफ़आईआर ने यह ज़रूरी बना दिया था कि पति को उसी प्रयोजन हेतु हर तारीख पर अपने गृह नगर से दूर जाना पड़े।

फिर उन्होंने अपनी मुक़दमेबाज़ी के दायरे को और ज़्यादा –और कुछ ज़्यादा ही ज़्यादा– बढ़ा दिया –तेलंगाना के वारंगल ज़िले के काज़ीपेट थाने में अपनी पत्‍नी, उसके भाई, उसके माता-पिता और उसके दादा के खिलाफ़ एक आपराधिक शिकायत दर्ज़ करवा के। इसके बाद वे बिहार गए, जहाँ उन्होंने अपनी पत्‍नी के इकलौते प्रकरण के जाँच अधिकारी (आईओ) के खिलाफ़ एक आपराधिक शिकायत दर्ज़ करवा दी। मुआमले को और भी ज़्यादा तसल्लीबख़्श बनाने हेतु उन्होंने संबंधित थाने के एसएचओ को भी उस शिकायत में एक मुल्ज़िम के तौर पर शामिल कर दिया।

तदोपरांत पत्‍नी ने सर्वोच्च न्यायालय की तरफ़ रुख किया और वहां स्थानांतरण याचिका प्रेषित करी। सर्वोच्च न्यायालय ने संविधान के अनुच्छेद 142 द्वारा प्रदत्त शक्ति का प्रयोग करते हुए उनके विवाह-सम्बन्ध को भंग कर दिया।

इस दिलचस्प कानूनी प्रतिस्पर्धा का विवरण स्‍नेहा सिंह बनाम अश्विनी कुमार [5] (2023-2024) में देखा जा सकता है।

इस मुकद्दमेबाज़ी के बारे में एक और दिलचस्प बात यह मालूम पड़ती है कि इस तथ्य के बावजूद भी कि इन दोनों का विवाह-संबंध 24 अप्रैल 2024 को सर्वोच्च न्यायालय के न्यायमूर्तियों अभय श्रीनिवास ओका और उज्ज्वल भुय्याँ की खंडपीठ द्वारा भंग कर दिया गया था –और बहुत स्पष्ट रूप से भंग कर दिया गया था– इनके के बीच तलाक का मुकदमा अभी भी (2 अक्तूबर 2025 तक) पारिवारिक न्यायालय लखनऊ में चल रहा है। लखनऊ में उक्त मामले का CNR नंबर UPLK020030182023 है। केस इतिहास से पता चलता है कि उक्त तलाक का मामला 27 मई 2024 को निपटा दिया गया था, लेकिन 14 जून 2024 को रहस्यमय तरीके से पुनर्जीवित कर दिया गया। एक और रहस्य यह है की अभी (2 अक्तूबर 2025) तक सुप्रीम कोर्ट की वेबसाइट पर 24 अप्रैल 2024 के किसी भी फ़ैसले –जिसमें स्‍नेहा सिंह का फैसला भी शामिल है– का कोई रिकॉर्ड नहीं है।


एक पति जिसने दीवानी प्रत्युत्तर प्रकरण की ताकत का प्रदर्शन किया: सुल्ताना आबिद खान बनाम आबिद अहमद खान

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सुल्ताना आबिद खान @ सुल्ताना खान बनाम आबिद अहमद खान @ आबिद खान [6][7] (2024-2025) में पत्‍नी ने पति के खिलाफ़ एक घरेलू हिंसा आवेदन प्रेषित किया था, जिस के उत्तर स्वरुप पति ने एक अभिभावकता याचिका और एक निषेधाज्ञा याचिका प्रेषित कर दी थीं। तेन क्रमेण उसने अपनी पत्‍नी के लिए कानूनी सिरदर्द पैदा कर दिया था।


एक और पति जिसने तलाक लेने के लिए सिविल काउंटर केस का इस्तेमाल किया: संघमित्रा घोष बनाम काजल कुमार घोष

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वैवाहिक विवादों को पूरी ताकत से लड़ने की चाहत रखने वाले पति कोई नई शै नहीं हैं, जैसा कि संघमित्रा घोष बनाम काजल कुमार घोष [8][9] (2004-2006) शीर्षक वाले मामले में देखा जा सकता है।

इस मामले के शीर्षक में काजल पति का नाम है।

पत्‍नी ने पति के खिलाफ़ आईपीसी की धारा 498A के तहत दहेज़ का प्रकरण, हिंदू विवाह अधिनियम के अंतर्गत विवाह-विच्छेद याचिका और दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 125 के तहत भरण-पोषण की याचिका दायर की थी। पति ने एक वैवाहिक अधिकार भरपाई (RCR अर्थात Restitution of Conjugal Rights) याचिका, और अपने इकलौते बच्चे –जो एक बेटा था– की अभिभावकता (custody / कस्टडी) के लिए एक याचिका प्रेषित कर के प्रत्युत्तर दिया। कस्टडी की चुनौती पति की ओर से एक मज़बूत कदम थी। इस कदम ने पत्‍नी की पति को स्वीकार्य शर्तों पर तलाक के लिए रज़ामंदी का मार्ग प्रशस्त कर दिया।


संदर्भ सूची :

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1) प्रणीत मोदी बनाम शिखा शाह, Transfer Petitions (Civil) Nos. 2000 / 2024 and 2767 / 2024 (भारतीय सर्वोच्च न्यायालय, 13 फरवरी 2025), Indiankanoon.org; दिल्ली; बिना तिथि; 03 अक्तूबर 2025 को दृष्टिगोचर

2) प्रणीत मोदी बनाम शिखा शाह, Transfer Petitions (Civil) Nos. 2000 / 2024 and 2767 / 2024 (भारतीय सर्वोच्च न्यायालय, 13 फरवरी 2025), sci.gov.in; दिल्ली; बिना तिथि; 03 अक्तूबर 2025 को दृष्टिगोचर

3) गगनजोत कौर बनाम तरणजीत सिंह, Transfer Petition (Civil) No. 3223 / 2024 (भारतीय सर्वोच्च न्यायालय, 18 अगस्त 2025), Indiankanoon.org; दिल्ली; बिना तिथि; 03 अक्तूबर 2025 को दृष्टिगोचर

4) गगनजोत कौर बनाम तरणजीत सिंह, Transfer Petition (Civil) No. 3223 / 2024 (भारतीय सर्वोच्च न्यायालय, 18 अगस्त 2025), sci.gov.in; दिल्ली; बिना तिथि; 03 अक्तूबर 2025 को दृष्टिगोचर

5) स्‍नेहा सिंह बनाम अश्वनी कुमार, Transfer Petition (Civil) 2626 of 2023 (भारतीय सर्वोच्च न्यायालय, 24 अप्रैल 2024), Indiankanoon.org; दिल्ली; बिना तिथि; 03 अक्तूबर 2025 को दृष्टिगोचर

6) सुल्ताना आबिद खान बनाम आबिद अहमद खान, Transfer Petition (Civil) No. 3073-3078 / 2024 (भारतीय सर्वोच्च न्यायालय, 01 अगस्त 2025), Indiankanoon.org; दिल्ली; बिना तिथि; 03 अक्तूबर 2025 को दृष्टिगोचर

7) सुल्ताना आबिद खान बनाम आबिद अहमद खान, Transfer Petition (Civil) No. 3073-3078 / 2024 (भारतीय सर्वोच्च न्यायालय, 01 अगस्त 2025), sci.gov.in; दिल्ली; बिना तिथि; 03 अक्तूबर 2025 को दृष्टिगोचर

8) संघमित्रा घोष बनाम काजल कुमार घोष, Transfer Petition (Civil) 228 of 2004 (भारतीय सर्वोच्च न्यायालय, 20 नवम्बर 2006), Indiankanoon.org; दिल्ली; बिना तिथि; 03 अक्तूबर 2025 को दृष्टिगोचर

9) संघमित्रा घोष बनाम काजल कुमार घोष, Transfer Petition (Civil) 228 of 2004 (भारतीय सर्वोच्च न्यायालय, 20 नवम्बर 2006), sci.gov.in; दिल्ली; बिना तिथि; 03 अक्तूबर 2025 को दृष्टिगोचर






द्वारा लिखित
मनीष उदार द्वारा प्रकाशित।

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अंतिम अद्यतन ०७ अक्तूबर २०२५ को किया गया