क्या आपने ४९८अ (498a) के बारे में सूचना एकत्रित करते हुए कभी इंटरनेट
स्थित मंचों पर पढ़ा है कि अग्रिम ज़मानत मिलना आधी लड़ाई जीतने के समान
है? मेरे विचार में यदि आप ऐसा कर पाते हैं (अग्रिम ज़मानत ले पाते हैं) तो
यह पूरी लड़ाई को जीत लेने सरीखी बात है। मुझे अपनी बात ठीक से समझाने की
आज्ञा दें। किन्तु समझाने से पहले यह दोहराना ज़रूरी है कि प्रत्येक ज़मानत
आदेश अपने आप में एक अंतिम आदेश होता है, और ज़मानत देने वाले किसी आदेश के
विरुद्ध अपील करने का आम तौर से एक ही तरीका होता है, जो है ज़मानत
निरस्तीकरण याचिका प्रेषित करने का रास्ता।
अग्रिम ज़मानत जिस आरोपित व्यक्ति को मिल जाती है, वो व्यक्ति अपना आपराधिक
मामला लड़ते हुए आज़ाद रहता है, न कि सलाखों के पीछे। आम तौर से सभी मामलों
में ज़मानत मिल जाती है, सिवाय बहुत गम्भीर मामलों के। हत्या के मालों में
भी ज़मानत मिल सकती है, जैसा कि हम सबने आरुषि हत्यकांड केस में देखा है।
जहां ज़मानत मिलने से पहले आरोपित व्यक्ति को गिरफ्तार होने पर बेइज़ज़ती
और दर्द से गुज़रना पड़ता है, वहीँ अग्रिम ज़मानत ऐसे दर्द और बेइज़ज़ती को
काफी कम कर देती है, या यूं कहिये कि न के बराबर भी कर देती है यदि आप के
दिल में थोड़ी सी हिम्मत है। इस प्रकार की ज़मानत आरोपित को पुलिस या
न्यायिक हिरासत से भी बचा लेती है। ४९८अ (498a) मामलों में अग्रिम ज़मानत
एक बहुत आम बात है, और आप यह कह सकते हैं कि यह इन मामलों में नियम है, न
कि अपवाद। आप को यह राहत मिल जायेगी, बशर्ते आप कुछ मानदंडों पर खरे उतरें।
४९८अ (498a) में अग्रिम ज़मानत की प्रक्रिया को विस्तार से जानने के लिए इस
लेख को पढ़ें।
दहेज़ सम्बंधित मामलों में आम तौर पर जो मुख्य अतिरिक्त आरोप पुलिस द्वारा
अदालत में लगाये जाते हैं, वे हैं भारतीय आपराधिक संहिता धरा ४०६ (स्त्रीधन
का आपराधिक दुर्विनियोजन या अमानत में खयानत) और ३४(सामूहिक आपराधिक मंशा)।
४९८अ (498a) के अंतर्गत अधिकतम दंड ३ साल की जेल है। ४०६ मैं भी यही अधिकतम
सज़ा है। ३४ में यह १ साल का कारावास है।
यदि आप को अग्रिम ज़मानत मिल जाती है, तो आपको सामान्य / नियमित ज़मानत भी
मिल जायेगी। यह अभियोजन के उस बिंदु पर होगा जहां पुलिस द्वारा न्यायालय
में आरोपपत्र जमा किया जायेगा।
जानने योग्य है कि दहेज़ उत्पीड़न मामलों में सज़ा कि सम्भावना काफी कम है।
शायद आप को यह बात पहले से ही मालूम है। इस का यह मतलब नहीं है कि आप दोषी
होने की स्थिति में भी सज़ा से बच जायेंगे। यह सिर्फ सम्भावना का संकेत
मात्र है जो कि सांख्यिकीय तथ्यों के विश्लेषण से हमें प्राप्त होता है।
दूसरी ओर से यह भी अनुमान लगाया जा सकता है कि यदि आप ने वाकई काफी गम्भीर
रूप से (और दहेज़ लेने के लिए) अपनी पत्नी का उत्पीड़न किया है तभी आप को
ऐसे मामले में सज़ा होगी। इन बातों को मद्देनज़र रखते हुए यह निष्कर्ष
प्रेषित किया जा सकता है कि निचली अदालत द्वारा आप को दोषी करार नहीं
ठहराया जाएगा।
यदि निचली अदालत आप की ऐसी अपेक्षा के अनुरूप फैसला सुनाती है, तो पर्याप्त
सम्भावना है कि पुलिस आप के विरूद्ध ऊपर की अदालत में अपील नहीं डालेगी।
याद रहे कि आम तौर पर पुलिस और अभियोजन ही इस बात का फैसला करते हैं कि
ज़िला अदालत में अपील प्रस्तुर की जाए या नहीं। शिकायतकर्ता की बात इस
परिपेक्ष में कम ही सुनी जाती है। सिर्फ कुछ संगीन और मशहूर मामलों में ही
ऐसा देखा गया है कि शिकायतकर्ता दिल्ली पुलिस या सी बी आई या राज्य पुलिस
की सहमति के बगैर या उस से पहले अपील दायर कर पाये। उदाहरण के लिए सज्जन
कुमार केस या जेसिका लाल हत्या मामला। अभियोजन सरकार की तरफ से कार्य करता
है, और सरकार या राष्ट्र को ही आपराधिक मामलों में आहत पक्ष माना जाता
है।
यदि सरकार आप को बरी करने के फैसले के विरूद्ध अपील नहीं करती है, तो आप
आज़ाद हैं, और अग्रिम ज़मानत बाबा की मेहेरबानी से आप को एक भी दिन हवालात
में नहीं बिताना पड़ा। इस ईमानदार लोगों से भरे हुए, महान और भय मुक्त देश
में यह आम बात होनी चाहिए, लेकिन शायद जनता के सितारे गर्दिश में हैं कि
ऐसी रहत मोटे पैसे खर्च किये बगैर नहीं मिलती।
यदि सरकार आप को बरी करने के फैसले के विरोध में अपील करने का मन बनाती है,
तो भी कोई ख़ास चिंता की बात नहीं। पहली सुनवाई में ही आप की ज़मानत को
अदालत द्वारा बढ़ा दिया जायेगा, और फिर से पूरी प्रक्रिया चालू हो जायेगी।
उच्च अदालत आमतौर पर निचली अदालत के फैसले को पलटती नहीं है, और इस वजह से
काफी सम्भावना है कि आप फिर से बरी किये जायेंगे। याद रहे कि जब आप ज़मानत
के बूते पर आज़ाद हैं, तब आप को आराम से सामान्य जीवनयापन करने से कोई रोक
नहीं सकता।
यदि और जब आप को फिर से बरी किया जाता है, अभियोग में इतनी इच्छाशक्ति नहीं
बची रहेगी कि वो एक और अपील दायर करे। यहाँ आप कि परेशानियां ख़त्म हो जाती
हैं। अब आराम करें। यदि निचली अदालत आप को दोषी करार देती है तो आप को सज़ा
सुनाई जायेगी। तर्क के लिए मान लें कि आप को तीनों धाराओं में अधिकतम दंड
मिलता है, जो कि तीन और तीन और एक, यानि कि सात साल के बराबर है। लेकिन ऐस
सिर्फ प्रतीत होता है, ऐसा वास्तविकता में नहीं होता। भारत में जब किसी
आरोपी को एक से अधिक धाराओं के अंतर्गत दोषी माना जाता है, तब उसे जो
विभिन्न दंड दिए जाते हैं, वे आम तौर से समवर्ती होते हैं, एक साथ शुरू
होते हैं, और इस तरह से तीन और तीन और एक प्रभावी रूप से तीन साल के बराबर
होते हैं, ना कि सात के।
तो क्या अब आपको तीन साल के लिए बिस्तर बाँध लेना चाहिए? नहीं, ऐस नहीं है।
आप को उच्च अदालत में अपील डालने का अधिकार है। अपील कानों की नींव है। और
हमारे देश में जिस आदमी को तीन साल या उस से कम का दंड दिया जाता है उसे
अपनी ज़मानत कि अवधि अपील के निपटारे तक बढ़वाने का अधिकार है। अतः आप की
ज़मानत को विस्तारित किया जायेगा। एक सम्भावना यहाँ पर यह बनती है कि
अभियोजन पक्ष आप की ज़मानत को रद्द करने की याचिका डाल दे, इस कोशिश में कि
आप को अपील के निपटारे तक कारावास व्यतीत करना पड़े। लेकिन यह हलवा नहीं
है। अदालत ऐसी अभियोग पक्ष याचिकाओं को प्रायः सिरे से ख़ारिज कर देती हैं।
शिकायतकर्ता इस पड़ाव पर ऐसी फीकी जीत को देख कर हिम्मत हर बैठेगी, और
समझौते की तरफ उत्प्रेरित होगी। यदि अब भी वह हिम्मत कर जाती है, तो अगले
पड़ाव पर थक के बैठ जायेगी।
शायद आप सोचें कि प्रस्तावित फ़ास्ट ट्रैक (तीव्र पथ) अदालतें महिलाओं को
अपने पतियों के विरूद्ध फटाफट मुकद्दमे चलने को सक्षम कर देंगी। ऐसा नहीं
है। न्यायपालिका में ४९८अ (498a) मामले झूठों से बने पहाड़ों के रूप में
कुख्यात हैं। महिला अपराध प्रकोष्ठों से ले कर कानून मंत्रालय और वहाँ से
ले कर भारत के मुख्य न्यायाधीश इस समस्या से परिचिति हैं। वे इन परेशां
पत्नियों के लिए शायद ही फ़ास्ट ट्रैक अदालतें स्थापित करेंगे। नेपथ्य में
वे लोग भी हैं जिन की हत्या कर दी गयी, या जिनके साथ बलात्कार कर दिया गया,
या जिन्हें अपने हाथ पैर गंवाने पड़े। उन की पीड़ा का हल पहले किया जाये या
ऐसे मामलों से निपटा जाये जिन्हें ड्रामा मात्र समझा जाता है? इस बात का भी
उल्लेख यहाँ प्रासंगिक है कि ईश्वर जब एक हाथ से लेता है तो दुसरे हाथ से
कुछ दे देता है। यदि ये मुकद्दमे जल्दी जल्दी निपटाए जाएंगे तो झूठे आरोपों
से ग्रस्त पुरुषों की व्यथा कथाओं की अवधियां कुछ छोटी हो जाएगी, और इस
अग्नि परीक्षा से बाहर आने की सूरतों में काफी इज़ाफ़ा होगा।
याद रहे, 498a मामलों में प्रारंभिक महिला अपराध प्रकोष्ठ स्तर से ले कर
उच्चतम न्यायालय में डाली गयी विशेष अनुमति याचिका तक बातचीत और समझौता
सम्भव हैं। मूर्ख शिकायतकर्ता सालों साल की लड़ाई के बाद समझौता करते हैं,
और समझदार जल्दी से जल्दी पैसा पकड़ते हैं और अपना रास्ता नापते हैं।
अग्रिम ज़मानत की जय। इति।।।
पिछला लेख (अग्रिम ज़मानत प्रक्रिया के बारे में)। /
In English (about the procedure for anticipatory bail)
अगला लेख (दहेज़ मामलों में अग्रिम ज़मानत के मानदंडों के बारे में)। /
In English (about the criteria for anticipatory bail in dowry
cases)
Omprakash sharma 2017-06-29T11:18:35Z
Sir 498A 323 504 506 34b ka judgement hone se pahale bail bond bharena jaroory hei kisliye pl hindi me bataye
Harsh Vardhan 2017-04-24T10:49:05Z
मेरी शादी दिनांक 5 मार्च 2016 को हुई थी। शादी मैंने पूर्णतः अपनी मर्जी से की थी जिसके बहुत से लोग गवाह हैं। मेरी पत्नी झूठा दबाव बनाकर मुद्दा लगाने की धमकी देती है। वह मेरे घर को बदनाम करने की धमकी देती है। वह मेरे और मेरे परिवार को अपमानित करने की धमकी देती है। पचोरी और बुंदेलखंड क्षेत्र की भाषा में कहती है: "नदी से पानी ला नागिन," ऐसा वह कहती है। मेरी पत्नी के पिताजी महिला पुलिस में ASI हैं। इस बात की जानकारी दी गई है। मेरी पत्नी की माँ ने मुझे अपने घर बुलाकर धमकी दी थी—वे झांसी के पास की कॉलोनी में रहते हैं। उनका कहना है कि वे बहुत बड़े गुण्डे हैं और मेरी हत्या करने की जिम्मेदारी उन्हीं की होगी।
मेरी पत्नी कहती है कि जो भी बोलेगा, वह करेगी और आत्महत्या कर लेगी। मेरी पत्नी को पूरी स्वतंत्रता चाहिए। वह कभी भी कहीं भी जा सकती है, कोई उसे नहीं रोक सकता और मुझ पर हर तरह का मानसिक दबाव बनाया जा रहा है। मुझे कहा गया था कि पचोरी और बुंदेलखंड में शादी में जो भी दहेज आता है, वह सभी लड़की वालों के पास ही रखा जाता है। यह हमने मान लिया, जबकि यह झूठ था।
कोई भी बात जबरन माने बिना पति को फंसा देना और अदालत से सज़ा दिलवाने के लिए पुलिस बुलाकर झूठी शिकायत करने की धमकी देना।
मेरी पत्नी ने शादी के तुरंत बाद ही मुझे बताया कि उसने नौकरी पाने के लिए ही शादी की है। वह वन विभाग के पद पर चयनित हो चुकी है और अब घर का कोई काम नहीं करेगी। मेरे घर में विरोध होने पर मुझे उसके खिलाफ जाकर समझौता करवाना पड़ा। ये लोग झूठ भी बोलते हैं और हर बात पर पलट जाते हैं।
दो महीने पहले समझौता करते हुए मेरी पत्नी ने बताया कि उसके पिता ने शादी के बाद उसे ATM कार्ड दे दिया है और कारण बताया कि उसके पिताजी को हम लोगों पर विश्वास नहीं है।
शादी के तुरंत बाद मुझे कहा गया था कि पचोरी और बुंदेलखंड में लड़की अगर नौकरी करती है तो शादी के बाद उसका वेतन उसकी माँ को दिया जाता है। और अब तो हालत ये है कि मेरी पत्नी कहती है कि अगर बच्चे होंगे तो वे भी मेरे पिताजी के पास रहेंगे। इससे मुझे पता चला कि हमारा घर कभी अपना नहीं माना जाएगा और हमारा घर कभी भी टिक नहीं पाएगा क्योंकि मेरी पत्नी के रिश्तेदारों के साथ हमारे बीच बहुत ज़्यादा टकराव है और मुझ पर मानसिक दबाव बना हुआ है।
मेरी पत्नी की नौकरी की शुरुआत इतनी हो चुकी है कि मुझ पर भी हाथ उठाए जा चुके हैं जिसकी शिकायत मैंने उनके घरवालों से की थी। वहाँ से मुझे सहयोग मिला, जिससे स्थिति थोड़ी ठीक हुई। लेकिन अब वह पहले से ज़्यादा आक्रामक होती जा रही है, जो अनुचित है। अभी मेरी पेंट फाड़ दी गई और चप्पल निकालकर फेंक दी गई। जिसकी जानकारी मैंने थाने के पुलिसवालों को दी थी।
मेरी पत्नी को हमारे घर के उत्पीड़न से उन्हें कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता। ये लोग हमारे घर में आग लगाकर भी उसके पक्ष में खड़े हो सकते हैं।
मेरे ससुरालवालों ने जितना सम्मान किया, ये लोग उसी अनुपात में विरोध करते जा रहे हैं। मैं सम्मान में झुक गया तो उन्होंने पकड़ कर धमकाना शुरू कर दिया।
इन लोगों के इस व्यवहार से यह स्पष्ट हो चुका है कि इन्हें जितना हर्जाना दिया जाएगा, वे उतना ही ज़्यादा समझौता करेंगे। पचोरी और बुंदेलखंड में लड़के वालों के परिवार को केवल तिरस्कार दिया जाता है—फिर भी वे झुकते रहते हैं। इन लोगों को संपत्ति या पैसे का लाभ देना और सम्मान देना मेरी बड़ी गलती रही।
मैंने शादी से पहले ही बता दिया था कि मेरा व्यापार अभी प्रारंभिक स्थिति में है, आर्थिक स्थिति को देखकर शादी में दिखावा नहीं कर पाऊंगा।
मेरे द्वारा दहेज नहीं दिए जाने की वजह से शादी में हमारे रिश्तेदारों को उनके यहाँ जो खाना खिलाया गया था, उसकी क़ीमत ₹60,000 बताई गई, जिसके लिए मुझे बार-बार धमकाया गया और वही पैसे मांगे जाते रहे। मेरी पत्नी और उसके पिताजी कहते हैं कि तुम्हारी दुकान, जो कि कचहरी कॉम्प्लेक्स में है, वहां SC/ST वर्ग के लोग माहवार नहीं आते, जो कि पूरी तरह से असामाजिक है। इस बात को न मानने पर मेरी पत्नी ने मेरी दुकान पर आकर गाली-गलौच भी की थी।
और कई तरह के मानसिक दबाव डालकर मेरी प्रतिष्ठा को खराब कर के मेरे जीवन को पूरी तरह से खत्म कर दिया और मारपीट करके आत्महत्या करने को मजबूर किया जा रहा है।
शादी के बाद से ही मेरी पत्नी पहले मुझे और मेरे परिवार वालों को पहले से ज़्यादा अपमानित करती है—फिर जब हम बात करते हैं तो मोबाइल में रिकॉर्डिंग करती है, फिर ब्लैकमेल करती है। ये लोग झूठ पहले से ज़्यादा चालाक हैं।
कई मोहल्लेवालों को देखकर यह पता चला कि मेरी पत्नी के परिवार वाले ही हमारा घर बनने नहीं देना चाहते। जिससे उनके होनेवाले आर्थिक लाभ बंद हो जाएंगे। ये लोग सिर्फ़ पैसे को ही पहचानते हैं।
मेरे और मेरी पत्नी के परिवार वालों से पुराना सामाजिक व्यवहार खत्म हो चुका है। इन लोगों ने हमें पकड़ने में कोई कसर नहीं छोड़ी है।
हमारे समाज (जाटपुर) में दहेज की परंपरा है। इसलिए मैंने बचपन से ही तय कर लिया था कि मैं अपनी शादी में दहेज नहीं लूंगा।
ये लोग चालाक हैं।
मेरी पत्नी हमेशा कहती रहती है: "तुम मेरी मर्जी के बिना भी नहीं हो सकते," उसका जबलपुर में कहा गया एक वाक्य था जो बाद में बदल गया—वह लड़का झूठ बहुत अच्छा था। और कहती है कि हमारे विभाग (वन विभाग) में भी एक-एक लड़के ने मुझे प्रपोज़ किया था और आज भी करते हैं। वह उन्हें छोड़कर किसी दूसरे से शादी कर लेगी।
मेरी पत्नी मुझे मानसिक और सामाजिक रूप से कमजोर करती जा रही है।
ये लोग मेरी माँ की संपत्ति पर मानसिक कब्ज़ा कर लेंगे। क्योंकि पहले भी मेरे ससुर ने ये राय दी थी कि मेरी माँ के घर पर कब्ज़ा करके उसे दहेज में ले लो, फिर पैसे और दहेज से मेरी पत्नी मुझे अपना पति बना लेगी।
मेरा सम्मान करने पर भी मेरी पत्नी ने दबंगों से मानसिक दबाव दिलवाया हुआ था।
उसके हाथ में जो भी सामान आता है, वह ले जाकर अपने पक्ष में रख देती है। ये हमेशा ये लोग बताकर रखते हैं कि उनके पास लाइसेंस वाली बंदूकें हैं।
इसके पिताजी इसकी हर सही-गलत बात को सही ही मानते हैं। उन्हें सिर्फ़ मेरी पत्नी के वेतन से मतलब होता है—फिर चाहे उसका घर बस रहा हो या नहीं। पैसे लेते समय उन्हें समझ आ जाता है, बाकी समय अनदेखा करने का बहाना करते हैं। अब मैं किसी भी स्थिति में अपनी पत्नी के साथ नहीं रहना चाहता और छुटकारा पाना चाहता हूँ।
धन्यवाद
फरियादी:
गौरव कुमार ठाकुर
157, शालीनता नगर, धार – 454 001
फोन: 94250 46220
ईमेल: dotcomdhar@gmail.com
afsa.mandhra@gmail.com 2015-05-15T10:48:18Z
Sir.,section 465,467,120b ke aadhar pe remand hui ho aur reamand ke48hrs pura ho gya to ab bail. Mil sakti hai???kab tak bail mil sakti hI
Manish 2015-05-15T16:55:08Z
आवेदन प्रेषित करें। ज़मानत आदेश पारित होने के बाद फ़टाफ़ट ज़मानत मिल जाती है।