देशव्यापी आधुनिक तमाशा-ए-ज़मानत

The Bail Circus in India
यदि आप को लगता है कि अपने दहेज़ मामले की वजह से आप को अदालत के अत्याधिक प्रचुर दर्शन करने पड़ रहें हैं तो तनिक एक नज़र जगनमोहन रेड्डी के प्रकरण पर भी डालने का कष्ट करें। शायद केवल ईश्वर को ही ज्ञात है कि बेचारे को आखिरकार एक अदद ज़मानत आदेश पाने के लिए कहाँ कहाँ कितने आवेदन प्रेषित करने पड़े। तीन बार तो भाईसाहब के ज़मानत आवेदन को उच्चतम स्तर पर नामंज़ूरी का सामना करना पड़ा[1] [2] [3]। अतः हम विश्वासपूर्ण रूप से कह सकते हैं कि उसने सिर्फ ज़मानत प्राप्त करने हेतु सर्वोच्च न्यायालय का दरवाज़ा चार दफ़ा खटखटाया। इन चार बारियों में एक मौका ऐसा भी आया था जब उस की तरफ़ से १३ वकील खड़े हुए थे और उस के ख़िलाफ़ ४ थे। उस के वकीलों में से अनेक वकील प्रतिष्ठित और ज़बरदस्त वकील थे, लेकिन फिर भी अनुकूल आदेश नहीं मिला। अनेक मशहूर प्रकरणों का इतिहास कुछ इसी प्रकरण से मिलता जुलता रहा है। उदाहरणतः गोपाल कांडा के प्रकरण को देख लें[4] [5] [6]। या आसाराम बापू की दुःख गाथा का सर्वेक्षण करें[7] [8] [9]

रेस जदिकता का सिद्धांत ज़मानत प्रकरणों में लागू नहीं होता। इस का यह मतलब है कि न्यायिक पूर्वोदाहरण की उपस्थिति अथवा अनुपस्थिति ऐसे मामलों में कोई मायने नहीं रखती। हर ज़मानत आवेदन को शुरूआती तौर से नए तथ्यों और परिस्थितियों का परिणाम समझा जाता है। इन तथ्यों और परिस्थितियों पर पीठासीन अधिकारी अथवा पीठासीन अधिकारीगण अपने विवेक से ज़मानत आवेदन का फ़ैसला निर्धारित करते हैं। निचली अदालत से नकारात्मक फ़ैसला मिलने पर आवेदक उस से ऊपर की अदालत में आवेदन डालने के लिए स्वाधीन होता है। अक़्सर ऐसा देखा गया है कि ऊपर की अदालत आवेदक को वापस निचली अदालत की तरफ़ रवाना कर देती है, और आवेदक ऊपर की अदालत द्वारा बताये गए फ़ेर बदल के साथ फिर से निचली अदालत में आवेदन प्रेषित करता है।

यदि निचली अदालत ज़मानत आवेदक के आवेदन को अस्वीकार कर देती है तो फिर वह उस से ऊपर की अदालत यानि ज़िला न्यायालय में आवेदन प्रेषित करता है। यहाँ भी आवेदन अस्वीकार होने की सूरत में आवेदक स्थानीय उच्च न्यायालय का रुख़ करता है, और यहाँ पर भी यदि असफलता मिलती है तो उच्चतम न्यायालय में वह अपना आवेदन प्रेषित कर सकता है। किसी भी स्तर पर आवेदक को एक कदम नीचे वाली अदालत को जाने का अथवा सबसे निचले स्तर की अदालत को जाने का आदेश मिल सकता है। इस सब से ज़ाहिर है की इतनी मात्रा में आवेदनों के एकत्रित होने की सम्भावना है, जो मात्रा किसी भी न्यायिक व्यवस्था को जाम करने के लिए पर्याप्त है।

लेकिन हमारी न्याय व्यवस्था का पेट इतनी ज़्यादा मुकदमेबाज़ी से भी नहीं भरता। इतनी भाग-दौड़ अपने अंत में प्रायः मात्र एक अंतरिम ज़मानत आदेश पैदा कर पाती है। अंतरिम ज़मानत पूरी ज़मानत नहीं होती है, जैसा कि उसके नाम से ही स्पष्ट है। सुनिश्चित ज़मानत आदेश प्राप्त करने के लिए प्रार्थी को एक और ज़मानत आवेदन दाखिल करना पड़ता है जो अक़्सर फिर से न्याय प्रणाली के सबसे निचले स्तर से ले कर सब से ऊपरले स्तर तक यात्रा करता है। इतना मसाला एक और क्लिश्ट कर देने वाली और लाभप्रद मुकदमेबाज़ी के दौर के लिए काफी है, जिसे शुरू करना आरोपी के लिए ज़रूरी है, यदि वह अपनी आज़ादी से प्यार करता है। यहाँ यह बोलना ज़रूरी है कि मुकदमेबाज़ी क्लेश किसी और को देती है और लाभ किसी और को। आवेदनों का यह दौर अंत में सुनिश्चित ज़मानत का आदेश उत्पादित कर सकता है। इस लेख के विषय क्षेत्र को गोल गोल घूमने से बचाने हेतु हमे मान लेना चाहिए कि वस्तुतः ऐसा ही होता है।

इतना ही होता तो फिर भी बात को सहा जा सकता था। आरोपित व्यक्तियों द्वारा प्राप्त ज़मानत आदेश अंतिम आदेश नहीं होता। दरअसल ज़मानत मामलों में आखिरियत की परिकल्पना ही नहीं है। अभियोजन पक्ष अब ज़मानत निरस्तीकरण का आवेदन डालने को स्वतन्त्र है। वे उस अदालत से शुरुआत कर सकते हैं जिस ने ज़मानत आदेश दिया था, और उच्चतम न्यायालय तक ज़मानत रदद्गी आदेश हेतु याचना कर सकते हैं। कई बार देखा गया है कि अभियोजन पक्ष ने उस अदालत में याचना नहीं डाली जिस ने ज़मानत आदेश दिया था, बल्कि किसी और अदालत का दरवाज़ा खटखटाया, और उस अदालत ने अभियोजन को सही अदालत में याचना प्रेषित करने को कहा। कई बार निकम्मे या लापरवाह वकील गलत अधिकार क्षेत्र वाले न्यायालय की ओर जाते हैं, और वहां उन्हें फटकार सुननी पड़ती है कि ठीक अधिकार क्षेत्र वाली अदालत को जागृत करो। ऐसे व्यव्हार से सभी पक्षों को मानसिक पीड़ा और चकल्लसबाज़ी साहनी पड़ती है। लेकिन सही अधिकार क्षेत्र वाली अदालत से इच्छानुकूल आदेश मिल जायेगा, इस की कोई गारंटी नहीं है। यह मुकदमेबाज़ी में सैद्धांतिक सत्य है। अतः याचक पक्ष को बात का पीछा छोड़ने अथवा ऊँची अदालतों का रुख़ करने के अलावा कोई तीसरा चारा नहीं होता। वास्तव में यह झगड़ा उच्चतम न्यायालय तक जा सकता है और वहां भी निराशा हाथ लगना आम बात है।

गौर तलब है कि कई बार कोई ऊँची अदालत किसी शर्त के पूरा होने तक पुनः ज़मानत आवेदनों पर रोक लगा देती है। इन शर्तों में मुख्य रूप से आरोप पत्र का दाखिल होना, विवेचना का पूरा होना, या किसी अमुक तारीख़ तक किसी कार्रवाई के होने या न होने आदि शामिल हैं। वक़्त आने पर फ़रियादी नए सिरे से पुराने तमाशे को आरम्भ करता है, और आपराधिक वकीलों की जेबों में और पैसा जाता है। अगर विवेचना संस्था वक़्त पूरा होने तक भी अपना कार्य पूरा नहीं करती तो आवेदक नया आवेदन डालने को स्वतन्त्र हो जाता है।

यदि आरोपित व्यक्ति अदालत द्वारा दोषी ठहराया जाता है तो वह ऊपर की अदालत में याचिका प्रेषित करता है और अपनी सज़ा पर स्थगन आदेश की मांग करता है और साथ साथ ज़मानत की मांग करता है। यह प्रथा ४९८ए मामलों में अत्याधिक प्रचलित है। यह आवेदन प्रारम्भिक आवेदन की धारा से अलग आपराधिक प्रक्रिया संहिता की धारा के अंतर्गत प्रेषित किया जाता है। गौर तलब है कि अग्रिम ज़मानत और सामान्य ज़मानत आवेदन भी अलग अलग धाराओं के अंतर्गत प्रेषित किये जाते हैं।यदि आरोपी अलग अलग धाराओं के अंतर्गत आवेदन प्रेषित करता है तो उसे दोनों धाराओं के लिए अलग अलग मुकदमेबाज़ी करनी पड़ती है और दोनों की परेशानी झेलनी पड़ती है। यहाँ यह भी कहना ज़रूरी है कि नोटिस ज़मानत आवेदन भी उच्चतम स्तर तक प्रतिवादित किये जा सकते हैं, और इन्हें अलग ज़मानत आवेदन माना जाता है, हालांकि नोटिस ज़मानत और अग्रिम ज़मानत की धारा एक ही है।

ट्रांज़िट ज़मानत और अंतरिम ज़मानत दो ऐसे प्रकार की जमानतें हैं जिन में फिर से ज़मानत आवेदन प्रेषित करना अनिवार्य होता है, यदि प्रेषक को सुनिश्चित ज़मानत चाहिए तो। जी हाँ, हालांकि यह सुनने में अजीब लगता है, कई ज़मानत आवेदनों में अंतरिम ज़मानत की याचना की जाती है, न कि पूर्ण ज़मानत की। सारे ज़मानत आवेदन अदालतों द्वारा प्राथमिकता आधार पर सुने जाते हैं। इतनी प्राथमिकता जितनी हैबीआस कॉर्पस रिट याचिका को छोड़ के अन्य किस्म की आम रिट याचिकाओं को भी हासिल नहीं है। यह प्राथमिकता अंतरिम ज़मानत के तारिख आगे बढ़ाने वाले आवेदनों को भी दी जाती है। इस प्राथमिकता का आधार संविधान के २१वें अनुलेख में दिए गए जीवनाधिकार को बताया जाता है। यह दिलचस्प बात है कि न्यायतंत्र को उन लोगों के जीवनाधिकार के हनन की परवाह नहीं है जिन के मकान पर कोई किरायदार कब्ज़ा कर के बैठा हो या जो दुखपूर्ण विवाहबंधन में बंधे हैं। इन श्रेणियों के प्रतिवादकों को अक़्सर २० साल या ३० साल या इस से भी अधिक अवधि तक मुकदमेबाज़ी करनी पड़ती है। क्या यह संभव है कि ऐसा इसलिए हो रहा है कि ऐसा इसलिए होता है क्यूंकि वकीलों को ज़मानत आवेदनों से बहुत आमदनी होती है? ज़्यादातर आपराधिक वकीलों का ज़्यादा काम ज़मानत दिलवाने का होता है। हर आवेदन पर अलग से भुगतान हो, ऐसा होना आम बात है।

इसकी तुलना बर्तानिया की कानूनी प्रणाली से करें जहाँ ज़्यादा से ज़्यादा दो ज़मानत आवेदन डाले जा सकते हैं। या ऑस्ट्रेलिया की प्रणाली से करें जहाँ सिर्फ एक ज़मानत आवेदन डाला जा सकता है। इन दोनों देशों में यदि अधिक आवेदन डालने हों तो मामले की मौलिक परिस्थितियों में बदलाव होने पर या नए तथ्यों के उभरने पर ही डाले जा सकते हैं। भारत में भी ऐसा प्रावधान है, लेकिन यहाँ उस प्रावधान की परवाह कोई नहीं करता। ज़रा सोचिये, क्या कोई विशिष्ट व्यक्ति भी सिर्फ एक साल के अंतराल में जगन रेड्डी की तरह उच्चतम न्यायालय में ज़मानत मामले को छोड़ किसी और मामले में चार बार सुनवाई प्राप्त कर सकता है?

अग्रिम ज़मानत श्रृंखला में पहला लेख। / the first article in the AB series (In English)

। / In English (about bail cancellation)


स्त्रोत :-


१) (अंग्रेज़ी में) येदुगूरी संदिंटि जगन्मोहन रेड्डी बनाम केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो, ९ मई २०१३; Indiankanoon.org; दिल्ली; बिना तारीख़
२) (अंग्रेज़ी में) संपत्ति प्रकरण: उच्चतम न्यायालय ने ख़ारिज किया जगन मोहन रेड्डी की ज़मानत याचिका को India Today; हैदराबाद; ०५ अक्तूबर २०१२
३) (अंग्रेज़ी में) संपत्ति प्रकरण: उच्चतम न्यायालय ने ख़ारिज किया जगन मोहन रेड्डी की याचिका को Sify.com; नई दिल्ली; ०९ अगस्त २०१२
४) (अंग्रेज़ी में) गीतिका शर्मा आत्महत्या: गोपाल कांडा की ज़मानत याचिका ख़ारिज Indian Express; सिरसा और नई दिल्ली; ०९ अगस्त २०१२
५) (अंग्रेज़ी में) न्यायिक परीक्षण से बचने के कारण गोपाल कांडा की ज़मानत अस्वीकार Times of India; नई दिल्ली; १३ अक्तूबर २०१२
६) (अंग्रेज़ी में) गीतिका आत्महत्या प्रकरण में उच्च न्यायालय ने की गोपाल कांडा की ज़मानत अस्वीकार Daily Mail Online India; नई दिल्ली; १९ नवम्बर २०१२
७) (अंग्रेज़ी में) बलात्कार प्रकरण: उच्चतम न्यायालय ने आसाराम बापू की अंतरिम ज़मानत याचिका ख़ारिज की Indian Express; नई दिल्ली; २४ अक्तूबर २०१६
८) (अंग्रेज़ी में) राजस्थान उच्च न्यायालय ने बलात्कार प्रकरण में की आसाराम बापू की ज़मानत याचिका खारिज Live Mint; नई दिल्ली; ०९ अगस्त २०१६
९) (अंग्रेज़ी में) 'बीमार' आसाराम को गवाहों के गायब होने के चलते ज़मानत प्राप्त करने का एक और अवसर मिला thewire.in; नई दिल्ली; १३ अगस्त २०१६

द्वारा लिखित
मनीष उदार द्वारा प्रकाशित।

पृष्ठ को बनाया गया।
अंतिम अद्यतन २८ मार्च २०१८ को किया गया।
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