विवरण एवं परिभाषाएं: अग्रिम ज़मानत आदेश एवं अग्रिम ज़मानत
पृष्ठ शीर्षभागबड़ी ख़ुशी की बात है कि आप को अग्रिम ज़मानत मिल गई है। लेकिन यह अग्रिम ज़मानत आखिर है क्या? यह कौन सी बला का नाम है, और यह किस बीमारी की दवा है?
जब भी कोई न्यायाधीश किसी ज़मानत आवेदक के आवेदन पर अग्रिम ज़मानत मंज़ूर करता है, तब वह अपने आदेश में यह लिखता है कि आवेदक को गिरफ्तार होने की स्थिति में तुरंत ज़मानत पर रिहा कर दिया जाए। यदि दहेज प्रताड़ना / ४९८अ (498a) आरोपी कोई पति और उस के माता पिता अग्रिम ज़मानत हेतु आवेदन डालते हैं और फिर उन्हें यह राहत मिल जाती है तो वे गिरफ्तारी काल पर रिहा होने के पूरे हकदार बन जाएंगे। वास्तव में वे (ऐसे कामयाब ज़मानत प्रार्थी) गिरफ्तार किये ही नहीं जायेंगे और उन्हें अपने अभियोग मुकदमे के अंत तक एक भी मिनट हिरासत में नहीं गुज़ारना पड़ेगा, सिवाय ऐसी स्थिति के, जिस में कि ज़मानत के आदेश देने वाली अदालत या फिर उस से ऊँची कोई अदालत उन की ज़मानत रद्द कर दे। (अवांछित परिस्थिति में ऐसे आवेदक भारत व्यापी उस तमाशे में फँस जाते हैं, जो कि ज़मानत के नाम पर हमारी अदालतों में हर रोज़ देखा जाता है।)
यह लेखक ऊपर के तीन वाक्यों में लिखे गए तीन अलग अलग वर्णनों "गिरफ्तार होने कि स्थिति में", "गिरफ्तारी काल पर", एवं "गिरफ्तार किये ही नहीं जायेंगे" की ओर आपका ध्यान आकर्षित करना चाहता है। विनम्र लेखक द्वारा प्रेषित अग्रिम ज़मानत का तीसरा वर्णन ही सही वर्णन है।
आईये समझने योग्य क्रम के अनुसार वर्णन करें। ज़मानत की परिभाषा है, "किसी चीज़ या व्यक्ति की रिहाई को सुरक्षित करने के लिए ऐसी नकदी या संपत्ति को रेहन रखना जिस की नामौजूदगी में वह चीज़ या व्यक्ति हिरासत में ले ली जाती" [3]। अग्रिम ज़मानत को कुछ शाब्दिक कलाबाज़ियों ले कर ही परिभाषित करना संभव है। वास्तव में यह एक ऐसी शब्द-योजना है जिसे बिना सोचे समझे आविष्कृत किया गया था।
अग्रिम ज़मानत आदेश को भी थोड़ी मेहनत मशक्क़त कर के ही परिभाषित किया जा सकता है, और इस की यह परिभाषा है कि आवेदक / आवेदकों के गिरफ़्तार होने से पहले पारित किया जाने वाला यह एक ऐसा आदेश है जिसे कोई सामर्थ्यवान न्यायालय किसी आपराधिक प्रकरण विशेष के दौरान (अथवा किसी ऐसे अनापराधिक प्रकरण विशेष के दौरान, जिस में आपराधिक देयता दृष्टिगोचर हुई है) पारित करता है, जिस प्रकरण विशेष के सन्दर्भ में प्रासंगिक अग्रिम ज़मानत आवेदन प्रेषित किया गया है और जो आदेश विधि प्रवर्तन प्राधिकरणों को निर्दिष्ट करता है कि उक्त आपराधिक / अनापराधिक प्रकरण में सम्बद्ध किसी / किन्ही आवेदक / आवेदकों को या तो गिरफ़्तार नहीं किया जाए, अथवा उसे / उन्हें गिरफ़्तारी के समय ज़मानत का भुगतान करने पर रिहा कर दिया जाए।
अब हम अग्रिम ज़मानत की परिभाषा एक वाक्य में व्यक्त कर पाने की स्थिति में पहुंच गए हैं। अग्रिम ज़मानत किसी नकद रक़म अथवा संपत्ति का वह रेहन रखना है, जिस का उद्देश्य किसी ऐसी चीज़ अथवा व्यक्ति की रिहाई को सुरक्षित रखना होता है, जो चीज़ अथवा व्यक्ति ऐसी नकद रक़म अथवा संपत्ति के रेहन न रखने पर या ऐसी नकद रक़म अथवा संपत्ति की नामौजूदगी में गिरफ़्तार हो जाएगी अथवा गिरफ़्तार हुई रहेगी।
उच्च न्यायालय स्तर अग्रिम ज़मानत आवेदनादि परिक्षण हेतु बहुधा उच्चतम स्तर
पृष्ठ शीर्षभागइस से पहले कि हम अग्रिम ज़मानत के बाद जो होता है उस बात की चर्चा करें, क्षण भर के लिए निचली अदालत में अग्रिम ज़मानत आवेदन खारिज होने की परिस्थिति का आकलन कर लें। स्पष्टतः आप को क्षेत्रीय उच्च न्यायालय का रुख़ करना पड़ेगा। ऐसा क्यों है कि हमें उच्च न्यायालयों में प्रेषित किये गए ज़मानत आवेदनों के बारे में अक़्सर पढ़ने को अथवा सुनने को मिलता है, लेकिन उच्चतम न्यायालय में प्रेषित किये गए ज़मानत आवेदनों की ख़बर दुर्लभ होती है?उत्तर ढूंढने के लिए ज़्यादा दूर जाने की ज़रुरत नहीं हैं, बात फ़कत इतनी सी है कि ज़मानत आवेदनों की भारी बहुसंख्या का निबटारा उच्चतम न्यायालय स्तर पर ही हो जाता है। देश के विभिन्न उच्च न्यायालय उतने ही विधि-संगत रूप से स्थापित किये गए हैं जितने विधि-संगत रूप से देश का उच्चतम न्यायालय स्थापित किया गया है। उच्च न्यायालयों की स्थापना संविधान के भाग ६ के अध्याय ५ के अंतर्गत की गई है [1], और उच्चतम न्यायालय की स्थापना संविधान के अनुलेख १२४ से ले कर अनुलेख १४७ तक के अंतर्गत की गई है [2]। अतएव उच्च न्यायालय जघन्य से जघन्य आपराधिक प्रकरणों में ज़मानत आदेश पारित करने की शक्ति से लैस हैं। यह अलग बात है कि जाने माने प्रकरणों में ज़मानत आदेश जन मनोरंजन की सामग्री भर बन के रह गए हैं।
सकारात्मक अग्रिम ज़मानत आदेश पश्चात विविध गिरफ़्तारी प्रक्रियाएं
पृष्ठ शीर्षभागआम तौर से अन्वेषण अधिकारी सबसे पहले आरोपित पति को गिरफ्तार करने की राय कायम करता है, और ऐसे आरोपित पति को नोटिस ज़मानत / पूर्वसूचना ज़मानत प्राप्त हो चुकी हो तो तत्पश्चात गिरफ्तारी की पूर्वसूचना प्रेषित करता है। उपरोक्त अनुच्छेद में उल्लिखित अग्रिम ज़मानत आदेश अन्वेषण अधिकारी द्वारा भेजी गयी ऐसी ही पूर्वसूचना प्राप्त होने के पश्चात आरोपित द्वारा डाले गए अग्रिम ज़मानत आवेदन के फलस्वरूप मिलता है। नोटिस ज़मानत और अग्रिम ज़मानत प्रक्रिया का विस्तृत ब्यौरा इस पृष्ठ पर वर्णित है।
कई बार ऐसा देखा गया है कि अन्वेषण अधिकारी आरोपित पति के माता पिता को गिरफ्तार करने की कोई कोशिश नहीं करता। और अनेक बार ऐसा भी देखा गया है कि वह उन्हें पति के काफ़ी बाद में गिरफ्तार करने का निर्णय लेता है। प्रायः वह सिरदर्दी और बार बार की कागज़ी कार्रवाई से बचने के लिए तीनों को इक्कट्ठे ही गिरफ्तार करने का फैसला करता है, और इक्कट्ठे ही सारी कागज़ी दौड़ पूरी कर देता है।
कभी कभी आरोपित पक्ष नोटिस ज़मानत का आवेदन ही नहीं करता है और सीधे सीधे मामला बन जाने के बाद अग्रिम ज़मानत आवेदन डालने के विकल्प को चुनता है। प्राथमिकी दर्ज होने वाली है यह उस के संज्ञान में तब आ जाता है जब महिला थाने में चलने वाली बातचीत अर्थात समझौता वार्ता विफल हो जाती है। गौर तलब है कि अन्वेषण अधिकारी ऐसी स्थिति में आरोपित पक्ष को गिरफ्तारी का कोई भी नोटिस देने को बाध्य नहीं है। वह चाहे तो नोटिस या (आम भाषा में) "समन्स" भेज सकता है लेकिन अदालत के किसी भी प्रासंगिक आदेश के अभाव में ऐसी कार्रवाई करना या न करने का फैसला पूर्णतयाः उस के हाथों में है।प्रायः आरोपित व्यक्ति अपने आप ही सकारात्मक अग्रिम ज़मानत आदेश प्राप्त होने पर सम्बंधित थाने को कानूनी खानापूरी हेतु संपर्क करता है / करते हैं।
दिल्ली में किसी भी सामान्य ४९८अ (498a) मामले में किसी को भी गिरफ्तार करने हेतु पुलिस उपायुक्त अर्थात डी सी पी स्तर के अफसर से रज़ामंदी लेना ज़रूरी है। जिन शहरों में पुलिस आयुक्त प्रणाली लागु है वहां भी ऐसा ही प्रावधान है। अन्य शहरों में, जो की सभी राज्यों में प्रायः भारी गिनती में पाये जाते हैं, इस प्रयोजन के लिए पुलिस अधीक्षक यानि एस पी स्तर के अफसर की अनुमति अनिवार्य है। सामान्य मामलों में उच्चत्तम न्यायालय द्वारा निर्धारित इस ज़रूरी कार्रवाई को पूरा करने में कुछ समय लगता है, और इस दौरान आरोपित पति और उस के परिवारजन ज़मानत आवेदन प्रेषित कर सकते हैं। यदि मामला गंभीर हो तो गिरफ्तारी ऊँचे अफसर की अनुमति के बगैर भी की जा सकती है। कभी कभी बचाव पक्ष के वकील अपने मुवक्किलों को ज़मानत आवेदन की सुनवाई के वक़्त भूमिगत हो जाने का मशवरा देते हैं। कभी ऐसा मशवरा मुवक्किल के कल्याण के लिए दिया जाता है, तो कभी वकील के अपने कल्याण के लिए।
कभी कभी अन्वेषण अधिकारी प्राथमिकी दर्ज हो जाने के बाद आरोपित व्यक्तियों से पूछ ताछ करता है और तत्पश्चात निर्णीत करता है कि उन में से किसी को गिरफ्तार करना ज़रूरी है या नहीं।लेकिन अन्वेषण अधिकारी को सकारात्मक ज़मानत आदेश की मौजूदगी में कोई भी गिरफ्तारी करने की कोई शक्ति नहीं होती है।
ज़मानतनामे और विविध ज़मानत प्रतिभूतियाँ
पृष्ठ शीर्षभागगत अनुच्छेदों में जिस पहले प्रकार की स्थिति का व्याख्यान दिया गया है, यानि कि वो स्थिति जिस में आरोपित पक्ष को अग्रिम ज़मानत रुपी राहत अदालत द्वारा प्रदान करी जा चुकी है, उस स्थिति में अन्वेषण अधिकारी पति और उस के परिवारजनों को चिट्ठी प्रेषित करता है। इस चिट्ठी में वह लिखता है कि उस को या उन को फ़लाने दिन फ़लाने थाने में अपने ज़मानतियों और ज़मानत राशि के साथ उपस्थित होना पड़ेगा, ताकि वो (अन्वेषण अधिकारी) गिरफ्तारी और ज़मानत से सम्बंधित कार्रवाई पूरी कर सके। आरोपित को यह सूचना भी इस चिट्ठी में दी जाती है कि उसे और उस के ज़मानतियों को ज़मानतनामे को हस्ताक्षरित करना पड़ेगा और नगद या किसी कीमती वस्तु के रूप में प्रतिभूति स्वरूप मुचलके देने पड़ेंगे।।
ज़मानतनामा एक ऐसा कागज़ होता है जिस पर ज़मानती हस्ताक्षर कर के यह चिन्हित करते हैं कि उन्हें यह बात समझ आ गयी है कि यदि आरोपित कानूनी कार्रवाई को पूरा करने में या उपस्थित होने में या जज के किसी आदेश को मानने में कोई भी आनाकानी करता है तो उन से ज़मानत राशि वसूल या ज़ब्त की जा सकती है, और उन्हें जज के पूर्वादेश द्वारा निर्धारित कोई और खामियाज़ा भी भरना पड़ सकता है। प्रायः प्रत्येक आरोपित के लिए एक ज़मानतनामा होता है। इसी प्रकार से एक-एक व्यक्ति प्रत्येक आरोपी हेतु ज़मानती बनाया जाता है। इस नियम का अपवाद उत्तर प्रदेश और बिहार में पाया जाता है जहाँ प्रत्येक आरोपी को दो ज़मानती तैयार करने पड़ते हैं, और जहाँ विश्वसनीय सूत्रों के अनुसार ज़मानती बनना एक व्यवसाय बन गया है।दूसरे राज्यों में भी वकील ही ऐसी स्थिति में ज़मानतियों का इंतज़ाम करवाते हैं जब आरोपित खुद उनका इंतज़ाम नहीं कर पाता है। एक और रास्ता है ज़मानती / ज़मानतियों की एवज़ में नकदी या किसी कीमती वस्तु की प्रतिभूति जमा कराना। इस रास्ते में आप को सिर्फ़ जान बूझ कर तंग करने के लिए पुलिस वाले एक अतिरिक्त अदालती आदेश मांग सकते है, हालांकि ऐसे अतिरिक्त आदेश की कोई कानूनी आवश्यकता नहीं होती है, और पुलिस को नकदी अथवा कीमती वस्तु की प्रतिभूति लेने का अधिकार है। इतना ज़रूर बेशक है कि वे किसी अदालत द्वारा अग्रिम ज़मानत आदेश पारित होने के बाद गिरफ्तारी नहीं करेंगे।
एक व्यक्ति एक प्रकरण में एक से ज़्यादा आरोपितों हेतु ज़मानती नहीं बन सकता है।
ज़मानत राशि जज द्वारा निर्धारित की जाती है। कभी कभी जज आरोपितों को नगद ज़मानत जमा करने का आदेश देता है। कभी वो फ़िक्स्ड डिपॉज़िट की रसीद - वाउचर जमा करने को कहता है। कभी वह आरोपी को अपने निजी मुचलके पर, यानि कि बिना किसी राशि के (और सिर्फ आरोपी की समाज में जो इज़्ज़त है, फ़क़त उस के आधार पर) हिरासत से रिहा करने का आदेश देता है। निजी मुचलके पर ज़मानत को वैयक्तिक ज़मानत प्रतिज्ञापत्र भी कहा जाता है। ऐसा आम तौर पे तब होता है जब आरोपी अरसे से किसी ऐसे व्यवसाय से सम्बंधित रहा होता है जिस को समाज में सम्मान की दृष्टि से देखा जाता है, मसलन चिकित्सा, शिक्षा, सशस्त्र सेना इत्यादि।
कभी कभी जज आरोपी की किसी चल या अचल संपत्ति को ज़मानत के तौर पर निश्चित काल के लिए अदालत के कागज़ी कब्ज़े में कर लेने का आदेश देता है। यदि आरोपी अदालत में या जज या जज के द्वारा अधिकृत किसी भी अफसर के द्वारा बताई गयी किसी भी जगह पर बताये गए वक़्त पर उपस्थित नहीं होता है तो ऐसी संपत्ति को अदालत द्वारा ज़ब्त किया जा सकता है और नीलाम भी किया जा सकता है। यह एक प्रकार से कर्ज़ा लिए बगैर अपनी संपत्ति की कुर्की करवाने का सुगम तरीका है।
अमूमन यह देखा गया है कि सीमित आर्थिक क्षमता वाले लोग ज़मानत राशि का भुगतान करने में समर्थ नहीं होते। कुछ ऐसे वाकये हुए हैं जहाँ लोगों को क़ैद में सालों साल बिताने पड़ गए, सिर्फ इसलिए कि उनके पास ज़मानत राशि की भरपाई के लायक धन नहीं था। उच्चतम न्यायालय के आदेश के अनुसार ऐसे लोगों को ज़मानत आदेश के एक हफ्ते बाद उनके निजी मुचलके पर, अर्थात (जैसे ऊपर समझाया जा चुका है) बिना उनसे कोई पैसे लिए रिहा करना अनिवार्य है, लेकिन आम तौर से ऐसा भ्रष्टाचार के कारण नहीं किया जाता है, ऐसा देखा गया है।। क़ानून में व्याख्यित है की यदि कोई भी व्यक्ति एक हफ्ते की अवधि तक पैसे नहीं जुटा पाटा है तो उसे गरीब मानना पड़ता है, और नगद ज़मानत राशि या संपत्ति को रेहन करे बगैर उसे रिहा करना पड़ता है। यह प्रावधान आम तौर से अग्रिम ज़मानत के तलबग़ारों पे लागू नहीं होता क्यूंकि अग्रिम ज़मानत आवेदन आम तौर से वह लोग डालते हैं जो न दिवालिये होते हैं न ही इतने गरीब होते हैं कि वकील के पैसे न दे पाएं।
कभी कभी जज आरोपियों को दृष्टांत के आधार पर रिहा करने को कह देता है। ऐसी स्थिति में तहकीकात अफ़सर आरोपी को थाने बुलाएगा, उसे बोलेगा (कुछ कुछ बम्बइया फिल्मों की भाँति) कि "आप को गिरफ्तार किया जाता है", और यह गिरफ्तारी का दृष्टांत उत्पादित करने के बाद छोड़ देगा। यह प्रतीकात्मक गिरफ्तारी से अधिक कुछ नहीं है।
अग्रिम ज़मानत आदेशों पश्चात उपयोगी विविध आ. प्र. सं. प्रपत्र
पृष्ठ शीर्षभागआरोपित के सकारात्मक ज़मानत आदेश प्राप्त करने के तुरंत बाद के अरसे में विधिक प्राधिकरणादि आम तौर से आपराधिक प्रक्रिया संहिता के तीन प्रपत्रों का प्रयोग करते हैं। ये प्रपत्र निम्नलिखित हैं—
१) प्रपत्र संo ३: अधिपत्राधीन ज़मानत एवं ज़मानतनामा [4]।
२) प्रपत्र संo २८: प्रारम्भिक अन्वेषण पर पुलिस अधिकारी समक्ष ज़मानत एवं ज़मानतनामा [5]।
३) प्रपत्र संo ४५: थाना प्रभारी अथवा न्यायालय प्रभारी समक्ष हाज़री हेतु ज़मानत एवं ज़मानतनामा [6]।
एक चौथा ऐसा प्रपत्र है जो ज़रुरत पड़ने पर किसी ज़मानती के विरुद्ध बलपूर्ण कार्रवाई करने के काम आता है। ऐसा आम तौर से तब करना पड़ जाता है जब कोई आरोपित ज़मानत पाने के बाद फ़रार हो जाए और उस की चल संपत्ति को बेच कर भी ज़मानतनामे के मुचलके की रक़म बरामद नहीं हो पाती है। यह प्रपत्र है प्रपत्र संo ५१: आरोपित व्यक्ति के ज़मानती की प्रतिबद्धता हेतु अधिपत्र [7]।
निष्कर्ष
पृष्ठ शीर्षभागकई लोग सोचते हैं की ज़मानत आरोपी को मुक्त करने का तरीका है। ऐसा कदापि नहीं है। दरअसल यह इस का ठीक विपरीत है। रिहा करना और बरी करना दो अलग अलग धारणाएं हैं। ज़मानत मुक्त करने से ठीक विपरीत बाँध के रखने का गूढ़ एवं उत्कृष्ट तरीका है। ऐसा इसलिए है की ज़मानतयाफ्ता के ज़मानती उसे भाग के जाने नहीं देते, क्यूंकि वे उसके करीबी होते हैं, और उन्हें अपने पैसे या फिर आज़ादी तक भी खोने का डर होता है।
सम्बंधित जानकारी के लिए दहेज़ मामलों में अग्रिम जमानत के महत्व के बारे में लेख पढ़िए।
पिछला लेख (दहेज़ मामलों में अग्रिम ज़मानत के मानदंडों के बारे में)। / In English (about the criteria for AB in cases u/s 498a / 406 / 34)
अगला लेख (अग्रिम ज़मानत आदेश में संभावित शर्तों के बारे में)। / In English (about conditions and restrictions in anticipatory bail orders)
स्त्रोत:
१)(अंग्रेज़ी में) भारत का संविधान: भाग ६ का ५वां अध्याय; संविधान समाज; बिना तारीख़
२)(अंग्रेज़ी में) संघीय न्यायपालिका; संविधान समाज; बिना तारीख़
३)(अंग्रेज़ी में) अक्षर 'B' से शुरू होने वाली विधिक शब्द-योजनाओं की शब्दावली; डूहेम विधिक शब्दकोष; बिना तारीख़
४)(अंग्रेज़ी में) प्रपत्र संo ३: अधिपत्राधीन ज़मानत एवं ज़मानतनामा; www.vakilno1.com; बिना तारीख़
५)(अंग्रेज़ी में) प्रपत्र संo २८: प्रारम्भिक अन्वेषण पर पुलिस अधिकारी समक्ष ज़मानत एवं ज़मानतनामा; www.vakilno1.com; बिना तारीख़
६)(अंग्रेज़ी में) प्रपत्र संo ४५: थाना प्रभारी अथवा न्यायालय प्रभारी समक्ष हाज़री हेतु ज़मानत एवं ज़मानतनामा; www.vakilno1.com; बिना तारीख़
७)(अंग्रेज़ी में) प्रपत्र संo ५१: आरोपित व्यक्ति के ज़मानती की प्रतिबद्धता हेतु अधिपत्र; www.vakilno1.com; बिना तारीख़
Chandan Singh 2019-07-09T07:43:34Z
सर मेरी पत्नी 19.03.2019 को मेरे व मेरे पुरे परिवार के उपर IPC की धारा 323, 313, 307, 120 (बी), 498(ए) एवं डि.पी. एक्ट 3/4 लगाई है।
वह इसके पहले भी मेरे संबंधित विभाग को गलत जानकारी देकर काफी परेशान की है एवं मेरे मुझे खाना न देकर एवं मुझे गंदी-गंदी गांलीया देकर
प्रताड़ित करते रही है (संबंधित घटनाओं का साक्ष्य उपलब्ध है) और 01 साल से वह अपनी मर्जी से मेरे बच्चे के साथ ससुराल में रह रही है ।
कोर्ट का नोटिस दबबाकर मेेेेरी 05 सुनवाई छुड़वाया गया।
सर,
क्या मैं अपनी पत्नी के उपर कीस प्रकार का डायवोर्स कर सकता हूॅं।
(मीचूअल कंर्सन या कंटेस्टेंट)
कृपया जरूर बताये।
Manish 2019-07-10T16:23:11Z
किसी अनुभवी वकील से सलाह लें।
shridhar 2018-02-28T03:19:46Z
Meri patni 1sal hi ghr m rehne k bad 3sal se mayke m h. Is bich usne mayke m itne sal s rehne par b vhi 498 rajister kara lia jisme me mre mata pita 3no ko party bna dia fr 125 ka case b dal diya or ab ghrelu hinsa sectn. 9 ka case b dal diya
498m ab tak charge nhi lga h.or baki 2no case ko hmne ab tak receve nhi kia. Kya baki 2no mamlo m cort m ladne m fayda hoga ya nuksan??
Pure mamle m intrestibg bat yah h ki mne na kbi ptni ko mara na prtadit kia or na hi kisi or ne or na kbhi dhej maga uski ichaye bhot badi2 h vah chote shehr m nhi rehna chahti
125 or ghrelu hinsa ko b m kese handle karu
Kripya btaye bhot paresan hu.
Manish 2018-02-28T11:01:03Z
सारे मामलों को अदालत में पेश हो कर वकील की मदद से लड़ना ही ठीक रास्ता है। सबूतों के अभाव में और झूठ बोलने के कारण सामने वाली पार्टी हार जाएगी।
bk 2017-12-08T06:44:32Z
Sir kya matra shadi tay hokar toot jaye to 498a ka case banata hai
Ranjit 2017-10-05T18:40:20Z
Kindly suggest me what will I do
Matter is meri behan ki maut ho chuki hai on 2012 me uska ek beti v hai 2yrs ki.mera jija ne murder Kiya hai. Ye Jo case hua hai Bareilly cantt me ush ne meri behan ki mar Diya hai. Hamne case ki hai usi local police station me .498a etc data Laga hai so . Behen ki merraige 2008 me hua tha. Up court me case chal Raha tha.wo kuch din jail me tha.usko bail milgeya high court se. Hum odissa ke hai. Waan par case chal Raha tha .Abhi odissa Berhampur me transfer karwadiya hoon but his Wakil Ko v pakadte hai unn log usko PESA dete hain. Ta hamko koi v jankari time nahi details hai.2012 se Abhi tak sirf date gadte ja Raha hai.mera keheneka ye hai ki AVI me chahata Hun uska bail cancel karwana hai use phir se jail me dalna hai koi procedure bataye.hum log PURA harrase ho chuki hai. Plz help me...
Manish 2017-10-05T23:12:56Z
ज़मानत निरस्तीकरण का आवेदन डालें।
Virender Kumar 2016-09-17T02:40:15Z
Sir ager ipc 332 main Saja ho jaye to kya bail mil Sakti hai or mil b jaye to kya kya requirements rhe g
chandel 2016-07-02T18:25:47Z
Mediation center par mediation ki koshish Ki, magar Baat Nahi bani 29 June ko, wife alag hona chahti h par case dahej Ka Kar diya h, 4 log namajad kite h, 498 case me agrim jamanat leni hai kya Karna chahiye, kya jab agrim jamanat milegi tab tak arresting ho jayegi, kaise bache, aise case me police kitni baar ghar pareshan karegi...please bataiye
Manish 2016-07-02T18:53:50Z
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h.chandel 2016-07-08T04:52:52Z
Bahut bahut Dhanyavaad Aapka, krapaya ye bataye, Humne kareeb 1 saal Pahle, jab wife ghar Nahi aayi to SSP se guhar lagai unhone Paramarsh Kendra ke liye apply karwaya , lekin ye mediation center par 4 dates me bhi Nahi aayi, uske baad humne sec.9 court se file kiya, AFTER THAT jab inhe Maloom hua to inhone bachne ke kiye humare against 498a,323,506,125,3/4 may be 406 bhi file Kar diya. aisi condition me Abhi opposition Ki Ki taraf se investigation chal rahi hai/ ya hogi, (1) Kya I.O. ya I.O. ke baad court humare against cases ko khaarij Nahi Kar sakta ..Opposition ka purpose alimony Lena hai...(2) court, alimony (Wife+1 child) ke liye kaise Tay karta hai ?
अशोक कुमार 2016-06-08T12:33:54Z
सर अंतरिम जमानत में अदालत ने आदेश दिया "In the event of arrest, shall be released on bail by the concerned investigating office subject to furnishing personal bonds in the sum of Rs. 20,000/-with one surety in the like amount, subject to satisfaction of the investigating officer and subject to compliance of conditions enshrined in section 438. इस आदेश मैं मुझे जमानत के तौर पे किया पेश करना पड़ेगा? किया मैं नकद राशि या इस रकम की कीमत की फिक्स डिपोजिट जमा करवा सकता हु? मेरे या मेरे माता पिता के पास कोई unmoveable सम्पति नहीं है
Manish 2016-06-08T13:19:20Z
आप २०००० रुपये का फिक्स्ड डिपाजिट दे सकते हैं। उस पर मुहर लगा कर आप को वापस कर दिया जायेगा। ज़मानती भी इतनी ही राशि का फिक्स्ड डिपाजिट प्रेषित करे।
अशोक कुमार 2016-06-10T10:41:37Z
धन्यवाद सर, कल मुझे पक्की जमानत मिल गयी. कल मुझे अदालत मैं किसी से पता चला है की अब मेरी पत्नी ने मुझ पर झूठा DOMESTIC VOILENCE का केस कर दिया है. पर अभी मुझे नोटिस नहीं मिला,अगर कुछ दिनों मैं नोटिस आता है तो इस झूठे केस से निपटने के लिए किया करना चाहिए
Manish 2016-06-10T14:15:39Z
जब नोटिस आ जाये तब लिख दीजिएगा क्या दिक्कत आई है।