४९८अ (498a) / घरेलू हिंसा / विवाह विच्छेद सम्बंधित मुकद्दमेबाज़ी में वकीलों से कैसे बर्ताव करें?

How to Deal with Lawyers in your 498a / DV / Divorce Battle

भूमिका

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हमारे देश में यह बड़ी सामान्य धारणा है कि मुकदमेबाज़ी, इलाज, और गृह निर्माण में खर्चा शुरू तो लगभग हर कोई कर सकता है लेकिन वो खर्चा ख़त्म कहाँ पे होगा ये जानकारी शायद ही किसी को हो पाती है। विवेकशील व्यक्ति के सन्दर्भ में यह धारणा तीनों मौकों पर गलत साबित होती है। अब हम इस विषय पर चर्चा करेंगे कि वकीलों से अपने बजट की सीमा के अंदर रहते हुए वांछित कार्य किस प्रकार करवाएं। शर्त सिर्फ यह है कि पक्की निराशा से बचना चाहते हैं तो इतना ज़रूर ध्यान रखें कि आपका बजट यथार्थ पर आधारित हो, हालांकि ऐसा भी मुमकिन है कि ये बात कहने की ज़रुरत ही नहीं है।

यदि ४९८अ (498a) प्रकरण करीब दिखे तो हताश न होवें। दूसरे पक्ष अर्थात अपनी 'पत्नी' को पैसा कमाने हेतु मेहनत करने को मजबूर करें। वकील को भी पैसे के लिए मेहनत करने दें। ये सारा खेल पैसों का खेल है, यहाँ कोई आपको जेल पहुंचाने की जल्दी में नहीं है। लेकिन यह भी बराबर सच है कि इस लड़ाई को आप अकेले नहीं लड़ सकते हैं। यदि युद्ध के उत्तर चढ़ाव में अपना दिमागी संतुलन बनाये रखना है तो किसी वकील से मदद लेनी ही पड़ेगी। वकीलों की मंडी में कुछ शोध ज़रूर करें, कुछ लोगों से टेलीफोन पर बात ज़रूर करें, और किसी भी वकील का अपने केस हेतु चयन करने से पहले दो चार वकीलों से बात करना न भूलें।

शुल्क पड़ताल एवं प्रारम्भिक कार्य

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वकीलों की फीस दूरभाष पर पता करने की कोशिशों में अपना समय न गवाएं। प्रायः सभी आप को यह बोलेंगे कि वे आप को अपनी फीस का अंदाज़ा भी तब तक नहीं दे सकते जब तक आप उन के दफ़्तर न जाएं। यदि उन्होनें आप के लिए पहले काम किया हो या वे आप के घर के पास रहते हों तो अपवाद संभव हैं। यह न भूलें कि विवेकशील वकील आम तौर पर फ़ोन पर मिलने के समय के अतिरिक्त कोई और जानकारी नहीं देते हैं। कामयाब वकील ऐसा वक्त बचाने के लिए करते हैं और संघर्षरत वकील भावी मुवक्किलों द्वारा घर बैठे मंडी शोध करने की कोशिशों को नाकामयाब करने के लिए करते हैं। ऐसे भावी मुवक्किल वांछित मुवक्किलों की श्रेणी में नहीं आते है क्यूंकि ऐसे लोगों का इन वकीलों को कोई भी कार्य देना सम्भाव्य नहीं होता है, और वकील इस बात को पहचान जाते हैं। ऐसा करने की एक और वजह ये होती है कि वकील मुवक्किल को अच्छी तरह जानने के लिए उस को देखना परखना चाहते हैं। याद रहे कि सिर्फ वकील ही मुवक्किल के जीवन में एक अरसे के लिए महत्वपूर्ण व्यक्ति नहीं बन जाता है, बल्कि मुवक्किल भी वकील के जीवन में लम्बे अरसे तक उपस्थित रहने वाला व्यक्ति बन जाता है। इसलिए अगर कोई वकील किसी भावी मुवक्किल के साथ लम्बा रिश्ता बनाने से पहले उस से मिल कर उसे अच्छी तरह से पहचानने की कोशिश करे तो कोई ताज्जुब नहीं करना चाहिए।

यदि कोई वकील पहली मुलाक़ात के लिए भी पैसे मांगे तो उस की प्रतिष्ठा के बारे में जानकारी प्राप्त करने की कोशिश करें। आप इसी चरण पर पूरे मामले के लिए उस की फीस जानने की कोशिश भी कर सकते हैं, अगर आप अपना पूरा मामला उस के सुपुर्द कर दें तो। ऐसी कोशिश से कुछ फल निकलना अनिवार्य नहीं है। ज़माना ही कुछ ऐसा है। ऐसा भी नहीं है कि सामान्यतः सिर्फ बहुत अच्छे वकील पहली मुलाकात के लिए पैसे मांगते हैं। ये वित्तीय रूप से कमज़ोर मुवक्किलों और फीस न देने का इरादा रखने वाले मुवक्किलों की छटाई करने हेतु किया जाता है, और प्रथम चरण पर ही लागू कर दिया जाता है। इसे आप वकीलों द्वारा कार्यान्वित फेस कंट्रोल भी कह सकते हैं। यदि आप उन के भूतपूर्व मुवक्किलों की मार्फ़त जाते हैं तो पहली मुलाकात की फ़ीस भी माफ़ की जा सकती है। ऐसा इसलिए है क्यूंकि वकीलों की ये स्वाभाविक धारणा होती है कि भूतपूर्व मुवक्किलों का अवांछित मुवक्किल भेजना असम्भाव्य है।

पहली मुलाक़ात के लिए पैसा न लेने वाले वकील सस्ते पड़ते हैं, लम्बी अवधि के बारे में सोचें तो यह तर्क निराधार है। जो वकील आप से पहली मुलाकात के पैसे लेते हैं उन का आप को बेवक़ूफ़ बनाना तथाकथित रूप से मुफ़्त सलाह देने वालों से कम सम्भाव्य है। मुझे अपनी बात विस्तार से समझाने का अवसर दें।

अनजाने गैर सरकारी संगठनों और वकीलों द्वारा मुफ्त सलाह की पेशकश करना आजकल एक आम सी बात हो गयी है। ऐसे लोगों के असली इरादों को परखने का एक बहुत सरल तरीका है। यदि वे टेलीफ़ोन पर ही मुफ़्त सलाह दे देते हैं और आप को मुफ़्त परामर्श हेतु अपने दफ़्तर बुलाने की कोशिश नहीं करते हैं तो उनके खरे होने की सम्भावना काफ़ी ज़्यादा है। और लोगों की तरह वे भी बहुत अच्छी तरह समझते हैं कि यदि कोई व्यक्ति सलाह के लिए उनके दफ़्तर आता है तो ऐसे व्यक्ति को दो चार सौ रुपये पेट्रोल पर खर्च करने के अलावा दफ़्तर से आधे दिन की छुट्टी भी लेनी पड़ती है। पैसा बार बार खर्च करने का शौक किसी को नहीं होता है, अतैव ऐसे लोगों के मुवक्किल बन जाने की सम्भावना काफी अच्छी होती है। ये बात गैर सरकारी संगठनों और कुछ तरह के वकीलों, दोनों पर लागू होती है।

मुवक्किलों को चकमा देने का एक और तरीका है, जो कि बहुत प्रचलित, पुराना और टिकाऊ तरीका है। इस चकमे में मुवक्किल से शुरुआत में कम पैसे मांगे जाते हैं, और धीरे धीरे उस के मामले को इतना उलझा दिया जाता है कि बेचारे के पास बदमाश वकील की हर बात मानने के अलावा कोई और विकल्प नहीं बचता। ऐसे चकमे के इतना प्रचलित होने की ज़िम्मेदारी वकीलों पर डालना गलत नहीं है, लेकिन मुवक्किल वर्ग को सोचना चाहिए कि कहीं उन की चमड़ी से ज़्यादा दमड़ी से प्यार करने की मानसिकता का इस परिस्थिति के निर्माण में कोई योगदान तो नहीं है?

उत्तम अधिवक्ता गुण

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क्या उस वकील का अपना दफ़्तर है या वह किसी वरिष्ठ या अधिक सफल वकील के दफ़्तर से जुड़ा हुआ है? आम तौर से आप को सिर्फ ऐसे वकील से अनुबंध हस्ताक्षरित करना चाहिए जिसका अपना दफ़्तर अथवा कक्ष हो, क्यूंकि जिस वकील का स्थाई पता भी नहीं हो वैसे वकील को अपने काम पर नियुक्त करना सरासर बेवकूफ़ी होगी। क्या उसने किसी अनजान बेनाम महाविद्यालय से वकालत पढ़ी है? डिग्री बेचने वाली दुकानों से डिग्री लेने वाले वकीलों से बचें। क्या मुकदमेबाज़ी की भाषा बोलने में उसे मुश्किलें पेश आती हैं? यदि उसे अंग्रेज़ीनहीं आती तो वह अच्छी याचिकाएं नहीं लिख पायेगा और अदालत में अच्छी जिरह भी नहीं कर पायेगा।

क्या उसके कोई सहकर्मी हैं? अगर उस के दफ़्तर में उस के सिवा कोई और वकील नहीं है तो उस की गैर हाज़िरी में आप को न तो अपने सवालों के जवाब मिल पाएंगे, न ही अति आवश्यक पत्राचार करने वाला कोई मिलेगा, और न ही कोई आपको आपके लिए अदालत में खड़ा होने वाला मिलेगा। क्या उसका कार्याभ्यास थोक भाव पर या कारखाना पद्धति पर आधारित है? ऐसे दफ़्तर में आप पर ज़ाती सतह पर गौर कोई नहीं फ़र्मायेगा।

क्या उस से मिल कर ऐसा लगता है कि उस का व्यक्तित्व परिपक्व है? अपनी नाराज़ बीवी को कम से कम रख रखाव की रक़म का भुगतान करना आधुनिक युग में विवाह सम्बंधित मुकदमेबाज़ी का अभिन्न अंग है, अतैव एक चालाक खिलाडी यदि आप के दल में हो तो यह आप के फायदे की ही बात है। गौर तलब है कि यदि आप अपनी भार्या को उस की मांग से २० लाख कम दें और इस प्रकार का कामयाब मोल भाव करने वाले वकील को कमज़ोर वकील की फ़ीस से १ या २ लाख फ़ालतू दे दें तो आप फायदे में ही रहेंगे। लेकिन यह भी मत भूलिए कि मूर्खों के पास पैसा नहीं टिकता इसलिए मूर्ख बनना भी ठीक नहीं है।

क्या सम्बद्ध वकील का दफ़्तर आरामदेह है? मुकदमेबाज़ी के दौरान आप बार बार उस के दफ़्तर जाएंगे इसलिए बेहतर होगा की वहां बैठने का इंतज़ाम तसल्लीबख़्श हो, और दफ़्तर वातानुकूलित हो। एक तरफ़ मुकद्दमे की फ़िक्र और दूसरी तरफ़ धूप और बारिश की मार परेशान कर सकते हैं। घटिया कुर्सियों का असर भी कुछ ऐसा ही होता है।

मुकदमेबाजी की कीमत

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पाठकों द्वारा पूछे जाने वाला एक आम सवाल यह है कि अग्रिम ज़मानत, तलाक़ मामलों, आपसी सहमति मामलों, आपराधिक विचारणों, नागर दावों, आज्ञापत्र याचिकाओं इत्यादि में वकील को शुल्क कितना देना चाहिए।

ऐसे सवालों का कोई निश्चित जवाब नहीं है, लेकिन एक मापदंड तय किया जा सकता है। कोई भी वकील उतने पैसे लेगा जितने वो ले सकता है, और इस रक़म का फैसला उसकी शोहरत, इल्म, और लियाक़त करते हैं। ये जितने ज़्यादा होते हैं उतनी ही उस वकील की मांग होती है। और जितना किसी वकील के जीतने की सम्भावना होती है उतनी ही उस की फीस बढ़ जाती है। के टी एस तुलसी, मुकुल रोहतगी, राम जेठमलानी, हरीश साल्वे, कामिनी जैसवाल सरीखे वकील हर हाजिरी के २५ से ३५ लाख रुपये तक ले सकते हैं। जॉली एल एल बी प्रकार के पात्र पूरे ज़मानत मामले के १० हज़ार रुपये ले सकते हैं और फिर झटपट अपने मुवक्किलों को जेल भिजवा सकते हैं। बहुत ही अच्छे इलाकों में निजी दफ्तरों वाले कामयाब वरिष्ठ वकील पूरे मामलों के लिए २ से ८ लाख रुपये, और ज़मानत / अग्रिम ज़मानत मामलों के लिए १ लाख से ३ लाख तक मांग सकते हैं।

विवाह सम्बंधित मुकदमेबाजी के लिए वकील २ लाख से १० लाख रुपये तक एकमुश्त रक़म की मांग कर सकते हैं। रक़म का दारोमदार सिर्फ सम्बंधित वकील की योग्यता और अनुभव पर नहीं है अपितु उस वकील के तलबगार कितने हैं इस पर भी उस का शुल्क आधारित होता है। दहेज प्रकरणों में नोटिस ज़मानत और अग्रिम ज़मानत दोनों के लिए २-३ स्तरों की अदालतों में जिरह करने हेतु सम्मानजनक वकील ३५ हज़ार रुपये से ले कर डेढ़ लाख रुपये शुल्क ले सकते हैं। इन्ही मामलों के शुल्क की ऊपरी सीमा १० लाख रुपये के आस पास है, और यह तब जब अदालत में आवेदक की ओर से कोई भूतपूर्व अतिरिक्त महा न्यायभिकर्ता खड़ा हो जावे। यह स्थिति २०१७ की शुरुआत में है।

वकालथ / वकालतनामा

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जब आप किसी वकील को अपनी तरफ से मुकद्दमा लड़वाने का मन बना लें तो शुरुआत में ही उस के साथ अपने वित्तीय समझौते को हस्ताक्षरित कर लें। ध्यान रखें कि समझौता साफ़ और सरल भाषा में लिखा जाए। वैसे आम तौर से ऐसे समझौते मुँहज़बानी ही किये जाते हैं और उनका पालन भी किया जाता है। समझौता होने से आप को यह लाभ होगा कि पूरे मुकद्दमे पर आप का होने वाला खर्चा आप को अग्रिम रूप से मालूम हो जायेगा। हाँ यह याद रखें कि भुगतान की कोई भी क़िस्त देने के बाद वापस मिलना लगभग असंभव है। ऐसा प्रायः सभी देशों में होता है, और विशेषतः हमारे देश जैसे गरीब देशों में तो ज़रूर होता है।

गौर तालाब है कि जब आप किसी वकील के आप के संग बनाये गए पहले वकालतनामे पर हस्ताक्षर करते हैं तो उस का कर्त्तव्य बनता है कि वह वकालतनामे को अदालत में जमा करे। ऐसा बहुत कम सुनने में आया है कि किसी वकील ने अपने किसी मुवक्किल का वकालतनामा अदालत में जमा नहीं करवाया या वकालतनामा लेने के बाद मुवक्किल का प्रतिनिधित्व करने से इंकार कर दिया। आप चाहें तो वकील से एक कागज़ पर लिखवा लें कि आप ने मुकद्दमे के पूरे पैसों का भुगतान कर दिया है, अथवा वकालतनामे पर ही ऐसे आशय की पंक्ति लिखवा लें। इस प्रकार की भाषा इसलिए लिखी जाती है कि आम तौर से वकील अपना शुल्क नगद लेते हैं, और रसीद देने से हिचकिचाते हैं, हालांकि इसके अपवाद भी बहुत आम हैं।

अनेक वकील वकालतनामे की प्रति अपने मुवक्किलों को देने से बचने की कोशिश करते हैं, लेकिन इस लेखक के तजुर्बे में ऐसे वकील वकालतनामे की प्रति देने वाले वकीलों से कम हैं। अच्छे वकील मुवक्किल के प्रकरण से सम्बंधित सभी कागज़ात की प्रतियां उसके मांगने पर मुहैय्या करते हैं। (वैधानिक व्यवसाय ने जिस प्रकार से अपने सदस्यों को पेचीदगियों में फंसने से बचाया है ये मज़े की बात है। वास्तुकार जब अपनी असामी से समझौता करता है तो वह समझौते का लिखित प्रारूप बनाता है और दोनों पक्ष उसे हस्ताक्षरित करते हैं। दूसरी तरफ वकील अपने मुवक्किल से वकालतनामे पर हस्ताक्षर करवाता हैं हालांकि शुल्क भी वह मुवक्किल से ही लेता है। वकील यह नहीं लिख के देता कि वह आप का प्रतिनिधित्व करने को तैयार हो गया है, अपितु आप से लिखवा के लेता है कि आपने उसे अपना प्रतिनिधित्व करने हेतु नियुक्त किया है। वकीलों द्वारा बनाया गया कानून उस वकील को ऐसा करने का अधिकार देता है।)



आपके वकील के शुल्क और आप की वित्तीय स्थिति

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हो सकता है कि आप ने शुरुआत में अपने वकील के साथ मुकदमा दर मुकदमा आधार पर भुगतान करने का समझौता किया था। यदि अब मुक़दमेबाज़ी पर होने वाला खर्चा बहुत बढ़ गया है तो निश्चित रक़म के बारे में सोचें। पूर्वनिश्चित शुल्क के साथ साथ किस्तों का साझा भी कर लें। आम तौर से वकील हर मुकदमे के पैसे उस की शुरुआत में लेते हैं, और जब उन्हें पूरी पूर्वनिश्चित रक़म मिल जाती है तो वे और पैसे लेना बंद कर देते हैं।

यहाँ यह बताना ज़रूरी है कि बहुत बार ऐसा होता है कि मुवक्किल जब कुछ मुकदमे शुरू कर चूका होता है और पूर्वनिर्धारित रक़म के बारे में बात करने लगता है तो वकील कहता है कि पूर्वनिर्धारित रक़म सिर्फ़ भविष्य में होने वाले मुकदमों के लिए निर्धारित की जाएगी, और पहले दिए गए पैसे इस रक़म के भुगतान में नहीं गिने जायेंगे। साथ साथ ये भी कह देते हैं की काम शुरू करने के वक़्त जो एकमुश्त रक़म सभी मुकदमों के लिए बतायी गयी थी, अभी भी उतनी ही देनी पड़ेगी। ज़ाहिर सी बात है कि मुवक्किलों को ये बात नाजायज़ लगती है और वकीलों को पूरी तरह जायज़ लगती है।

ऐसी स्थितियों में वित्तीय समझौता करने का एक तरीका यह भी है कि यदि मुकदमेबाज़ी किसी पूर्वनिर्धारित स्तर को पार कर जाती है तो एक अलग शुल्क देना पड़े, और यदि नहीं करती है तो अलग शुल्क।

अदालतों में मुकदमे दायर करने के खर्चे को भी ना भूलें। अक़्सर वकील इस खर्चे को अलग से लेते हैं. ये खर्च बहुत तंग करता है और वकील इस मद में मनमाने पैसे ले लेते हैं। क्यों? कैसे? क्यूंकि अदालतें इस खर्चे की रसीदें नहीं देती हैं, सिर्फ मुद्रण शुल्क वसूलती हैं और कागज़ जमा कर लेती हैं। वकीलों के पौ बारह। मुंहमांगे पैसे मिलने की आशा जाग उठती है। बेहतर होगा कि आप इस मद के पैसे पहले से तय कर के रखें। पैसे अदालत के स्तर के हिसाब से कम या ज़्यादा हो सकते हैं।

यदि कोई वकील डाक, फोटोकॉपी, प्रलेखन आदि के पैसे अलग से मांगता है तो यह एक प्रकार से अति हो जाने का संकेत है। इस मद की बात शुल्क वार्ता में शामिल करना न भूलें, और अपने समझौते में वकील को अप्रत्याशित शुल्क मांगने से प्रतिबंधित करने वाला एक अनुच्छेद डालें। एक सीमा तक इस मद में भुगतान किया जा सकता है, लेकिन प्रलेखनादि पर अंतहीन खर्चा करना गैर ज़रूरी है।

कई वकील हस्ताक्षर राशि अलग रखते हैं और प्रत्येक सुनवाई की राशि अलग रखते हैं। ऐसी प्रणाली आम तौर से ज़्यादा महंगी पड़ती है, और इस में वकील को प्रकरण जल्दी ख़त्म करने का प्रोत्साहन किसी ओर से नहीं प्राप्य होता है। उस पर तुर्रा ये के अमूमन इस तरीके में वकील हर सुनवाई के बजाये अपनी हर हाज़री के पैसे लेते हैं।

बहुत ज़्यादा वकील? या बहुत कम अच्छे वकील?

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यदि आप का वास्ता किसी बड़े वकालत प्रतिष्ठान से पड़ा है तो कुछ बुरा नहीं होगा यदि आप अपने मामले में हाज़िर होने वाले नौजवान वकील को अच्छा प्रदर्शन करने पर कभी एक-आधा नोट थमा दें। ऐसे वकीलों को आम तौर पर बहुत काम करना पड़ता है और पैसे कम मिलते हैं। वकालत का पेशा हमारे देश में सभी पेशों की तरह शोषण से भरपूर है। याद रहे की देश में सभी वास्तुकारों, चिकित्सकों, अभियंताओं, और अधिकारपत्रित लेखापालों की कुल संख्या से अधिक वकील हैं। लगभग कोई भी ऐरा गैरा नत्थू खैरा भारत में वकील बन सकता है।

याद रहे कि कानूनी पेशा बहुत स्पर्धात्मक है, और काम लेने के लिए बड़ी होड़ लगी रहती है। ज़्यादातर वकीलों के गुज़ारे नहीं चल पाते हैं, इसलिए (सैद्धांतिक रूप से?) आसान रास्ता लेने का और धोखाधड़ी करने का प्रलोभन हमेशा बना रहता है। बहुत लोगों का मानना है की वकील ऐसा रखना चाहिए जिसका काम अगर दौड़ नहीं रहा तो कम से अच्छा चल रहा हो। उनका तर्क यह है की ऐसी स्थिति में वकील के दिल में साख और व्यवसाय खोने का डर बना रहता है, और वो दोनों तरफ़ से एक साथ लड़ने की चालाकी करने से बचता है।

इस के विपरीत यह तर्क है कि वकील जितना अमीर होगा उतना लालची होगा। मेरा व्यक्तिगत सोचना यह है कि यदि वकील इतना ज़रूरतमंद है कि उसे अपना प्रचार विज्ञापन द्वारा करना पड़ रहा है तो उसे एक मौका देने में कोई हर्ज नहीं है। विधिज्ञ परिषद द्वारा विज्ञापन की इजाज़त का ऐलान होने के बाद आज बहुत वकील बहुत से मंचों पर अपने विज्ञापन देते हैं। इस सब के बावजूद बहुत लोगों का ये मानना है कि किसी वकील को आंकने का सबसे अचूक तरीका उस का भूतपूर्व प्रदर्शन होता है। आम तौर से ऐसे लोग कारोबार में स्थापित वकीलों को हस्ताक्षरित करवाते हैं।

अपने ही वकील की नीयत पर शक करना

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बेईमान वकीलों की संख्या बहुत बड़ी है, और ऐसे वकील अपने मुवक्किलों को ज़्यादा पैसा ऐंठने की ख्वाइश की वजह से बिलावजह डराते हैं। अक्सर ऐसा होगा कि आप को इंटरनेट पर या वास्तविक जीवन में दो वकीलों से साथ साथ दो चार होना पड़ेगा। एक आपको डराएगा और दूसरा आप को शांत करेगा, शायद सिगरेट पिला कर शांत करेगा। यहाँ इन का एक ही ध्येय है, वो ये कि जो आप को शांत कर रहा है उस पर आप भरोसा करना शुरू कर दें, और भरोसे के साथ साथ पैसा देना शुरू कर दें। यह बड़ी आम सी चालाकी है, और बहुत पुराने और तजुर्बेकार वकील भी बहुत बार इस चालाकी को कर गुज़रने से बाज़ नहीं आते हैं। गुस्सैल पुलिस वाले और नरम पोलिसेवाले के खेल से ये खेल मिलता जुलता है। इस बचकाने खेल को समझें, और इसे खेलने वालों के झांसे में न आएं। लेकिन ध्यान रहे की आप का ध्येय पैसे बचाना है, ऐसे खेल खेलने वाले वकीलों से लड़ना या उन को सीधा करना नहीं है। इसलिए उन के मुँह पर धूर्तता के आरोप न लगाएं। ऐसा करें शिष्ट नहीं है। अपनी कानूनी लड़ाई के दौरान मिलने वाले सब लोगों से हमेशा नरमी से बात करें। ये अपने आप में बहुत दुःख की बात है कि आप की पत्नी आप की दुश्मन बन गयी है। अपने वकील का नाम इस सूची में जोड़ने से बचें।

अपने कानूनी संघर्ष के किसी मोड़ पर यदि आप अपने आप को अपने ही वकील पर शक करता हुआ पाएं, या फिर मिलने वाले लोगों में से बहुत बड़े अनुपात पर शक करता हुआ पाएं, तो आप को किसी डिग्रीशुदा मनोवैज्ञानिक चिकित्सक से मिल लेना चाहिए। यह कहना आसान है कि पूरी व्यवस्था ही भ्रष्ट है, और सब लोग आप के साथ धोखाधड़ी करना चाहते हैं। ठीक इस के विपरीत यह कहना भी आसान है कि आप का दिमाग परेशानी की वजह से ख़राब हो गया है, और आप की बीवी के सिवाए आप के पीछे कोई नहीं पड़ा है। ऐसा भी हो सकता है कि कोई शख्स आप को परेशान करने के लिए (या कोई परेशान शख्स) ये कहे की आप के पागल हो जाने का ये मतलब नहीं है की लोग अभी भी आप के पीछे नहीं पड़े हुए हैं। बातों का कोई अंत नहीं है, हालत का लब्बो लुबाब ये है कि आप परेशान हैं और परेशानी का इलाज मनोचिकित्सक ही कर सकता है। इस से पहले कि आप या आप के आस पास के लोग हताश होकर कोई गलत कदम उठाएं, चिकित्सक से मिलें।

प्रस्तुत लेख के अतिरिक्त शायद आप तलाक / घरेलू हिंसा / रखरखाव / डीपी३ / ४९८अ (498a) युद्ध में ज़रूरी कानूनी पैंतरों और / या प्रवासी भारतियों तथा भारतीय मूल के व्यक्तियों हेतु ४९८अ (498a) प्रश्नावली नामक लेख पढ़ना चाहेंगे।


द्वारा लिखित
मनीष उदार द्वारा प्रकाशित।

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अंतिम अद्यतन २० फ़रवरी २०१७ को किया गया
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