दहेज़ प्रकरणों में अग्रिम ज़मानत के बाद क्या होता है?

What Happens After AB?
बड़ी ख़ुशी की बात है कि आप को अग्रिम ज़मानत मिल गई है। लेकिन यह अग्रिम ज़मानत आखिर है क्या? यह कौन सी बला का नाम है, और यह किस बीमारी की दवा है?

जब भी कोई न्यायाधीश किसी ज़मानत आवेदक के आवेदन पर अग्रिम ज़मानत मंज़ूर करता है, तब वह अपने आदेश में यह लिखता है की आवेदक को गिरफ्तार होने की स्थिति में तुरंत ज़मानत पर रिहा कर दिया जाए। यदि दहेज प्रताड़ना / ४९८अ (498a) आरोपी पति और उस के माता पिता अग्रिम ज़मानत के लिए याचना करते हैं और फिर उन्हें यह राहत मिल जाती है तो वे गिरफ्तारी काल पर रिहा होने के पूरे हकदार बन जाते हैं। वास्तव में वे (ऐसे कामयाब ज़मानत प्रार्थी) गिरफ्तार किये ही नहीं जायेंगे और उन्हें अपने अभियोग मुकदमे के अंत तक एक भी मिनट हिरासत में नहीं गुज़ारना पड़ेगा, सिवाय ऐसी स्थिति के, जिस में कि ज़मानत के आदेश देने वाली अदालत या फिर उस से ऊँची कोई अदालत उन की ज़मानत रद्द कर दे। (अवांछित परिस्थिति में ऐसे आवेदक भारत व्यापी उस तमाशे में फँस जाते हैं, जो कि ज़मानत के नाम पर हमारी अदालतों में हर रोज़ देखा जाता है।) यह लेखक ऊपर के तीन वाक्यों में लिखे गए तीन अलग अलग वर्णनों "गिरफ्तार होने कि स्थिति में", "गिरफ्तारी काल पर", एवं "गिरफ्तार किये ही नहीं जायेंगे" की ओर आपका ध्यान आकर्षित करना चाहता है। विनम्र लेखक द्वारा प्रेषित तीसरा वर्णन ही सही वर्णन है।

आम तौर से अन्वेषण अधिकारी सबसे पहले आरोपित पति को गिरफ्तार करने की राय कायम करता है, और ऐसे आरोपित पति को नोटिस ज़मानत / पूर्वसूचना ज़मानत प्राप्त हो चुकी हो तो तत्पश्चात गिरफ्तारी की पूर्वसूचना प्रेषित करता है। उपरोक्त अनुच्छेद में उल्लिखित अग्रिम ज़मानत आदेश अन्वेषण अधिकारी द्वारा भेजी गयी ऐसी ही पूर्वसूचना प्राप्त होने के पश्चात आरोपित द्वारा डाले गए अग्रिम ज़मानत आवेदन के फलस्वरूप मिलता है। नोटिस ज़मानत और अग्रिम ज़मानत प्रक्रिया का विस्तृत ब्यौरा इस पृष्ठ पर वर्णित है।

कई बार ऐसा देखा गया है कि अन्वेषण अधिकारी आरोपित पति के माता पिता को गिरफ्तार करने की कोई कोशिश नहीं करता। और अनेक बार ऐसा भी देखा गया है कि वह उन्हें पति के काफी बाद में गिरफ्तार करने का निर्णय लेता है। प्रायः वह सिरदर्दी और बार बार की कागज़ी कार्रवाई से बचने के लिए तीनों को इक्कट्ठे ही गिरफ्तार करने का फैसला करता है, और इक्कट्ठे ही सारी कागज़ी दौड़ पूरी कर देता है।

कभी कभी आरोपित पक्ष नोटिस ज़मानत का आवेदन ही नहीं करता है और सीधे सीधे मामला बन जाने के बाद अग्रिम ज़मानत आवेदन डालने के विकल्प को चुनता है। प्राथमिकी दर्ज होने वाली है यह उस के संज्ञान में तब आ जाता है जब महिला थाने में चलने वाली बातचीत अर्थात समझौता वार्ता विफल हो जाती है। गौर तलब है कि अन्वेषण अधिकारी ऐसी स्थिति में आरोपित पक्ष को गिरफ्तारी का कोई भी नोटिस देने को बाध्य नहीं है। वह चाहे तो नोटिस या (आम भाषा में) "समन्स" भेज सकता है लेकिन अदालत के किसी भी प्रासंगिक आदेश के अभाव में ऐसी कार्रवाई करना या न करने का फैसला पूर्णतयः उस के हाथों में है।

दिल्ली में किसी भी सामान्य ४९८अ (498a) मामले में किसी को भी गिरफ्तार करने हेतु पुलिस उपायुक्त अर्थात डी सी पी स्तर के अफसर से रज़ामंदी लेना ज़रूरी है। जिन शहरों में पुलिस आयुक्त प्रणाली लागु है वहां भी ऐसा ही प्रावधान है। अन्य शहरों में, जो की सभी राज्यों में प्रायः भारी गिनती में पाये जाते हैं, इस प्रयोजन के लिए पुलिस अधीक्षक यानि एस पी स्तर के अफसर की अनुमति अनिवार्य है। यदि मामला गंभीर हो तो गिरफ्तारी ऊँचे अफसर की अनुमति के बगैर भी की जा सकती है। सामान्य मामलों में उच्चत्तम न्यायालय द्वारा निर्धारित इस ज़रूरी कार्रवाई को पूरा करने में कुछ समय लगता है, और इस दौरान आरोपित पति और उस के परिवारजन ज़मानत आवेदन प्रेषित कर सकते हैं। कभी कभी बचाव पक्ष के वकील अपने मुवक्किलों को ज़मानत आवेदन की सुनवाई के वक़्त भूमिगत हो जाने का मशवरा देते हैं। कभी ऐसा मशवरा मुवक्किल के कल्याण के लिए दिया जाता है, तो कभी वकील के अपने कल्याण के लिए।

कभी कभी अन्वेषण अधिकारी प्राथमिकी दर्ज हो जाने के बाद आरोपित व्यक्तियों से पूछ ताछ करता है और तत्पश्चात निर्णीत करता है कि उन में से किसी को गिरफ्तार करना ज़रूरी है या नहीं।

गत अनुच्छेदों में जिस पहले प्रकार की स्थिति का व्याख्यान दिया गया है, यानि कि वो स्थिति जिस में आरोपित पक्ष को अग्रिम ज़मानत रुपी राहत अदालत द्वारा प्रदान करी जा चुकी है, उस स्थिति में अन्वेषण अधिकारी पति और उस के परिवारजनों को चिट्ठी प्रेषित करता है। इस चिट्ठी में वह लिखता है कि उस को या उन को फ़लाने दिन फ़लाने थाने में अपने ज़मानतियों और ज़मानत राशि के साथ उपस्थित होना पड़ेगा, ताकि वो (अन्वेषण अधिकारी) गिरफ्तारी और ज़मानत से सम्बंधित कार्रवाई पूरी कर सके। आरोपित को यह सूचना भी इस चिट्ठी में दी जाती है कि उसे और उस के ज़मानतियों को ज़मानतनामे को हस्ताक्षरित करना पड़ेगा। ज़मानतनामा एक ऐसा कागज़ होता है जिस पर ज़मानती हस्ताक्षर कर के यह चिन्हित करते हैं कि उन्हें यह बात समझ आ गयी है कि यदि आरोपित कानूनी कार्रवाई को पूरा करने में या उपस्थित होने में या जज के किसी आदेश को मानने में कोई भी आनाकानी करता है तो उन से ज़मानत राशि वसूल या ज़ब्त की जा सकती है, और उन्हें जज के पूर्वादेश द्वारा निर्धारित कोई और खामियाज़ा भी भरना पद सकता है।

ज़मानत राशि जज द्वारा निर्धारित की जाती है। कभी कभी जज आरोपितों को नगद ज़मानत जमा करने का आदेश देता है। कभी वो फ़िक्स्ड डिपॉज़िट की रसीद - वाउचर जमा करने को कहता है। कभी वह आरोपी को अपने निजी मुचलके पर, यानि कि बिना किसी राशि के (और सिर्फ आरोपी की समाज में जो इज़्ज़त है, फ़क़त उस के आधार पर) हिरासत से रिहा करने का आदेश देता है। ऐसा आम तौर पे तब होता है जब आरोपी अरसे से किसी ऐसे व्यवसाय से सम्बंधित रहा होता है जिस को समाज में सम्मान की दृष्टि से देखा जाता है, मसलन चिकित्सा, शिक्षा, सशस्त्र सेना इत्यादि।

कभी कभी जज आरोपी की किसी चल या अचल संपत्ति को ज़मानत के तौर पर निश्चित काल के लिए अदालत के कागज़ी कब्ज़े में कर लेने का आदेश देता है। यदि आरोपी अदालत में या जज या जज के द्वारा अधिकृत किसी भी अफसर के द्वारा बताई गयी किसी भी जगह पर बताये गए वक़्त पर उपस्थित नहीं होता है तो ऐसी संपत्ति को अदालत द्वारा ज़ब्त किया जा सकता है और नीलाम भी किया जा सकता है। यह एक प्रकार से कर्ज़ा लिए बगैर अपनी संपत्ति की कुर्की करवाने का सुगम तरीका है।

अमूमन यह देखा गया है कि सीमित आर्थिक क्षमता वाले लोग ज़मानत राशि का भुगतान करने में समर्थ नहीं होते। कुछ ऐसे वाकये हुए हैं जहाँ लोगों को क़ैद में सालों साल बिताने पड़ गए, सिर्फ इसलिए कि उनके पास ज़मानत राशि की भरपाई के लायक धन नहीं था। उच्चतम न्यायालय के आदेश के अनुसार ऐसे लोगों को ज़मानत आदेश के एक हफ्ते बाद उनके निजी मुचलके पर बिना पैसे दिए रिहा करना अनिवार्य है। इस आदेश में व्याख्यित है की यदि कोई भी व्यक्ति एक हफ्ते की अवधि तक पैसे नहीं जुटा पाटा है तो उसे गरीब मानना पड़ता है, और नगद ज़मानत राशि या संपत्ति को रेहान करे बगैर उसे रिहा करना पड़ता है। यह प्रावधान आम तौर से अग्रिम ज़मानत के तलबग़ारों पे लागू नहीं होता क्यूंकि अग्रिम ज़मानत आवेदन आम तौर से वह लोग डालते हैं जो न दिवालिये होते हैं न ही इतने गरीब होते हैं कि वकील के पैसे न दे पाएं।

कभी कभी जज आरोपियों को दृष्टांत के आधार पर रिहा करने को कह देता है। ऐसी स्थिति में तहकीकात अफ़सर आरोपी को थाने बुलाएगा, उसे बोलेगा (कुछ कुछ बम्बइया फिल्मों की भाँति) कि "आप को गिरफ्तार किया जाता है", और यह गिरफ्तारी का दृष्टांत उत्पादित करने के बाद छोड़ देगा।

कई लोग सोचते हैं की ज़मानत आरोपी को मुक्त करने का तरीका है। ऐसा कदापि नहीं है। रिहा करना और बरी करना दो अलग अलग धारणाएं हैं। ज़मानत मुक्त करने से ठीक विपरीत बाँध के रखने का गूढ़ एवं उत्कृष्ट तरीका है। ऐसा इसलिए है की ज़मानतयाफ्ता के ज़मानती उसे भाग के जाने नहीं देते, क्यूंकि वे उसके करीबी होते हैं, और उन्हें अपने पैसे या फिर आज़ादी तक भी खोने का डर होता है।

अधिक सम्बंधित जानकारी के लिए दहेज़ मामलों में अग्रिम जमानत के महत्व और दहेज़ मामलों में अग्रिम जमानत आदेश हेतु मानदंडों के बारे में लिखे गए लेख पढ़िए।


द्वारा लिखित
मनीष उदार द्वारा प्रकाशित।

पृष्ठ को बनाया गया।
अंतिम अद्यतन ३ अप्रैल २०१५ को किया गया।
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