ऐफ़ आई आर / प्राथमिकी में विलंब और ऐफ़ आई आर में विलंब होने के कारण होने वाले विलंब
पृष्ठ शीर्षभागआपराधिक कार्रवाईयों में देरी का विषय न केवल वादियों-प्रतिवादियों और वकीलों के लिए बल्कि पूरे देश के लिए दिलचस्प है। यहाँ ऐसी देरी के कुछ पहलुओं को संक्षेप में समझाया गया है।
क्या यह संभव है कि समय पर शिकायत करने के बावजूद प्राथमिकी बनने में देरी हो जाये?
पृष्ठ शीर्षभागएक आम कहावत है कि महान देश भारत में कुछ भी संभव है। समय पर शिकायत के बावजूद ऐफ़ आई आर में देरी होना बहुत छोटी बात है, और इतिहास गवाह है कि हमारे देश में ऐसी छोटी-छोटी बातें बहुत आम हैं।
इंदिरा गांधी की हत्या के बाद दिल्ली और कुछ अन्य शहरों में सिखों की सामूहिक हत्याओं के बाद प्रथम सूचना रिपोर्टों का देरी से दर्ज़ होने से बड़ा इस दुःखद तथ्य का कोई उदाहरण नहीं हो सकता है। विश्व स्तर पर ज्ञात और प्रकाशित ये अपराध अक्तूबर और नवंबर 1984 में राजीव गांधी के प्रधानमंत्री कार्यकाल के पहले कुछ दिनों के दौरान हुए थे, लेकिन दर्जनों मामलों में ऐफ़ आई आरें 1990, 1991, 1992 और 1993 तक में दर्ज़ करी गई थीं, [5] उनकी मृत्यु का भी ऐसी ही दुःखद परिस्थितियों में हो जाने के बाद। यदि इतना ही पर्याप्त रूप से निंदनीय नहीं था, तो कालान्तर में 31 अक्टूबर 1984 सहित कानपुर में सिखों की जितनी भी हत्याएं उन दिनों हुई थीं, उन से संबंधित सभी प्रथम सूचना रिपोर्टों को कानपुर में 'कार्यरत' उत्तर प्रदेश पुलिस [6] के कर्मचारियों द्वारा नष्ट कर दिया गया।
क्या पुलिस देर से प्राप्त होने वाली शिकायतों को स्वीकार करने के लिए कानूनी तौर से बाध्य है? (समय सीमा अधिनियम (आपराधिक कानून))
पृष्ठ शीर्षभागसमय-सीमाओं का क़ानून किसी भी देश में वह कानून होता है जो यह घोषित करता है कि उस देश-विशेष में प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज़ करने के उद्देश्य से प्रेषित करी गई किसी शिकायत को स्वीकार करने से पहले (अपराध के होने की तारीख से लेकर शिकायत के प्रेषित होने की तारीख तक) कितने वर्षों तक की ऐसी अवधि का बीत जाना प्रतिबंधित होता है, जैसी अवधि के समाप्त हो जाने के बाद कानूनी रूप से प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज़ करना असंभव हो जाता है। भारत में –जहाँ तक आपराधिक कानून का संबंध है– सीआरपीसी की धारा 468 इस विषय में मुनासिब कानून है [7][8][28]। इस धारा के अनुसार, किसी भी ऐसे अपराध के लिए जो केवल जुर्माने से दंडनीय है, सीमा अवधि छह महीने है, किसी भी अपराध के लिए जो एक वर्ष तक के कारागार-वास से दंडनीय है, सीमावधि एक वर्ष है, और किसी भी अपराध के लिए जो एक से तीन साल की कारागार दंड अवधि से दंडनीय है, सीमावधि तीन साल है।
आपराधिक प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी) धारा 468 – परिसीमा-काल की समाप्ति के पश्चात् संज्ञान लेने पर प्रतिबन्धपृष्ठ शीर्षभाग
(स्त्रोत: www.latestlaws.com)
(1) इस संहिता में जैसा अन्यथा अन्यत्र उपलब्ध है उसके सिवाय, कोई भी न्यायालय उपधारा (2) में विनिर्दिष्ट वर्ग के अपराध का संज्ञान परिसीमाकाल की समाप्ति के पश्चात् नहीं लेगा।
(2) परिसीमा-काल–
(a) छह मास होगा, यदि अपराध केवल जुर्माने से दण्डनीय है;
(b) एक वर्ष होगा, यदि अपराध एक वर्ष से अनधिक की अवधि के लिए कारावास से दण्डनीय है;
(c) तीन वर्ष होगा, यदि अपराध एक वर्ष से अधिक किन्तु तीन वर्ष से अनधिक की अवधि के लिए कारावास से दण्डनीय है।
(3) [1]इस धारा के प्रयोजनों के लिए उन अपराधों के संबंध में, जिनका एक साथ विचारण किया जा सकता है, परिसीमा-काल उस अपराध के हवाले से अवधारित किया जाएगा जो, यथास्थिति, कठोरतर या कठोरतम दण्ड से दण्डनीय है।
सीआरपीसी धारा 468 का फ़ुटनोट (हाशिये की टिपण्णी)पृष्ठ शीर्षभाग
(स्त्रोत: devgan.in)
1) इस अध्याय के प्रावधान कुछ आर्थिक अपराधों पर लागू नहीं होंगे, आर्थिक अपराध (सीमा की अनुपयुक्तता) अधिनियम, 1974 (1974 का 12), धारा 2 और अनुसूची देखें।
चूंकि धारा 498A के तहत अधिकतम 3 साल की सज़ा हो सकती है, इसलिए दहेज़ उत्पीड़न या दहेज़ क्रूरता से संबंधित किसी भी शिकायत को अंतिम अधियाचित घटना के तीन साल के भीतर रिपोर्ट किया जाना चाहिए। यही बात लागू होती है धारा 406 पर, जो आपराधिक विश्वासघात से संबंधित है। धारा 34 के तहत सबसे खराब स्थिति में एक साल के कारावास की सज़ा हो सकती है, लेकिन एक साल की यह अवधि धारा 498A/406/34 के तहत प्रेषित करी गई किसी भी शिकायत को प्रभावित नहीं करती है, सीआरपीसी धारा 468(3) (ऊपर पुन: प्रस्तुत) में निहित प्रावधान की वजह से।
क्या अदालतें विलंबित प्राथमिकियों को गंभीरता से लेती हैं? (वारंट मामले, गंभीर अपराध, जघन्य अपराध)
पृष्ठ शीर्षभागकई अपराधों में देरी से दर्ज़ करवाई गई प्राथमिकी को अदालतें गंभीरता से नहीं लेती हैं। कई अन्य अपराधों में देरी के बावजूद ऐफ़ आई आर को एक महत्वपूर्ण दस्तावेज़ के रूप में स्वीकार किया जाता है।
गंभीर अपराधों (जिन अपराधों के लिए 7 साल या उस से अधिक कारावास की सज़ा हो सकती है) में देरी को वारंट मामलों (जिन अपराधों से संबंधित मामलों में 2 या उससे अधिक साल की जेल की सज़ा हो सकती है) की तुलना में अधिक आसानी से माफ़ कर दिया जाता है। जघन्य अपराधों (जिन अपराधों के लिए आजीवन कारावास या मृत्युदंड की सज़ा हो सकती है) में प्राथमिकी दर्ज़ करने में हुई कोई भी देरी मायने नहीं रखती।
जहां तक दहेज़ के प्रकरणों का सवाल है, अदालतें आईपीसी की धारा 498A, आईपीसी की धारा 406 और आईपीसी की धारा 34 के तहत देरी से दर्ज़ करी गई शिकायतों को अत्याधिक गंभीरता से नहीं लेती हैं। शिकायत मिलने पर प्राथमिकी दर्ज़ करना अनिवार्य है –498A के मामलों में एक छोटी सी शर्त के साथ– क्योंकि ये सभी धाराएं संज्ञेय अपराधों से संबंधित हैं। सीआरपीसी की धारा 498A से संबंधित मामलों में कानून द्वारा स्थापित शर्त यह है कि एक सी ए डब्ल्यू सैल (महिला अपराध प्रकोष्ठ) प्रक्रिया है जिससे शिकायतकर्ता और मुख्य आरोपी को गुज़रना पड़ता है, इससे पहले कि शिकायत को संबंधित पुलिस स्टेशन को अग्रेषित करने के बारे में निर्णय लिया जाए।
संदर्भ सूची :
पृष्ठ शीर्षभाग5)Gyanesh, K.; Notice by S.I.T. for 1984 riots; Ministry of Home Affairs; New Delhi; 23rd February, 2017; Retrieved on 08th May 2021
6)Nath, D.; RTI query reveals cops destroyed FIRs of 1984 riots; The Hindu; Chennai; 13th April, 2015; Retrieved on 08th May 2021
7)Section 468 in The Code Of Criminal Procedure, 1973; Indiankanoon.org; Delhi; Undated; Retrieved on 09th May 2021
8)CrPC Section 468 - Bar to taking cognizance after lapse of the period of limitation | Devgan.in; devgan.in; Delhi; Undated; Retrieved on 08th May 2021
28)परिसीमा-काल की समाप्ति के पश्चात् संज्ञान का वर्जन; hindi.lawrato.com; दिल्ली; बिना तिथि; १८ जून २०२५ को देखा गया