प्राथमिकियों में मौजूद सूचना हमेशा ही प्रथम सूचना नहीं होती है

The information contained in an FIR is not always first information
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क्या हरएक प्राथमिकी / ऐफ़ आई आर में प्रथम सूचना वर्णित होती है?

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प्रथम सूचना रिपोर्ट –जैसा कि नाम से ही पता चलता है– पुलिस को मिली पहली सूचना (अपराध के बारे में) पर आधारित होनी चाहिए। ऐसा हमेशा नहीं होता है।


जब प्रारंभिक जांच के कारण प्राथमिकी में प्रथम सूचना नहीं होती है

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कभी-कभी पुलिस विभिन्न स्त्रोतों, जैसे मुखबिरों या समाचार आइटमों या आम लोगों से कुछ जानकारी (लिखित शिकायत नहीं, और मौखिक शिकायत भी नहीं) प्राप्त होने के बाद तुरंत प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज़ नहीं करती है, क्योंकि ऐसी जानकारी पर भरोसा कर के कानून के पहिये को गति देने से पहले प्रारंभिक जांच करना तर्कसंगत है। बीएनएसएस [30] की धारा 173 (3) (नीचे देखें) पुलिस द्वारा करी जाने वाली ऐसी प्रारंभिक जांच के लिए कानूनी आधार प्रदान करती है, यदि वह ऐसा करना चाहती है। ऐसे मामलों में पुलिस अपनी जांच पूरी करने के बाद अपनी भाषा में "प्रथम सूचना" रिपोर्ट लिखती है। प्रारंभिक जांच के बाद जो संस्करण लिखित रूप में अंकित किया जाता है वह मूल रूप से प्राप्त हुई सूचना का दूसरा या बाद का और संशोधित संस्करण होता है।


जब प्राथमिक जांच होने के बावजूद प्राथमिकी में प्रथम सूचना समाविष्ट होती है

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उपरोक्त का ठीक विपरीत तब सत्य हो जाता है जब पुलिस को किसी ऐसे व्यक्ति से लिखित या मौखिक शिकायत प्राप्त होती है जो परिणामस्वरुप बनने वाले कानूनी प्रकरण में शिकायतकर्ता बनने के लिए तैयार और इच्छुक होता है। ऐसी स्थितियों में प्रारंभिक जांच के होने अथवा न होने का कोई महत्व नहीं रह जाता है, और पुलिस के पास आक्षेप को प्राथमिकी में "जैसा प्राप्त हुआ" लिखने के अलावा कोई विकल्प नहीं रह जाता है।

एक विशेष दशा तब पैदा हो जाती है जब पुलिस को कानून द्वारा या कानून द्वारा निर्धारित प्रक्रिया द्वारा प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज़ करने से पहले प्रारंभिक जांच करने की आवश्यकता होती है। यह दहेज़ प्रकरणों में विशेष रूप से सच है। दहेज़ के मामलों को प्रबंधित करने हेतु प्रत्येक राज्य में महिला अपराध प्रकोष्ठ स्थापित किए गए हैं और अन्य कार्यों के अलावा इन सी ए डब्ल्यू प्रकोष्ठों का काम दहेज़ की शिकायत प्राप्त होने पर प्रारंभिक जांच करना है। यहाँ अपनी बात को दोहराते हुए यह बताना ज़रूरी है कि सम्बद्ध महिला अपराध प्रकोष्ठ द्वारा की गई प्रारंभिक जांच के अस्तित्व के बावजूद, ऐसे मामलों में प्राथमिकियां प्रेषित लिखित शिकायतों से एक इंच भी भिन्न नहीं हो सकती हैं


भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता – धारा 173(3)पृष्ठ शीर्षभाग  
(source: mha.gov.in)

173 – संज्ञेय मामलों में सूचना
(3) धारा 175 में अंतर्विष्ट उपबंधों पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, ऐसे किसी संज्ञेय अपराध को करने से संबंधित सूचना की प्राप्ति पर, जिसमें तीन वर्ष या उससे अधिक का दंड है किन्तु सात वर्ष से कम का है, थाने का भारसाधक अधिकारी अपराध की प्रकृति और गंभीरता पर विचार करते हुए उप-पुलिस अधीक्षक की पंक्ति से अन्यून किसी अधिकारी से प्राप्त पूर्व अनुमति से,

(i) यह अभिनिश्चित करने के लिए कि क्या चौदह दिन की अवधि के भीतर मामले में कार्यवाही के लिए कोई प्रथमदृष्टया मामला विद्यमान है, आरंभिक जांच करने के लिए कार्यवाही कर सकेगा; या

(ii) जब कोई प्रथमदृष्टया मामला विद्यमान है, तब अन्वेषण के लिए कार्यवाही करेगा।

जब भूल-चूक के कारण प्राथमिकी में प्रथम सूचना दर्ज़ नहीं हो पाती है

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कभी-कभी शिकायतकर्ता अशिक्षित या पर्याप्त स्तर पर्यन्त साक्षर नहीं होता है, और कथित अपराध का विवरण लिखने में सक्षम नहीं होता है। इसके नतीजतन जो भी पहली सूचना प्राप्त होती है वह मौखिक रूप में होती है, और शिकायतकर्ता द्वारा कही गई बातों और पुलिस द्वारा लिखी गई बातों में छोटा मोटा अन्तर हो जाता है।


भ्रष्टाचार / राजनीतिक दबाव के कारण प्रथम सूचना से कम गंभीर प्राथमिकी / ऐफ़ आई आर

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अन्य मौकों पर मिली सूचना (जो लिखित शिकायत नहीं होती) को संशोधित करके लिख दिया जाता है। शिकायत का गलत और कमज़ोर संस्करण दर्ज़ किया जाता है। ऐसा आमतौर पर रिश्वतखोरी / भ्रष्टाचार के कारण, या सत्ता के विभिन्न केंद्रों द्वारा प्रभाव के दुरुपयोग के कारण, या राजनीतिक दबाव के कारण होता है।

के पी एस गिल ने धारा 482 सीआरपीसी के तहत निरस्तीकरण याचिका की मार्फ़त पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय को यह समझाने में कामयाबी हासिल की कि रूपन देओल बजाज द्वारा उनके खिलाफ दर्ज़ करवाई गई शारीरिक छेड़छाड़ की शिकायत में कोई अपराध नहीं बनता है। गिल के लिए समस्या यह थी कि सारी दुनिया पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय के विपरीत राय रखती थी। सर्वोच्च न्यायालय –जहां श्रीमती बजाज और उनके पति ने उच्च न्यायालय के फ़ैसले के खिलाफ दो अलग-अलग विशेष अनुमति याचिकाएं [4] दायर करी थीं– ने अपने निर्णय में पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय से सहमत होने के बजाय पूरी दुनिया से सहमति जताई।


मीडिया दबाव / भ्रष्टाचार / राजनीतिक दबाव के कारण तथ्यों / प्रथम सूचना से अधिक गंभीर प्राथमिकी / ऐफ़ आई आर

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विभिन्न रूप धारण करने वाला भ्रष्टाचार, और इसके अलावा राजनीतिक दबाव प्रायः उपरोक्त स्थिति के ठीक विपरीत परिणाम भी देते हैं, अर्थात ऐसी प्रथम सूचना रिपोर्ट बन जाती है जिसमें विवरण को संशोधित करके उसे वास्तविक घटना से अधिक गंभीर बना दिया जाता है। ऐसे मामलों में भी प्राथमिकी गलत होती है, लेकिन मूल शिकायत में किया गया संशोधन उसके गलत होने का कारण नहीं होता है। बल्कि, या तो मूल लिखित शिकायत ही गलत होती है या फिर कानूनी रूप से टिकने योग्य नहीं होती है।

निशा शर्मा / मुनीश दलाल दहेज़ मामला मीडिया के दबाव के कारण विनिर्मित अतिशयोक्ति का एक प्रमुख उदाहरण है, जिसमें आईपीसी की धारा 498A के तहत ऐफ़ आई आर दर्ज करी गई, जबकि शिकायतकर्ता ने प्रस्तावित विवाह की रस्में कभी पूरी नहीं करी थीं और इस के फलस्वरूप वह आरोपी की पत्नी ही नहीं थी। ध्यान देवें कि किसी भी व्यक्ति की पत्नी अथवा (उस व्यक्ति की) पत्नी के परिवार के सदस्य को ही धारा 498A के तहत शिकायत दर्ज़ करवाने की अनुमति है।


प्राथमिकी में प्रथम सूचना न समाविष्ट होने के अन्य / विविध कारण

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ऐसा भी हो सकता है कि किसी अपराध का शिकार व्यक्ति लाचार हो जाए या किसी अपराध-विशेष के सभी पीड़ितों की मृत्यु हो जाने के कारण कोई शिकायतकर्ता न बचा हो। ऐसे मामलों में पुलिस को सबसे पहली सूचना हमेशा दूसरे स्त्रोतों से मिलती है –और अक्सर ऐसे स्त्रोत अपनी शिकायत लिखित रूप में दर्ज़ करने को तैयार नहीं होते हैं। यहाँ पुलिस की मजबूरी यह है कि वह कई तरह के अपराधों में ऐफ़ आई आर दर्ज करने के लिए बाध्य है। ऐसी स्थितियों में वे खुद ही रिपोर्ट लिखने के लिए मजबूर हो जाते हैं।

ऐसा भी हो सकता है कि अपराध की रिपोर्ट करने वाले व्यक्ति के पास कोई ऐसा निहित अधिकार न हो जो उस अपराध का शिकायतकर्ता बनने के योग्य बनाए। ऐसे मामलों में विभिन्न कारकों के कारण ऐसी स्थिति उत्पन्न हो सकती है जो पुलिस को अपराध को अपनी भाषा में दर्ज करने के लिए मजबूर कर दे।



संदर्भ सूची :

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4)Mrs. Rupan Deol Bajaj & Another vs Kanwar Pal Singh Gill & Another on 12 October, 1995; Indiankanoon.org; Delhi; Undated; Retrieved on 08th May 2021

30) भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता; mha.gov.in; दिल्ली; बिना तिथि; २३ जून २०२५ को देखा गया






द्वारा लिखित
मनीष उदार द्वारा प्रकाशित।

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अंतिम अद्यतन ०६ जुलाई २०२५ को किया गया