ऐफ़. आई. आर. का पूर्ण रूप
पृष्ठ शीर्षभागअंग्रेज़ी के तीन अक्षरों से बने संक्षिप्त नाम ऐफ़.आई.आर. का पूर्ण रूप है फ़र्स्ट इन्फ़ॉर्मेशन रिपोर्ट। इसका हिंदी अर्थ है प्रथम सूचना रिपोर्ट। यह शब्दवृन्द हमारे देश में पुलिस रिपोर्ट का वर्णन करने के लिए इस्तेमाल किया जाता है। संक्षिप्त नाम ने अपना एक अलग ही जीवन प्राप्त कर लिया है और अब यह रोज़मर्रा के इस्तेमाल का शब्दवृन्द बन गया है। ऐफ़आईआर अथवा ऐफ़ आई आर। यह (इस शब्दवृन्द का रोज़ाना इस्तेमाल) खास तौर पर उन हलकों में सच है, जहाँ आप इन दिनों घूम रहे हैं, यानी वकीलों, पुलिस और जजों के बीच। "रिपोर्ट" शब्द का इस्तेमाल आम तौर पर "ऐफ़.आई.आर." के संक्षिप्त रूप में किया जाता है।
एक दिलचस्प बात यह है कि सीआरपीसी (आपराधिक प्रक्रिया संहिता) में कहीं भी यह परिभाषित नहीं किया गया है कि ऐफ़ आई आर क्या है। यहां तक कि "फ़र्स्ट इनफ़ॉर्मेशन रिपोर्ट" (अर्थात "प्रथम सूचना रिपोर्ट") वाक्यांश का ज़िक्र भी संहिता / कोड (यानि सीआरपीसी) में कहीं नहीं है।
धारा 498ए के मामलों में पुलिस शिकायत मिलने पर तुरंत ऐफ़आईआर दर्ज़ नहीं करती है। धारा 304बी के मामलों में स्थिति इसके उलट है।
प्राथमिकी / प्रथम सूचना रिपोर्ट / ऐफ़ आई आर दर्ज़ करने की प्रक्रिया
पृष्ठ शीर्षभागसबसे सरल स्थिति में ऐफ़ आई आर दर्ज़ करवाने की प्रक्रिया सरल है। कोई शिकायतकर्ता, जो आमतौर पर किसी अपराध का पीड़ित (या पीड़ितों में से एक) होता है, किसी अपराध के घटित होने की खबर लेकर पुलिस के पास पहुंचता है। अपराध या तो उक्त पुलिस स्टेशन के अधिकार क्षेत्र के भीतर या उसके अधिकार क्षेत्र के बाहर घटित हुआ होता है। कानून के अनुसार पुलिस को या तो उस शिकायतकर्ता से लिखित में शिकायत लेनी पड़ती है या फिर घटित अपराध के बारे में उसका मौखिक विवरण नोट करना पड़ता है। यदि शिकायतकर्ता द्वारा वर्णित अपराध (चाहे वह वर्णन सच हो या झूठ) एक या एक से अधिक संज्ञेय अपराधों का गठन करता है तो पुलिस को प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज़ करना आवश्यक होता है। यह आमतौर पर एसएचओ / पुलिस चौकी प्रभारी से अनुमोदन लेने के बाद किया जाता है। अन्य स्थितियों में उक्त प्रक्रिया लंबी होती है लेकिन यहां हम सबसे सरल स्थिति की बात कर रहे हैं।
संज्ञेय अपराध अपराधों की वह श्रेणी है जिसके बारे में पुलिस को ना सिर्फ़ न्यायालय की अनुमति के बिना फ़ौजदारी कार्रवाई शुरू करने का अधिकार है, बल्कि न्यायालय के आदेश की प्रतीक्षा किए बगैर ऐसी कार्रवाई शुरू करने का कर्त्तव्य है। इन अपराधों में अधिकांश ऐसे अपराध शामिल हैं जो भारतीय दंड संहिता या किसी अन्य कानून के तहत 3 या अधिक वर्षों के कारावास से दंडनीय हैं। सीआरपीसी धारा 154 [1] [2] [26] [27] शिकायत प्राप्त होने पर अनिवार्य रूप से प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज़ करने का कानूनी आधार है। इस धारा को यहाँ (नीचे) पुनर्प्रस्तुत किया गया है—
आपराधिक प्रक्रिया धारा 154 – संज्ञेय मामलों में सूचनापृष्ठ शीर्षभाग
(स्त्रोत: hindi.lawrato.com)
1) संज्ञेय अपराध के किए जाने से संबंधित प्रत्येक इतिला, यदि पुलिस थाने के भारसाधक अधिकारी को मौखिक दी गई है तो उसके द्वारा या उसके निदेशाधीन लेखबद्ध कर ली जाएगी और इतिला देने वाले को पढ़कर सुनाई जाएगी और प्रत्येक ऐसी इतिला पर, चाहे वह लिखित रूप में दी गई हो या पूर्वोक्त रूप में लेखबद्ध की गई हो, उस व्यक्ति द्वारा हस्ताक्षर किए जाएंगे जो उसे दे और उसका सार ऐसी पुस्तक में, जो उस अधिकारी द्वारा ऐसे रूप में रखी जाएगी जिसे राज्य सरकार इस निमित विहित करे, प्रविष्ट किया जाएगा।
परंतु यदि किसी स्त्री द्वारा, जिसके विरूद्ध भारतीय दंड संहिता (1860 का 45) की धारा 326A, धारा 326B, धारा 354, धारा 354A, धारा 354B, धारा 354C, धारा 354D, [1]धारा 376, धारा 376A, धारा 376AB, धारा 376B, धारा 376C, धारा 376D, धारा 376DA, धारा 376DB, धारा 376E, या धारा 509 के अधीन किसी अपराध के किए जाने की, अथवा अपराध का प्रयत्न किए जाने की कोई इत्तिला दी जाती है, तो ऐसी इत्तिला किसी महिला पुलिस अधिकारी या किसी महिला अधिकारी द्वारा अभिलिखित करी जाएगी;
परंतु यह और कि –
(a) यदि वह (पीड़ित या पीड़िता) व्यक्ति जिसके विरुद्ध किसी दूसरे (कथित अपराधी) व्यक्ति के द्वारा भारतीय दंड संहिता (1860 का 45) की धारा 354, धारा 354A, धारा 354B, धारा 354C, धारा 354D, [2]धारा 376, धारा 376A, धारा 376AB, धारा 376B, धारा 376C, धारा 376D, धारा 376DA, धारा 376DB, धारा 376E, या धारा 509 के अधीन अपराध के किए जाने का, अथवा करने का प्रयत्न किए जाने का. इल्ज़ाम लगाया गया है, अस्थायी या स्थायी रूप से मानसिक या शारीरिक रूप से निःशक्त है, तो ऐसी इत्तिला किसी पुलिस अधिकारी द्वारा उस व्यक्ति के, जो ऐसे अपराध की रिपोर्ट करने का इच्छुक है, निवास-स्थान पर, या यदि ऐसी वस्तुस्थिति हो, तो उस (अपराध की रिपोर्ट करने के इच्छुक) व्यक्ति की पसंद के किसी सुविधाजनक स्थान पर, दुभाषिये अथवा विशेष शिक्षक की उपस्थिति में अभिलिखित की जाएगी;
(b) ऐसी इत्तिला के अभिलेखन की वीडियो फ़िल्म तैयार करी जाएगी;
(c) पुलिस अधिकारी धारा 164 की उपधारा (5A) के खंड (a) के अधीन किसी न्यायिक मजिस्ट्रेट द्वारा उस व्यक्ति का कथन यथासंभवशीघ्र अभिलिखित कराएगा।
2) उपधारा (1) के अंतर्गत अभिलिखित जानकारी की प्रतिलिपि, इत्तिला देने वाले को तत्काल निःशुल्क दी जाएगी।
3) कोई भी व्यक्ति जो किसी पुलिस थाने के प्रभारी अधिकारी के उपधारा (1) में इंगित सूचना को अभिलिखित करने से इंकार करने से व्यथित है, वह ऐसी सूचना का सार लिखित रूप में और डाक द्वारा संबद्ध पुलिस अधीक्षक को भेज सकता है जो कि, यदि उसे यकीन हो जाता है कि ऐसी इत्तिला से किसी संज्ञेय अपराध का किया जाना प्रकट होता है तो, या तो स्वयं मामले का अन्वेषण करेगा या अपने अधीनस्थ किसी पुलिस अधिकारी द्वारा इस संहिता द्वारा उपबंधित शैली से अन्वेषण किए जाने का निर्देश देगा और ऐसे अधिकारी को उस अपराध के संबंध में उस पुलिस थाने के प्रभारी अधिकारी की सभी शक्तियां होंगी।
सीआरपीसी धारा 154 के फ़ुटनोट (हाशिये की टिप्पणियाँ)पृष्ठ शीर्षभाग
(स्त्रोत: गृह मंत्रालय, भारत सरकार)
1) 1) कुछ शब्द दंड विधि (संशोधन) अधिनियम, 2018 (अधिनियम संख्या 22, 2018) की धारा 11(i) द्वारा 11 अगस्त 2018 से प्रतिस्थापित
2) कुछ शब्द दंड विधि (संशोधन) अधिनियम, 2018 (अधिनियम संख्या 22, 2018) की धारा 11(ii) द्वारा 11 अगस्त 2018 से प्रतिस्थापित
किसी भी ऐसी शिकायत, जो किसी संज्ञेय अपराध के होने का खुलासा करती है, की प्राप्ति पर तुरंत प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज करने की आवश्यकता को ललिता कुमारी मामले [3] में उच्चतम न्यायालय की संविधान पीठ के फ़ैसले में भी विस्तार से समझाया गया है।
प्रत्येक शिकायत की प्राप्ति 3 रजिस्टरों में दर्ज़ करी जाती है, जो प्रत्येक पुलिस स्टेशन में रखे होते हैं। एक दैनिक डायरी है और दूसरा शिकायतों का रजिस्टर है। एक तीसरा रजिस्टर भी है जिसे एफ़आईआर का रजिस्टर कहा जाता है। यदि किसी शिकायत पर प्राथमिकी दर्ज़ करी जाती है, तो यह तथ्य इन सभी 3 रजिस्टरों में दर्ज़ किया जाता है, जो कि क्रमशः दैनिक डायरी, शिकायतों का रजिस्टर और एफ़आईआर का रजिस्टर हैं। यदि किसी शिकायत पर प्राथमिकी दर्ज़ नहीं करी जाती है तो उक्त शिकायत का रिकॉर्ड इन 3 रजिस्टरों में से केवल पहले 2 रजिस्टरों में दर्ज़ किया जाता है, जो कि दैनिक डायरी और शिकायतों का रजिस्टर हैं।
संबंधित पुलिस स्टेशन को कानून के अनुसार शिकायतकर्ता को प्राथमिकी की एक प्रति निःशुल्क प्रदान करना आवश्यक है (संदर्भ सीआरपीसी धारा 154(1) उपर्युक्त)।
क्या शिकायतकर्ता के लिए ऐफ़ आई आर को हस्ताक्षरित करना अनिवार्य है?
पृष्ठ शीर्षभागसीआरपीसी के अनुसार, कोई भी व्यक्ति जो किसी अपराध के बारे में पुलिस को सूचना देता है, उसे उस शिकायत पर हस्ताक्षर करना अनिवार्य है (सन्दर्भ सीआरपीसी धारा 154(1) ऊपर) जिसे वह प्रेषित करता है। वो इसे लिखित रूप में प्रेषित कर सकता है और प्रत्येक पृष्ठ पर अपने हस्ताक्षर कर सकता है, या फिर वो इसे संबंधित पुलिस स्टेशन के किसी भी कर्मचारी को लिखवा सकता है –जिसे उसे नोट करना पड़ेगा अथवा उसे टाइप करना पड़ेगा– और परिणामी लिखित शिकायत पर अपने हस्ताक्षर कर सकता है। ऐसा करने से इनकार करने पर उसे 3 महीने तक की कैद हो सकती है। यह प्रावधान लगभग कभी लागू नहीं होता। कम से कम इस लेखक ने ऐसा कुछ होते हुए कभी नहीं सुना।
इसके अलावा, शिकायतकर्ता को प्रथम सूचना रिपोर्ट की अपनी प्रति प्राप्त होने पर शिकायत रजिस्टर और प्राथमिकी रजिस्टर में यथोचित स्थानों पर अपना नाम हस्ताक्षरित करना आवश्यक है।
क्या शिकायत केवल उस पुलिस स्टेशन में जमा करी जा सकती है जिसका क्षेत्राधिकार होता है? / ज़ीरो ऐफ़आईआर
पृष्ठ शीर्षभागआजकल (अर्थात जून 2025 में) कानूनी रूप से जागरूक नागरिकों के दायरे में यह सामान्य ज्ञान है कि किसी भी अपराध-विशेष के बारे में पुलिस को दी जाने वाली शिकायत किसी भी पुलिस स्टेशन में जमा करवाई जा सकती है, और यह ज़रूरी नहीं है कि उसी पुलिस स्टेशन में शिकायत जमा करी जाए जिसका उस स्थान पर क्षेत्रीय अधिकार है जहां उक्त अपराध हुआ है। लेकिन जनता को ऐसी सुविधा उपलब्ध कराना किन कारणों से तर्कसंगत है? और इस तरह से शिकायत प्रेषित करने पर कैसी प्रक्रिया अपनाई जाती है? इन 2 सवालों के जवाब जानने के लिए आगे पढ़ें।
अक्सर ऐसा होता है कि अपराध-स्थल के सबसे नज़दीक स्थित थाना उस स्थल-विशेष का क्षेत्रीय पुलिस स्टेशन नहीं होता है। लेकिन यह भी सत्य है कि पीड़ित/शिकायतकर्ता के लिए –जो अपराध के बाद (सदमे और आघात के कारण) व्याकुलता और असमंजस की स्थिति में होता है– उस ख़ास थाने से संपर्क करना स्वाभाविक है जो अपराध के स्थान के सबसे नज़दीक होता है।
यह भी संभव है कि पीड़ित/शिकायतकर्ता को इस तथ्य की जानकारी ही न हो कि (कानून के अनुसार) क्षेत्रीय पुलिस स्टेशन ही ज़िम्मेदार पुलिस स्टेशन है, और इसलिए वह या तो निकटतम पुलिस स्टेशन या फिर किसी अन्य पुलिस स्टेशन में चला जाता है, जैसे कि उदाहरण के लिए वो पुलिस स्टेशन जो उस (पीड़ित) के कार्यस्थल के सबसे नज़दीक होता है।
ऐसा भी हो सकता है कि अपराध का क्रियान्वन चलती ट्रेन या बस या किसी अन्य परिवहन साधन में किया गया हो और पीड़ित/शिकायतकर्ता के लिए अपनी यात्रा को -पुलिस में शिकायत दर्ज़ करवाने के लिए- बीच में रोकना संभव न हो। ऐसे मामलों में पीड़ित की प्राथमिकता अपने घर/गंतव्य तक पहुंचना होती है, और अपने घर/गंतव्य तक पहुंचने के बाद ही वह अपने आप को शांत कर पाता है (यद्यपि केवल एक अधूरी हद तक) और आपराधिक शिकायत जमा करने के बारे में सोचना शुरू कर पाता है। दरअसल, उन स्थितियों में, जब पीड़ित अपराध के समय अपने घर से कहीं दूर जा रहा होता है, तो वह अक्सर पहले गंतव्य पर पहुंचता है, फिर वहां अपना काम यथासंभव अच्छे तरीके से करता है, फिर वापस अपने घर की यात्रा शुरू करता है और घर लौटने के बाद ही वह पुलिस में शिकायत प्रेषित करने की मानसिक दशा में आ पाता है।
बहुत अक्सर ऐसा भी होता है कि पीड़ित व्यक्ति / पीड़ित लोग अपराध के तुरंत बाद (चोटों या गंभीर मानसिक आघात के कारण) अस्पताल में भर्ती हो जाता है / हो जाते हैं और इसलिए वह / वे क्षेत्रीय पुलिस स्टेशन नहीं जा पाता है / पाते हैं। ऐसी दशाओं में पुलिस का उनके पास पहुंचकर उनकी शिकायत दर्ज़ करना मानवीय होता है। लेकिन ऐसा बहुत यदा-कदा ही किया जाता है। आमतौर पर ऐसा होता है कि पीड़ित के अस्पताल में रहने के दौरान शिकायत दर्ज़ नहीं होती है। आखिरकार उन्हें अस्पताल से छुट्टी मिल तो जाती है, लेकिन छुट्टी मिलने के बाद भी उन्हें एक निश्चित अवधि के लिए घर पर आराम करने की सलाह दी जाती है। ऐसे मामलों में अक्सर ऐसा होता है कि पीड़ित अपने निवास स्थान के सबसे नज़दीकी पुलिस स्टेशन में जाता है, न कि उस पुलिस स्टेशन में जिसका क्षेत्राधिकार उस स्थान पर होता है जहाँ अपराध हुआ था।
यहां तक कि बिना चोट के मामलों में भी, अपराध के पीड़ित हमेशा मानसिक रूप से हिल जाते हैं, और पर्याप्त समय बीत जाने के बाद ही वे अपने संतुलन-धैर्य को अच्छी मात्रा में पुनः प्राप्त कर पाते हैं। कई ऐसे कारणों से जो कि अज्ञात होने के कारण यहाँ उल्लिखित नहीं किए जा सकते हैं, पीड़ित व्यक्ति मानसिक तनाव की स्थिति में किसी दूसरे पुलिस स्टेशन में जा सकते हैं, न कि उस पुलिस स्टेशन में जिस का अपराध-स्थल पर क्षेत्राधिकार होता है।
उपरोक्त सभी स्थितियों में शिकायतकर्ता जिस भी थाने में सबसे पहले जाता है, उसे पूर्ण रूप से अपनी शिकायत उस ही पुलिस स्टेशन में दर्ज़ करवाने की वैधानिक अनुमति है। उक्त पुलिस स्टेशन अपनी शिकायत रजिस्टर और अपनी दैनिक डायरी में इसकी प्रविष्टि करेगा, लेकिन अपने प्राथमिकी रजिस्टर में नहीं। वो (थाना) उस शिकायत को ज़ीरो ऐफ़.आई.आर. के रूप में दर्ज करेगा, जो कि दरअसल ऐफ़.आई.आर. नहीं होती है, अपितु ऐफ़.आई.आर. के वास्तविक पंजीकरण के लिए (ऐसी स्थिति में आवश्यक) 2 चरणीय प्रक्रिया में पहला चरण होती है।
इसके बाद उक्त पुलिस स्टेशन उक्त ज़ीरो ऐफ़.आई.आर. को उस पुलिस स्टेशन को अग्रेषित करेगा, जिसके पास उस पर क्षेत्राधिकार है, और बाद वाला पुलिस स्टेशन इसे अपने ऐफ़.आई.आर. रजिस्टर, शिकायतों के रजिस्टर और अपनी दैनिक डायरी में दर्ज़ करेगा।
ज़ीरो प्राथमिकियों की व्यवस्था उस समय भी मौजूद थी, जब दंड प्रक्रिया संहिता (1973) लागू थी, इस तथ्य के बावजूद कि ऐसी ऐफ़.आई.आर. के पंजीकरण के संबंध में सीआरपीसी में कोई प्रावधान-विशेष नहीं था। बीएनएसएस (भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता) को 25 दिसंबर 2023 को भारत के राजपत्र में अधिसूचित किया गया था, और यह 1 जुलाई, 2024 से लागू हो गया था। अब, बीएनएसएस की धारा 173 (1) [29] ज़ीरो ऐफ़.आई.आर. के लिए कानूनी आधार प्रदान करती है। इसमें कहा गया है कि "किसी संज्ञेय अपराध के घटित होने से संबंधित प्रत्येक सूचना, चाहे वह किसी भी क्षेत्र में घटित हुआ हो, मौखिक रूप से या इलेक्ट्रॉनिक संचार के माध्यम से दी जा सकती है..."।
भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता – धारा 173(1)पृष्ठ शीर्षभाग
(source: delhipolice.gov.in)
173 – संज्ञेय मामलों में सूचना
(1) संज्ञेय अपराध के किए जाने से संबंधित प्रत्येक सूचना, उस क्षेत्र पर विचार किए बिना जहाँ अपराध किया गया है, मौखिक रूप से या इलैकट्रानिक संसूचना द्वारा पुलिस थाने के भारसाधक अधिकारी को दी जा सकेगी और यदि–
(i) मौखिक रूप से दी गई है, तो उसके द्वारा या उसके निदेश के अधीन लेखबद्ध की जाएगी और सूचना देने वाले को पढ़कर सुनाई जाएगी और प्रत्येक ऐसी सूचना पर, चाहे वह लिखित रूप में दी गई हो या पूर्वोक्त रूप में लेखबद्ध की गई हो, उस व्यक्ति द्वारा हस्ताक्षर किए जाएँगे ;
(ii) यदि इलैकट्रानिक संसूचना द्वारा दी गई है, तो उसे देने वाले व्यक्ति द्वारा तीन दिनों के भीतर हस्ताक्षरित किए जाने पर उस के द्वारा अभिलेख पर ली जाएगी, और उसका सार ऐसी पुस्तक में, जो उस अधिकारी द्वारा ऐसे रूप में रखी जाएगी, जिसे राज्य सरकार, इस निमित्त नियमों द्वारा निहित करे, प्रविष्ट किया जाएगा :
परंतु यदि किसी महिला द्वारा, जिसके विरुद्ध भारतीय न्याय संहिता, 2023 की धारा 64, धारा 65, धारा 66, धारा 67, धारा 68, धारा 69, धारा 70, धारा 71, धारा 74, धारा 75, धारा 76, धारा 77, धारा 78, धारा 79, या धारा 124 के अधीन किसी अपराध के किए जाने या किए जाने का प्रयत्न किए जाने का अभिकथन किया गया है, कोई सूचना दी जाती है तो ऐसी सूचना किसी महिला पुलिस अधिकारी या किसी महिला अधिकारी द्वारा अभिलिखित की जाएगी :
परंतु यह और कि–
(क) यदि वह व्यक्ति, जिसके विरुद्ध भारतीय न्याय संहिता, 2023 की धारा 64, धारा 65, धारा 66, धारा 67, धारा 68, धारा 69, धारा 70, धारा 71, धारा 74, धारा 75, धारा 76, धारा 77, धारा 78, धारा 79 या धारा 124** के अधीन किसी अपराध के किए जाने का या किए जाने का प्रयत्न किए जाने का अभिकथन किया गया है, अस्थायी या स्थायी रूप से मानसिक या शारीरिक रूप से दिव्यांग है, ऐसी सूचना किसी पुलिस अधिकारी द्वारा उस व्यक्ति के, जो ऐसे अपराध की रिपोर्ट करने की वांछा करता है, निवास स्थान या उस अपराध की रिपोर्ट होने की बाधा स्थित, निवास-स्थान पर या उस व्यक्ति के विकल्प के किसी सुगम स्थान पर, यथास्थिति, किसी द्विभाषिए या किसी विशेष शिक्षक की उपस्थिति में अभिलिखित की जाएगी ;
(ख) ऐसी सूचना के अभिलेखन की वीडियो फ़िल्म तैयार की जाएगी;
(ग) पुलिस अधिकारी धारा 183 की उपधारा (6) के खंड (क) के अधीन किसी मजिस्ट्रेट द्वारा उस व्यक्ति का कथन यथासंभवशीघ्र अभिलिखित कराएगा।
क्या हरएक प्राथमिकी / ऐफ़ आई आर में प्रथम सूचना वर्णित होती है?
पृष्ठ शीर्षभागप्रथम सूचना रिपोर्ट –जैसा कि नाम से ही पता चलता है– पुलिस को मिली पहली सूचना (अपराध के बारे में) पर आधारित होनी चाहिए। ऐसा हमेशा नहीं होता है।
जब प्रारंभिक जांच के कारण प्राथमिकी में प्रथम सूचना नहीं होती है
पृष्ठ शीर्षभागकभी-कभी पुलिस विभिन्न स्त्रोतों, जैसे मुखबिरों या समाचार आइटमों या आम लोगों से कुछ जानकारी (लिखित शिकायत नहीं, और मौखिक शिकायत भी नहीं) प्राप्त होने के बाद तुरंत प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज़ नहीं करती है, क्योंकि ऐसी जानकारी पर भरोसा कर के कानून के पहिये को गति देने से पहले प्रारंभिक जांच करना तर्कसंगत है। बीएनएसएस [30] की धारा 173 (3) (नीचे देखें) पुलिस द्वारा करी जाने वाली ऐसी प्रारंभिक जांच के लिए कानूनी आधार प्रदान करती है, यदि वह ऐसा करना चाहती है। ऐसे मामलों में पुलिस अपनी जांच पूरी करने के बाद अपनी भाषा में "प्रथम सूचना" रिपोर्ट लिखती है। प्रारंभिक जांच के बाद जो संस्करण लिखित रूप में अंकित किया जाता है वह मूल रूप से प्राप्त हुई सूचना का दूसरा या बाद का और संशोधित संस्करण होता है।
जब प्राथमिक जांच होने के बावजूद प्राथमिकी में प्रथम सूचना समाविष्ट होती है
पृष्ठ शीर्षभागउपरोक्त का ठीक विपरीत तब सत्य हो जाता है जब पुलिस को किसी ऐसे व्यक्ति से लिखित या मौखिक शिकायत प्राप्त होती है जो परिणामस्वरुप बनने वाले कानूनी प्रकरण में शिकायतकर्ता बनने के लिए तैयार और इच्छुक होता है। ऐसी स्थितियों में प्रारंभिक जांच के होने अथवा न होने का कोई महत्व नहीं रह जाता है, और पुलिस के पास आक्षेप को प्राथमिकी में "जैसा प्राप्त हुआ" लिखने के अलावा कोई विकल्प नहीं रह जाता है।
एक विशेष दशा तब पैदा हो जाती है जब पुलिस को कानून द्वारा या कानून द्वारा निर्धारित प्रक्रिया द्वारा प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज़ करने से पहले प्रारंभिक जांच करने की आवश्यकता होती है। यह दहेज़ प्रकरणों में विशेष रूप से सच है। दहेज़ के मामलों को प्रबंधित करने हेतु प्रत्येक राज्य में महिला अपराध प्रकोष्ठ स्थापित किए गए हैं और अन्य कार्यों के अलावा इन सी ए डब्ल्यू प्रकोष्ठों का काम दहेज़ की शिकायत प्राप्त होने पर प्रारंभिक जांच करना है। यहाँ अपनी बात को दोहराते हुए यह बताना ज़रूरी है कि सम्बद्ध महिला अपराध प्रकोष्ठ द्वारा की गई प्रारंभिक जांच के अस्तित्व के बावजूद, ऐसे मामलों में प्राथमिकियां प्रेषित लिखित शिकायतों से एक इंच भी भिन्न नहीं हो सकती हैं।
भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता – धारा 173(3)पृष्ठ शीर्षभाग
(source: mha.gov.in)
173 – संज्ञेय मामलों में सूचना
(3) धारा 175 में अंतर्विष्ट उपबंधों पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, ऐसे किसी संज्ञेय अपराध को करने से संबंधित सूचना की प्राप्ति पर, जिसमें तीन वर्ष या उससे अधिक का दंड है किन्तु सात वर्ष से कम का है, थाने का भारसाधक अधिकारी अपराध की प्रकृति और गंभीरता पर विचार करते हुए उप-पुलिस अधीक्षक की पंक्ति से अन्यून किसी अधिकारी से प्राप्त पूर्व अनुमति से,
(i) यह अभिनिश्चित करने के लिए कि क्या चौदह दिन की अवधि के भीतर मामले में कार्यवाही के लिए कोई प्रथमदृष्टया मामला विद्यमान है, आरंभिक जांच करने के लिए कार्यवाही कर सकेगा; या
(ii) जब कोई प्रथमदृष्टया मामला विद्यमान है, तब अन्वेषण के लिए कार्यवाही करेगा।
जब भूल-चूक के कारण प्राथमिकी में प्रथम सूचना दर्ज़ नहीं हो पाती है
पृष्ठ शीर्षभागकभी-कभी शिकायतकर्ता अशिक्षित या पर्याप्त स्तर पर्यन्त साक्षर नहीं होता है, और कथित अपराध का विवरण लिखने में सक्षम नहीं होता है। इसके नतीजतन जो भी पहली सूचना प्राप्त होती है वह मौखिक रूप में होती है, और शिकायतकर्ता द्वारा कही गई बातों और पुलिस द्वारा लिखी गई बातों में छोटा मोटा अन्तर हो जाता है।
भ्रष्टाचार / राजनीतिक दबाव के कारण प्रथम सूचना से कम गंभीर प्राथमिकी / ऐफ़ आई आर
पृष्ठ शीर्षभागअन्य मौकों पर मिली सूचना (जो लिखित शिकायत नहीं होती) को संशोधित करके लिख दिया जाता है। शिकायत का गलत और कमज़ोर संस्करण दर्ज़ किया जाता है। ऐसा आमतौर पर रिश्वतखोरी / भ्रष्टाचार के कारण, या सत्ता के विभिन्न केंद्रों द्वारा प्रभाव के दुरुपयोग के कारण, या राजनीतिक दबाव के कारण होता है।
के पी एस गिल ने धारा 482 सीआरपीसी के तहत निरस्तीकरण याचिका की मार्फ़त पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय को यह समझाने में कामयाबी हासिल की कि रूपन देओल बजाज द्वारा उनके खिलाफ दर्ज़ करवाई गई शारीरिक छेड़छाड़ की शिकायत में कोई अपराध नहीं बनता है। गिल के लिए समस्या यह थी कि सारी दुनिया पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय के विपरीत राय रखती थी। सर्वोच्च न्यायालय –जहां श्रीमती बजाज और उनके पति ने उच्च न्यायालय के फ़ैसले के खिलाफ दो अलग-अलग विशेष अनुमति याचिकाएं [4] दायर करी थीं– ने अपने निर्णय में पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय से सहमत होने के बजाय पूरी दुनिया से सहमति जताई।
मीडिया दबाव / भ्रष्टाचार / राजनीतिक दबाव के कारण तथ्यों / प्रथम सूचना से अधिक गंभीर प्राथमिकी / ऐफ़ आई आर
पृष्ठ शीर्षभागविभिन्न रूप धारण करने वाला भ्रष्टाचार, और इसके अलावा राजनीतिक दबाव प्रायः उपरोक्त स्थिति के ठीक विपरीत परिणाम भी देते हैं, अर्थात ऐसी प्रथम सूचना रिपोर्ट बन जाती है जिसमें विवरण को संशोधित करके उसे वास्तविक घटना से अधिक गंभीर बना दिया जाता है। ऐसे मामलों में भी प्राथमिकी गलत होती है, लेकिन मूल शिकायत में किया गया संशोधन उसके गलत होने का कारण नहीं होता है। बल्कि, या तो मूल लिखित शिकायत ही गलत होती है या फिर कानूनी रूप से टिकने योग्य नहीं होती है।
निशा शर्मा / मुनीश दलाल दहेज़ मामला मीडिया के दबाव के कारण विनिर्मित अतिशयोक्ति का एक प्रमुख उदाहरण है, जिसमें आईपीसी की धारा 498A के तहत ऐफ़ आई आर दर्ज करी गई, जबकि शिकायतकर्ता ने प्रस्तावित विवाह की रस्में कभी पूरी नहीं करी थीं और इस के फलस्वरूप वह आरोपी की पत्नी ही नहीं थी। ध्यान देवें कि किसी भी व्यक्ति की पत्नी अथवा (उस व्यक्ति की) पत्नी के परिवार के सदस्य को ही धारा 498A के तहत शिकायत दर्ज़ करवाने की अनुमति है।
प्राथमिकी में प्रथम सूचना न समाविष्ट होने के अन्य / विविध कारण
पृष्ठ शीर्षभागऐसा भी हो सकता है कि किसी अपराध का शिकार व्यक्ति लाचार हो जाए या किसी अपराध-विशेष के सभी पीड़ितों की मृत्यु हो जाने के कारण कोई शिकायतकर्ता न बचा हो। ऐसे मामलों में पुलिस को सबसे पहली सूचना हमेशा दूसरे स्त्रोतों से मिलती है –और अक्सर ऐसे स्त्रोत अपनी शिकायत लिखित रूप में दर्ज़ करने को तैयार नहीं होते हैं। यहाँ पुलिस की मजबूरी यह है कि वह कई तरह के अपराधों में ऐफ़ आई आर दर्ज करने के लिए बाध्य है। ऐसी स्थितियों में वे खुद ही रिपोर्ट लिखने के लिए मजबूर हो जाते हैं।
ऐसा भी हो सकता है कि अपराध की रिपोर्ट करने वाले व्यक्ति के पास कोई ऐसा निहित अधिकार न हो जो उस अपराध का शिकायतकर्ता बनने के योग्य बनाए। ऐसे मामलों में विभिन्न कारकों के कारण ऐसी स्थिति उत्पन्न हो सकती है जो पुलिस को अपराध को अपनी भाषा में दर्ज करने के लिए मजबूर कर दे।
ऐफ़ आई आर / प्राथमिकी में विलंब और ऐफ़ आई आर में विलंब होने के कारण होने वाले विलंब
पृष्ठ शीर्षभागआपराधिक कार्रवाईयों में देरी का विषय न केवल वादियों-प्रतिवादियों और वकीलों के लिए बल्कि पूरे देश के लिए दिलचस्प है। यहाँ ऐसी देरी के कुछ पहलुओं को संक्षेप में समझाया गया है।
क्या यह संभव है कि समय पर शिकायत करने के बावजूद प्राथमिकी बनने में देरी हो जाये?
पृष्ठ शीर्षभागएक आम कहावत है कि महान देश भारत में कुछ भी संभव है। समय पर शिकायत के बावजूद ऐफ़ आई आर में देरी होना बहुत छोटी बात है, और इतिहास गवाह है कि हमारे देश में ऐसी छोटी-छोटी बातें बहुत आम हैं।
इंदिरा गांधी की हत्या के बाद दिल्ली और कुछ अन्य शहरों में सिखों की सामूहिक हत्याओं के बाद प्रथम सूचना रिपोर्टों का देरी से दर्ज़ होने से बड़ा इस दुःखद तथ्य का कोई उदाहरण नहीं हो सकता है। विश्व स्तर पर ज्ञात और प्रकाशित ये अपराध अक्तूबर और नवंबर 1984 में राजीव गांधी के प्रधानमंत्री कार्यकाल के पहले कुछ दिनों के दौरान हुए थे, लेकिन दर्जनों मामलों में ऐफ़ आई आरें 1990, 1991, 1992 और 1993 तक में दर्ज़ करी गई थीं, [5] उनकी मृत्यु का भी ऐसी ही दुःखद परिस्थितियों में हो जाने के बाद। यदि इतना ही पर्याप्त रूप से निंदनीय नहीं था, तो कालान्तर में 31 अक्टूबर 1984 सहित कानपुर में सिखों की जितनी भी हत्याएं उन दिनों हुई थीं, उन से संबंधित सभी प्रथम सूचना रिपोर्टों को कानपुर में 'कार्यरत' उत्तर प्रदेश पुलिस [6] के कर्मचारियों द्वारा नष्ट कर दिया गया।
क्या पुलिस देर से प्राप्त होने वाली शिकायतों को स्वीकार करने के लिए कानूनी तौर से बाध्य है? (समय सीमा अधिनियम (आपराधिक कानून))
पृष्ठ शीर्षभागसमय-सीमाओं का क़ानून किसी भी देश में वह कानून होता है जो यह घोषित करता है कि उस देश-विशेष में प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज़ करने के उद्देश्य से प्रेषित करी गई किसी शिकायत को स्वीकार करने से पहले (अपराध के होने की तारीख से लेकर शिकायत के प्रेषित होने की तारीख तक) कितने वर्षों तक की ऐसी अवधि का बीत जाना प्रतिबंधित होता है, जैसी अवधि के समाप्त हो जाने के बाद कानूनी रूप से प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज़ करना असंभव हो जाता है। भारत में –जहाँ तक आपराधिक कानून का संबंध है– सीआरपीसी की धारा 468 इस विषय में मुनासिब कानून है [7] [8] [28]। इस धारा के अनुसार, किसी भी ऐसे अपराध के लिए जो केवल जुर्माने से दंडनीय है, सीमा अवधि छह महीने है, किसी भी अपराध के लिए जो एक वर्ष तक के कारागार-वास से दंडनीय है, सीमावधि एक वर्ष है, और किसी भी अपराध के लिए जो एक से तीन साल की कारागार दंड अवधि से दंडनीय है, सीमावधि तीन साल है।
आपराधिक प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी) धारा 468 – परिसीमा-काल की समाप्ति के पश्चात् संज्ञान लेने पर प्रतिबन्धपृष्ठ शीर्षभाग
(स्त्रोत: www.latestlaws.com)
(1) इस संहिता में जैसा अन्यथा अन्यत्र उपलब्ध है उसके सिवाय, कोई भी न्यायालय उपधारा (2) में विनिर्दिष्ट वर्ग के अपराध का संज्ञान परिसीमाकाल की समाप्ति के पश्चात् नहीं लेगा।
(2) परिसीमा-काल–
(a) छह मास होगा, यदि अपराध केवल जुर्माने से दण्डनीय है;
(b) एक वर्ष होगा, यदि अपराध एक वर्ष से अनधिक की अवधि के लिए कारावास से दण्डनीय है;
(c) तीन वर्ष होगा, यदि अपराध एक वर्ष से अधिक किन्तु तीन वर्ष से अनधिक की अवधि के लिए कारावास से दण्डनीय है।
(3) [1]इस धारा के प्रयोजनों के लिए उन अपराधों के संबंध में, जिनका एक साथ विचारण किया जा सकता है, परिसीमा-काल उस अपराध के हवाले से अवधारित किया जाएगा जो, यथास्थिति, कठोरतर या कठोरतम दण्ड से दण्डनीय है।
सीआरपीसी धारा 468 का फ़ुटनोट (हाशिये की टिपण्णी)पृष्ठ शीर्षभाग
(स्त्रोत: devgan.in)
1) इस अध्याय के प्रावधान कुछ आर्थिक अपराधों पर लागू नहीं होंगे, आर्थिक अपराध (सीमा की अनुपयुक्तता) अधिनियम, 1974 (1974 का 12), धारा 2 और अनुसूची देखें।
चूंकि धारा 498A के तहत अधिकतम 3 साल की सज़ा हो सकती है, इसलिए दहेज़ उत्पीड़न या दहेज़ क्रूरता से संबंधित किसी भी शिकायत को अंतिम अधियाचित घटना के तीन साल के भीतर रिपोर्ट किया जाना चाहिए। यही बात लागू होती है धारा 406 पर, जो आपराधिक विश्वासघात से संबंधित है। धारा 34 के तहत सबसे खराब स्थिति में एक साल के कारावास की सज़ा हो सकती है, लेकिन एक साल की यह अवधि धारा 498A/406/34 के तहत प्रेषित करी गई किसी भी शिकायत को प्रभावित नहीं करती है, सीआरपीसी धारा 468(3) (ऊपर पुन: प्रस्तुत) में निहित प्रावधान की वजह से।
क्या अदालतें विलंबित प्राथमिकियों को गंभीरता से लेती हैं? (वारंट मामले, गंभीर अपराध, जघन्य अपराध)
पृष्ठ शीर्षभागकई अपराधों में देरी से दर्ज़ करवाई गई प्राथमिकी को अदालतें गंभीरता से नहीं लेती हैं। कई अन्य अपराधों में देरी के बावजूद ऐफ़ आई आर को एक महत्वपूर्ण दस्तावेज़ के रूप में स्वीकार किया जाता है।
गंभीर अपराधों (जिन अपराधों के लिए 7 साल या उस से अधिक कारावास की सज़ा हो सकती है) में देरी को वारंट मामलों (जिन अपराधों से संबंधित मामलों में 2 या उससे अधिक साल की जेल की सज़ा हो सकती है) की तुलना में अधिक आसानी से माफ़ कर दिया जाता है। जघन्य अपराधों (जिन अपराधों के लिए आजीवन कारावास या मृत्युदंड की सज़ा हो सकती है) में प्राथमिकी दर्ज़ करने में हुई कोई भी देरी मायने नहीं रखती।
जहां तक दहेज़ के प्रकरणों का सवाल है, अदालतें आईपीसी की धारा 498A, आईपीसी की धारा 406 और आईपीसी की धारा 34 के तहत देरी से दर्ज़ करी गई शिकायतों को अत्याधिक गंभीरता से नहीं लेती हैं। शिकायत मिलने पर प्राथमिकी दर्ज़ करना अनिवार्य है –498A के मामलों में एक छोटी सी शर्त के साथ– क्योंकि ये सभी धाराएं संज्ञेय अपराधों से संबंधित हैं। सीआरपीसी की धारा 498A से संबंधित मामलों में कानून द्वारा स्थापित शर्त यह है कि एक सी ए डब्ल्यू सैल (महिला अपराध प्रकोष्ठ) प्रक्रिया है जिससे शिकायतकर्ता और मुख्य आरोपी को गुज़रना पड़ता है, इससे पहले कि शिकायत को संबंधित पुलिस स्टेशन को अग्रेषित करने के बारे में निर्णय लिया जाए।
प्राथमिकी में "अहम तथ्य" क्या होते हैं?
पृष्ठ शीर्षभागकिसी प्राथमिकी में अधिक महत्वपूर्ण बातों में से एक बात यह है कि सभी अहम तथ्य और परिस्थितियां उसमें दर्ज़ होने चाहिएं। कानूनी भाषा में, अहम तथ्य वे तथ्य हैं –और अहम सूचना वो सूचना है– जिनकी / जिसकी सत्यता या सत्यता की कमी किसी प्रकरण-विशेष की दिशा और मार्ग बदल सकते हैं / सकती है।
कुछ तत्व जो प्रत्येक ऐफ़ आई आर के वांछनीय घटक हैं
पृष्ठ शीर्षभागमदभुशी श्रीधर ने अपनी रचना ऐफ़आईआर, अरैस्ट ऐण्ड बेल (प्रथम सूचना रिपोर्ट, गिरफ़्तारी और जमानत) (श्रीधर, एम.; ऐफ़आईआर, अरैस्ट ऐण्ड बेल; एशिया बुक हाऊज़; हैदराबाद; 2010) [9] में ऐफ़आईआर का काफी व्यापक विश्लेषण किया है। उन्होंने पहले के विशेषज्ञों को उद्धृत करते हुए कहा है कि एक प्रथम सूचना रिपोर्ट में ग्यारह आवश्यक "क" होने चाहिएँ। हालांकि यह ध्यान दिया जाना चाहिए कि तत्वों की ऐसी कोई भी सूची वास्तव में केवल तत्वों की एक वांछनीय सूची हो सकती है, न कि तत्वों की एक आवश्यक सूची। ऐसा इसलिए है क्योंकि कोई भी एफआईआर कानूनी रूप से अस्वीकार्य नहीं है, भले ही उसमें कोई भी या सभी तथाकथित आवश्यक तत्व शामिल हों या नहीं। श्रीधर की पुस्तक में दिए गए ग्यारह आवश्यक "क" से शुरू होने वाले तत्वों को यहाँ दूसरे शब्दों में संक्षिप्त रूप से सूचीबद्ध किया गया है—
1) शिकायतकर्ता / ज्ञापक द्वारा क्या जानकारी दी गई है?
2) यह जानकारी किस हैसियत से दी गई है?
3) अपराध किसने किया?
4) अपराध किसके विरुद्ध किया गया?
5) अपराध कब किया गया?
6) अपराध कहाँ किया गया?
7) अपराध क्यों किया गया? यानि यह पूछना कि, मकसद क्या था?
8) किस तरीके से अपराध को अंजाम दिया गया / कैसी आपराधिक कार्यप्रणाली को प्रयोग किया गया?
9) क्या कोई गवाह हैं? वे कौन हैं?
10) आरोपी क्या लेकर गए? या आरोपी ने क्या नुकसान पहुँचाया?
11) आरोपी ने क्या निशान छोड़े?
मेडिको लीगल प्रमाणपत्र
पृष्ठ शीर्षभागयदि कोई व्यक्ति किसी व्यक्ति के घायल होने की सूचना देता है, तो संबंधित एसएचओ अर्थात थाना प्रभारी का कर्तव्य है कि वह अपने पुलिस स्टेशन की दैनिक डायरी में उसे दर्ज़ करे और सूचना देने वाले द्वारा किए गए दावे की सच्चाई को सत्यापित करने के लिए तत्काल अस्पताल पहुंचे। अस्पताल जाने का एक अन्य आवश्यक उद्देश्य समय पर चिकित्सा-कानूनी औपचारिकताओं का पूरा होना सुनिश्चित करना है। एमएलसी या मेडिको-लीगल सर्टिफ़िकेट किसी भी आपराधिक मामले में और इस वजह से, किसी भी आपराधिक शिकायत / एफआईआर में प्रमाणादि का एक महत्वपूर्ण घटक है। दहेज़ के मामलों में पत्नी का पक्ष बहुत मज़बूत हो जाता है अगर उसके पास ऐसा कोई दस्तावेज़ हो। हालांकि, हर हफ़्ते हमारी अदालतों में ऐसे कई मामले आते हैं, जिनमें एमएलसी के अस्तित्व के बावजूद आपराधिक बचाव वकीलों द्वारा शिकायतकर्ता द्वारा किए गए धोखे का पर्दाफ़ाश किया जाता है। इससे कभी-कभी झूठ बोलने वाले शिकायतकर्ता के विरुद्ध आरोप दायर होने की नौबत आ जाती है।
क्या ऐफ़आईआर को सुबूत के तौर पर इस्तेमाल किया जा सकता है?
पृष्ठ शीर्षभागमदभुशी श्रीधर ने अपनी पुस्तक में एक और दिलचस्प विषय को सम्बोधित किया है (ऊपर देखें) कि क्या किसी प्राथमिकी को सबूत के तौर पर इस्तेमाल किया जा सकता है। उनका कहना है कि ऐफ़आईआर को सबूत नहीं माना जा सकता। वो सिर्फ़ एक सूचना-संग्रह होती है जो कानूनी प्रक्रिया को गति प्रदान करती है और पुलिस द्वारा करी जाने वाली जांच का आधार बनती है। गवाहों द्वारा दिए गए बयान, वकील द्वारा दिए गए तर्क, अदालत में पेश किए गए सबूत, ये सभी उपस्थित प्रकरण-विशेष का निपटारा करने के सन्दर्भ में प्रथम सूचना रिपोर्ट से बेहतर हैं। अगर ये सभी मद प्राथमिकी की पुष्टि करती हैं, तो दोषसिद्धि की संभावना कई गुना बढ़ जाती है। लेकिन अगर वे प्राथमिकी का विरोध करती हैं, तो मामला कमज़ोर हो जाता है, क्योंकि प्राथमिकी का इस्तेमाल इन चीज़ों को खारिज करने के लिए नहीं किया जा सकता। सच्चाई अदालत में सामने आती है, या कम से कम यह माना जाता है कि वो अदालत में ही सामने आती है, और प्रथम सूचना रिपोर्ट ऐसी कार्रवाईयों में निर्णायक कारक नहीं होती है।
उपरोक्त बात से BNS 85 / IPC 498a के आरोपी पुरुषों और उनके माता-पिता को बहुत साहस और उम्मीद मिलनी चाहिए, क्योंकि यह कानून के एक वरिष्ठ शिक्षक द्वारा प्रेषित स्पष्ट संकेत (का संक्षिप्त संस्करण) है कि एक अच्छा आपराधिक वकील आपकी BNS 85 / IPC 498a पत्नी, उसके परिवार और उसके प्रायोजकों द्वारा उपजाए गए झूठों की पूरी इमारत को ध्वस्त कर सकता है। इससे ऐसे पुरुषों को भी उम्मीद और हिम्मत मिलनी चाहिए जिन पर बेतरतीब ढंग से शारीरिक छेड़छाड़ / छेड़छाड़ / बलात्कार आदि का आरोप लगाया गया है।
सर्वोच्च न्यायालय के कुछ ऐसे निर्णय जो प्राथमिकी को साक्ष्य के रूप में प्रयुक्त करने से वर्जित करते हैं
पृष्ठ शीर्षभागसुप्रीम कोर्ट के कई ऐसे फ़ैसले हैं जिनमें अदालत ने प्राथमिकी का ठोस सबूत के तौर पर प्रयोग होना प्रतिबंधित किया है। तीन पूर्ण-पीठ निर्णय [11] [12] [13] यहां उद्धृत किए गए हैं–
बॉम्बे राज्य बनाम रूसी मिस्त्री और एक अन्य
पृष्ठ शीर्षभागइनमें से पहला और सबसे पुराना है बॉम्बे राज्य बनाम रूसी मिस्त्री और एक अन्य ।
सर्वोच्च न्यायालय
समतुल्य उद्धरण: AIR 1960 SC 391;
बॉम्बे राज्य बनाम रूसी मिस्त्री और एक अन्य
निर्णय की तिथि: 24/09/1959
भारत के सर्वोच्च न्यायालय की पूर्ण पीठ द्वारा निर्णय लिया गया
दास, एस. (J)
गजेंद्रगडकर, पी. (J)
सुब्बा राव, के. (J)
निर्धारित हुआ (निर्णय के 7वें अनुच्छेद में):
"...प्रथम सूचना रिपोर्ट, दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 154 के अंतर्गत दर्ज़ करी गई जानकारी होती है। यह किसी अपराध के घटित होने से संबंधित पुलिस अधिकारी को दी गई सूचना होती है। यह सूचना-प्रेषक द्वारा दी गई सूचना भी होती है, जिस पर जांच शुरू की जाती है। इसे जांच शुरू होने के बाद प्राप्त सूचना से अलग समझा जाना चाहिए। वो सूचना दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 161 और 162 के अंतर्गत आती है। यह भली भांति स्थापित है कि प्रथम सूचना रिपोर्ट ठोस सबूत नहीं है, बल्कि इसका उपयोग केवल अदालत में दिए गए सूचना-प्रेषक के साक्ष्य की पुष्टि या खंडन करने के लिए या उसकी विश्वसनीयता पर सवाल उठाने के लिए किया जा सकता है। इसका अर्थ यह है कि न्यायाधीश ज्यूरी (पंच समूह) के समक्ष ऐसी रिपोर्ट को ठोस सबूत के रूप में नहीं रख सकता है, अपितु केवल उसके उस हिस्से का उल्लेख कर सकता है, जिसका उपयोग उपर्युक्त उद्देश्यों में से किसी एक के लिए किया जाया गया हो।" (प्रमुखता आपूर्तित)
अघनू नागेसिया बनाम बिहार राज्य
पृष्ठ शीर्षभागइस श्रृंखला में अगला निर्णय है अघनू नागेसिया बनाम बिहार राज्य ।
सर्वोच्च न्यायालय
समतुल्य उद्धरण: 1966 AIR 119; 1966 SCR (1) 134;
अघनू नागेसिया बनाम बिहार राज्य
निर्णय की तिथि: 04/05/1965
भारत के सर्वोच्च न्यायालय की पूर्ण पीठ द्वारा निर्णय लिया गया
बचावत, आर.एस. (J)
सुब्बा राव, के. (J)
दयाल, आर. (J)
निर्धारित हुआ (निर्णय के 10वें अनुच्छेद में):
"दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 154 प्रथम सूचना के अभिलेखन का प्रावधान करती है। सूचना रिपोर्ट अपने आप में ठोस साक्ष्य नहीं है। इसका उपयोग साक्ष्य अधिनियम की धारा 157 के अंतर्गत मुखबिर की पुष्टि करने या अधिनियम की धारा 145 के अंतर्गत उसका खंडन करने के लिए किया जा सकता है, यदि मुखबिर को गवाह के रूप में बुलाया जाता है। यदि प्रथम सूचना अभियुक्त द्वारा स्वयं दी जाती है, तो उसके द्वारा सूचना देने का तथ्य साक्ष्य अधिनियम की धारा 8 के अंतर्गत उसके आचरण के साक्ष्य के रूप में उसके विरुद्ध स्वीकार्य है। " (प्रमुखता आपूर्तित)
आप्रेन जोसेफ़ उर्फ़ करेंट कुंजुकुंजू और अन्य बनाम केरल राज्य
पृष्ठ शीर्षभागतीसरा निर्णय, जो उपरोक्त दो निर्णयों में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा अपनाए गए रुख को दोहराता है, आप्रेन जोसेफ़ उर्फ़ करेंट कुंजुकुंजू और अन्य बनाम केरल राज्य है।
सर्वोच्च न्यायालय
समतुल्य उद्धरण: 1973 AIR 1; 1973 SCR (2) 16; 1973 SCC (3) 114;
आप्रेन जोसेफ़ उर्फ़ करेंट कुंजुकुंजू और अन्य बनाम केरल राज्य
निर्णय की तिथि: 01/09/1972
भारत के सर्वोच्च न्यायालय की पूर्ण पीठ द्वारा निर्णय लिया गया
दुआ, आई.डी. (J)
शेलत, जे.एम. (J)
खन्ना, एच.आर. (J)
निर्धारित हुआ (निर्णय के 10वें अनुच्छेद में):
"प्रथम सूचना रिपोर्ट अपराध के घटित होने से संबंधित एक रिपोर्ट है, जो पुलिस को दी जाती है और उसके द्वारा दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 154 के तहत दर्ज़ करी जाती है। जैसा कि प्रिवी काउंसिल ने एच.ई. बनाम ख्वाजा (1) में कहा है, पुलिस द्वारा सूचना रिपोर्ट की प्राप्ति और अभिलेख आपराधिक जांच शुरू करने के लिए एक पूर्व शर्त नहीं है। न ही अधिनियम में यह प्रावधान है कि ऐसी सूचना रिपोर्ट केवल किसी प्रत्यक्षदर्शी द्वारा ही दी जा सकती है।धारा 154 के तहत प्रथम सूचना रिपोर्ट को ठोस सबूत का एक खण्ड भी नहीं माना जाता है। इसका उपयोग केवल अदालत में सूचना-प्रेषक के साक्ष्य की पुष्टि या खंडन करने के लिए किया जा सकता है। लेकिन यह सूचना दर्ज़ होने के उपरांत सूचना-प्रेषक द्वारा स्थापित मामले का आधार होता है। यह बहुत उपयोगी होती है यदि इसे अलंकृत करने का समय और अवसर मिलने से पहले, या मुखबिर की याददाश्त फ़ीकी पड़ने से पहले दर्ज़ कर लिया जाए।" (प्रमुखता आपूर्तित)
वे परिस्थितियाँ जिन में ऐफ़ आई आर (का कुछ भाग) ठोस सुबूत बन जाता है
पृष्ठ शीर्षभागएक ऐफ़ आई आर (या उसका हिस्सा) तब ठोस सबूत बन जाता है जब उसे संबंधित अदालत द्वारा ठोस सबूत के रूप में स्वीकार कर लिया जाता है। ऐसा 3 सामान्य परिस्थितियों और कुछ अतिरिक्त परिस्थितियों में होता है, जिनमें से सभी को भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 32 में देखा जा सकता है। जहाँ तक 3 सामान्य परिस्थितियों का सवाल है, आप पहली परिस्थिति यहाँ (नीचे), दूसरी परिस्थिति यहाँ (नीचे), और तीसरी परिस्थिति यहाँ (नीचे)) देख सकते हैं। ये तीनों सामान्य परिस्थितियाँ भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 32(1) में वर्णित हैं, तथा ये सभी मृत्यु से संबंधित हैं।
ध्यान दें कि मृत व्यक्तियों द्वारा दिए गए कुछ कथन भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 8 और/या धारा 6 के अंतर्गत भी स्वीकार किए जा सकते हैं (भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 32(1) के अतिरिक्त) जैसा कि धारा 8 के सन्दर्भ में दामोदरप्रसाद चंद्रिकाप्रसाद [31] (नीचे देखें) और धारा 6 के सन्दर्भ में रतन सिंह [32] (नीचे देखें) में देखा जा सकता है।
साक्ष्य अधिनियम की धारा 32 के शेष भाग पर आएं तो, ध्यान दें कि सर्वोच्च न्यायालय की पूर्ण पीठ ने कंस राज [33] (नीचे देखें) में घोषित किया है कि भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 32 की किसी भी उपधारा के तहत (न कि केवल धारा 32(1) के तहत) स्वीकृत कोई भी कथन उसके बाद मूल साक्ष्य बनता है, जब ऐसे कथन पर निर्भर करने वाले व्यक्ति या एजेंसी द्वारा यह साबित कर दिया जाता है कि ऐसा कथन वाकई संबंधित व्यक्ति द्वारा दिया गया था। यदि सुप्रीम कोर्ट के इस नज़रिये को स्पष्ट और असंदिग्ध कथन के रूप में स्वीकार किया जाता है तो यह कहना आवश्यक हो जाता है कि यदि न केवल मृत व्यक्तियों के बल्कि उन व्यक्तियों के भी जो मिल नहीं सकते और उन व्यक्तियों के भी जिनकी उपस्थिति प्राप्त करना कुछ ज़्यादा कठिन है, कुछ प्रकार के कथन किसी प्रथम सूचना रिपोर्ट में शामिल हैं, तो उक्त प्रथम सूचना रिपोर्ट ठोस साक्ष्य बन जाती है।
साक्ष्य अधिनियम की धारा 32(1) [20] का प्रालेख मात्र यहाँ निम्नलिखित है–
भारतीय साक्ष्य अधिनियम धारा 32(1): वे दशाएं जिनमें किसी ऐसे व्यक्ति द्वारा बोला हुआ प्रासंगिक तथ्य का कथन प्रासंगिक है जो मर चुका है या ढूँढा नहीं जा सकता है, इत्यादिपृष्ठ शीर्षभाग
किसी ऐसे व्यक्ति, जो मर चुका है, या जिसे ढूँढा नहीं जा सकता है, या जो साक्ष्य देने में असमर्थ हो गया है, या जिसकी (अदालत में) हाज़िरी किसी ऐसे विलम्ब या व्यय के बिना सुनिश्चित नहीं की जा सकती है, जो (विलम्ब या व्यय) मामले की परिस्थितियों के मद्देनज़र न्यायालय को अनुचित प्रतीत होता है, द्वारा दिए गए सुसंगत तथ्यों के लिखित या मौखिक कथन, निम्नलिखित मामलों में अपने आप में सुसंगत तथ्य होते हैं–
(1) जब वह (कथन) मृत्यु के कारण से संबंधित हो– जब वह कथन किसी व्यक्ति द्वारा उसकी (अपनी) मृत्यु के कारण के बारे में, या उस परिस्थित-समूह के किसी भी पहलू के बारे में बोला गया होता है जिसके परिणामस्वरूप उसकी मृत्यु हुई होती है, ऐसे मामलों में जिनमें उस व्यक्ति की मृत्यु के कारण पर सवाल उठ जाता है।
ऐसे कथन सुसंगत होते हैं, चाहे उन्हें देने वाला व्यक्ति, उनके बोले जाने के समय, मृत्यु होने की आशंका कर रहा था या नहीं कर रहा था, और उस कार्रवाई की प्रकृति चाहे जैसी भी हो, जिस (कार्रवाई) में उसकी मृत्यु के कारण पर सवाल उठ जाता है।
ऊपर बताई गई 3 सामान्यतः देखी जाने वाली परिस्थितियों का विस्तृत विवरण नीचे दिया गया है—
जब किसी प्राथमिकी में देहावसान पूर्व ऐलान समाविष्ट हो
पृष्ठ शीर्षभागयदि मृत्यु पूर्व कथन किसी प्रथम सूचना रिपोर्ट का हिस्सा होवे, तो वह प्रथम सूचना रिपोर्ट ठोस सबूत बन जाती है।
(यह कहना ज़्यादा तर्कसंगत है कि उस प्राथमिकी का वो हिस्सा ठोस सबूत बन जाता है जिसमें उक्त मृत्यु पूर्व कथन शामिल होता है, साथ ही वो हिस्सा भी जिसकी उत्पत्ति उक्त मृत्यु पूर्व कथन के अर्थ से सीधे रूप से हुई होती है। यहां यह भी अनुमान लगाया जा सकता है कि ऐसे मामलों में पूरी प्राथमिकी भी ठोस सबूत के रूप में मानने योग्य बन सकती है, यदि न्यायाधीश प्रस्तुत तथ्यों के समूचे ढांचे को ध्यान में रखते हुए ऐसा करने का फ़ैसला करता है, लेकिन अनुमान तो अनुमान ही होते हैं।)
यह ध्यान देने योग्य है कि प्रत्येक मृत्यु पूर्व कथन भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 32(1) के तहत साक्ष्य के रूप में स्वीकार्य है, लेकिन केवल तभी जब यह स्थापित हो जाए कि ऐसी घोषणा वास्तव में उस व्यक्ति द्वारा की गई थी जिसकी मृत्यु हो गई थी।
इसके अलावा ध्यान दें कि मृत्यु पूर्व कथन केवल उन मामलों में स्वीकार्य है जहां संबंधित व्यक्ति की मृत्यु होने के कारण पर प्रश्न उठ जाता है। उस कार्रवाई की प्रकृति जिस में इस पहलू पर प्रश्न उठ जाता है, महत्वहीन है। इसे कहने का एक अन्य तरीका यह है कि मृत्युपूर्व बयान सभी प्रकार की कानूनी कार्रवाईयों में स्वीकार्य होते हैं, न कि केवल हत्या/आत्महत्या से संबंधित कार्रवाईयों में, बशर्ते कि प्रासंगिक कार्यवाही-विशेष में मृत व्यक्ति की मृत्यु का कारण प्रश्नगत हो जावे।
जब किसी ऐफ़ आई आर में किसी मृत व्यक्ति की मृत्यु के संभावित कारण के बारे में घोषणा समाविष्ट हो
पृष्ठ शीर्षभागयदि कोई व्यक्ति अपनी मृत्यु के संभावित कारण के बारे में बयान देता है और बाद में उसकी मृत्यु हो जाती है और ऐसा बयान किसी प्राथमिकी का हिस्सा बन जाता है तो प्राथमिकी का वह हिस्सा जिसमें ऐसा बयान होता है और वह हिस्सा जो सीधे ऐसे बयान से निकला होता है, ठोस सबूत बन जाता है।
जब किसी प्राथमिकी (अर्थात ऐफ़ आई आर) में किसी मृत व्यक्ति की मृत्यु से संबंधित किसी परिस्थिति के बारे में घोषणा शामिल हो
पृष्ठ शीर्षभागयदि कोई व्यक्ति किसी परिस्थिति के बारे में बयान देता है, और बाद में यह हो जाता है / यह पता चलता है कि वह परिस्थिति किसी ऐसे आदान-प्रदान से संबंधित थी जिसके कारण उसकी मृत्यु हुई, तो प्राथमिकी का वह हिस्सा जिसमें ऐसा बयान होता है और वह हिस्सा जो सीधे ऐसे बयान से निकला होता है, वे ठोस सबूत बन जाते हैं। उक्त परिस्थिति संबंधित व्यक्ति की मृत्यु से बहुत पहले घटित हुई हो सकती है; इससे उक्त बयान की स्वीकार्यता प्रभावित नहीं होती है।
सर्वोच्च न्यायालय के कुछ ऐसे फ़ैसले जिन में प्राथमिकी को साक्ष्य के रूप में प्रयोग किये जाने को कानूनी मंज़ूरी दी गई है
पृष्ठ शीर्षभागयहां सर्वोच्च न्यायालय के पांच निर्णयों का हवाला दिया जा रहा है, ताकि उन परिस्थितियों की विविधता को चित्रित किया जा सके, जिन के तहत किसी प्रथम सूचना रिपोर्ट को सबूत माना जा सकता है। [21] [22] [23] [24] [25]
दामोदरप्रसाद चंद्रिकाप्रसाद एवं अन्य बनाम महाराष्ट्र राज्य
पृष्ठ शीर्षभागदामोदरप्रसाद चंद्रिकाप्रसाद एवं अन्य बनाम महाराष्ट्र राज्य सर्वोच्च न्यायालय द्वारा 1971 में निर्णित किया गया था।
सर्वोच्च न्यायालय
समतुल्य उद्धरण: 1972 AIR 622; 1972 SCR (2) 622;
दामोदरप्रसाद चंद्रिकाप्रसाद एवं अन्य बनाम महाराष्ट्र राज्य
निर्णय तिथि: 29/11/1971
भारत के सर्वोच्च न्यायालय के एकल न्यायाधीश द्वारा निर्णीत
रे, ए.एन. (J)
निर्धारित हुआ (निर्णय के 8वें अनुच्छेद में):
"...कुछ मामलों में, प्रथम सूचना रिपोर्ट का प्रयोग साक्ष्य अधिनियम की धारा 32(1) के तहत या साक्ष्य अधिनियम की धारा 8 के तहत मुखबिर की मृत्यु के कारण के बारे में (प्रमाण के) अथवा मुखबिर के आचरण के भाग के (प्रमाण के) रूप में किया जा सकता है। ..."
टहल सिंह एवं अन्य बनाम पंजाब राज्य
पृष्ठ शीर्षभागटहल सिंह एवं अन्य बनाम पंजाब राज्य में तय किया गया मुख्य कानूनी मुद्दा यह था कि किसी मृत व्यक्ति द्वारा दिये गये बयान का ठोस साक्ष्य के रूप में स्वीकार्य होने के लिए क्या यह ज़रूरी है कि उस व्यक्ति ने वो बयान अपनी मृत्यु होने की आशंका की अवस्था में ही दिया हो?
सर्वोच्च न्यायालय
समतुल्य उद्धरण: AIR 1979 SC 1347; 1979 CriLJ 1031; 1980 Supp (1) SCC 400;
टहल सिंह एवं अन्य बनाम पंजाब राज्य
निर्णय की तिथि: 27/10/1978
भारत के सर्वोच्च न्यायालय की एक खंडपीठ द्वारा निर्णीत
सिंह, जे. (J)
रेड्डी, ओ.सी. (J)
निर्धारित हुआ (निर्णय के 4थे अनुच्छेद में):
"... हमे डॉ. चिताले के इस सुझाव में भी कोई दम नहीं दिखता कि हरमेल सिंह का बयान मृत्यु की आशंका में नहीं दिया गया था और इसलिए, वह अहमियत देने के लायक नहीं था। इस तथ्य के अलावा कि साक्ष्य अधिनियम की धारा 32 के तहत यह आवश्यक नहीं है कि कोई बयान मृत्यु हो जाने की आशंका में (ही) दिया जाना चाहिए, साक्ष्य से यह स्पष्ट है कि उस समय हरमेल सिंह की हालत गंभीर थी। ..." (प्रमुखता आपूर्तित)
रतन सिंह बनाम हिमाचल प्रदेश राज्य
पृष्ठ शीर्षभागसर्वोच्च न्यायालय
समतुल्य उद्धरण: (1997) 4 SCC 161;
रतन सिंह बनाम हिमाचल प्रदेश राज्य
निर्णय की तिथि: 11/12/1996
भारत के सर्वोच्च न्यायालय की एक खंडपीठ द्वारा निर्णीत
आनंद, ए.एस. (J)
थॉमस, के.टी. (J)
निर्धारित हुआ (निर्णय के 15वें अनुच्छेद में):
"साक्ष्य अधिनियम की धारा 32(1) के अलावा भी, कांता देवी (अर्थात् जिस मृत व्यक्ति की चर्चा की जा रही है – Manish Udar) का उपरोक्त कथन हत्या के कृत्य के समय से निकटता के कारण साक्ष्य अधिनियम की धारा 6 के तहत स्वीकार किया जा सकता है। ..." (प्रमुखता आपूर्तित)
साथ ही निर्धारित हुआ (निर्णय के 16वें अनुच्छेद में):
"किसी भी दशा में, चाहे वह धारा 32(1) के तहत या साक्ष्य अधिनियम की धारा 6 के तहत स्वीकार्य हो, यह ठोस प्रमाण है जिस (के आधार) पर अभियुक्त के अपराध का निर्धारण करने की क्रिया को पुष्टि के साथ (जोड़ कर) या उसके (पुष्टि के) बिना अंजाम दिया जा सकता है।"
जॉर्ज एवं अन्य बनाम केरल राज्य एवं एक अन्य
पृष्ठ शीर्षभागजॉर्ज एवं अन्य बनाम केरल राज्य एवं एक अन्य मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने घोषणा की थी कि यदि वह सूचक जिसकी शिकायत किसी प्रथम सूचना रिपोर्ट का आधार थी, अदालत में अपने बयान से पलट जाता है और गवाही के कटघरे में खड़ा हो कर कहता है कि उसने कोई शिकायत नहीं की थी, तो सबसे पहले तो उस प्राथमिकी-विशेष को किसी भी परिस्थिति में ठोस सबूत के रूप में इस्तेमाल नहीं किया जा सकता है, और दूसरे, उसका इस्तेमाल उक्त सूचक की (सूचना की) पुष्टि या खंडन करने के लिए भी नहीं किया जा सकता है।
सर्वोच्च न्यायालय
समतुल्य उद्धरण: [1998] 4 SCC 605;
जॉर्ज एवं अन्य बनाम केरल राज्य एवं एक अन्य
निर्णय की तिथि: 18/03/1998
भारत के सर्वोच्च न्यायालय की एक खंडपीठ द्वारा निर्णीत
मुखर्जी, एम.के. (J)
क्वाद्री, एस.एस.एम. (J)
निर्धारित हुआ (निर्णय के 30वें अनुच्छेद में):
"...आगे बढ़ने से पहले हमें यह कबूल करना पड़ेगा कि हम इस बात की थाह नहीं ले पाए हैं कि ट्रायल कोर्ट Ext. P.1 (अर्थात अभियोजन पक्ष द्वारा इस्तेमाल करी गई प्रदर्शित वस्तु संख्या 1, जो इस मामले में संबंधित प्राथमिकी थी – मनीष उदार) के प्रलेख पर कैसे भरोसा कर सकता है, जिसे P.W.1 (अर्थात अभियोजन पक्ष साक्षी संख्या 1) ने दर्ज़ किया था, और वो भी P.W. 3 और 4 के साक्ष्य को खारिज करने के उद्देश्य से। P.W.1 मुकर गया और उसने गवाही दी कि उसने पुलिस के सामने कोई बयान नहीं दिया, लेकिन बिंदीदार रेखाओं पर हस्ताक्षर कर दिए थे। यह कहना बहुत ही साधारण है कि ऐफ़.आई.आर. ठोस सबूत नहीं होता है (सिवाय यक़ीनन तब के जब इसे साक्ष्य अधिनियम की धारा 32(1) के तहत स्वीकृत कर लिया जाता है) और इसका इस्तेमाल इसके निर्माता की पुष्टि या खंडन करने के लिए किया जा सकता है; और इसी लिए, P.W.1 के कथित बयानों, जो कि Ext. P.1 में निहित हैं, की पुष्टि करने का प्रश्न ही उत्पन्न नहीं हो सकता है। इसके बावजूद ट्रायल कोर्ट ने टिप्पणी करी कि ".........सूचक के प्रथम बयान P.W.1 के साक्ष्य द्वारा और भी अधिक समर्थित हुआ है" और इसमें निहित बयानों (Ext. P.1) का इस्तेमाल P.W. 3 और 4 को अविश्वसनीय मानने के लिए ठोस सबूत के रूप में किया। फलतः यह कहा जाना ज़रूरी है कि प्रथम सूचना रिपोर्ट से निपटने में ट्रायल कोर्ट का रवैया कानूनी रूप से अस्वीकार्य था। ..." (प्रमुखता आपूर्तित)
कंस राज बनाम पंजाब राज्य एवं अन्य
पृष्ठ शीर्षभागकंस राज बनाम पंजाब राज्य एवं अन्य मामले में, सर्वोच्च न्यायालय ने माना कि भारतीय साक्ष्य अधिनियम की समूची धारा 32 (न कि केवल धारा 32(1)) सुनी-सुनाई बातों पर प्रतिबन्ध के नियम का अपवाद है।
नुक्ताचीन लोग ग़ालिबन ये बोलेंगे कि इस निष्कर्ष / घोषणा के परिणाम, उस छोटे से विषय पर कि उक्त धारा के तहत एक या उस से अधिक बयानों वाली प्रत्येक प्रथम सूचना रिपोर्ट को ठोस प्रमाण के रूप में स्वीकार्य माना जाना चाहिए या नहीं माना जाना चाहिए, उक्त मामले में फ़ैसला सुनाने वाली सुप्रीम कोर्ट की पूर्ण पीठ द्वारा विस्तार से नहीं समझाए गए। कि अपेक्षित व्याख्या नहीं हुई। यह सच है। लेकिन इसका यह मतलब नहीं है कि उक्त निर्णय इस संबंध में बाध्य नहीं है। वह वास्तव में इसके विपरीत बाध्य है।
सुप्रीम कोर्ट
समतुल्य उद्धरण: AIR 2000 SC 2324(1); (2000) 5 SCC 207;
कंसास राज बनाम पंजाब राज्य एवं अन्य
फ़ैसले की तारीख: 26/04/2000
भारत के सर्वोच्च न्यायालय की पूर्ण पीठ द्वारा निर्णय लिया गया
पटनायक, जी.बी. (J)
सेठी, आर.पी. (J)
पाटिल, एस.वी. (J)
निर्धारित हुआ (निर्णय के 11वें अनुच्छेद में):
"निस्सन्देह साक्ष्य अधिनियम की धारा 32 सुनी-सुनाई बातों की प्रमाण के रूप में स्वीकृति पर प्रतिबन्ध के सामान्य नियम का अपवाद है और किसी व्यक्ति के लिखित या मौखिक, प्रासंगिक तथ्यों के बयान, उसकी मृत्यु के बाद साक्ष्य के रूप में स्वीकार्य हैं, यदि वे उसकी मृत्यु के कारण की अथवा उस आदान-प्रदान की किसी परिस्थिति का उल्लेख करते हैं जिसके परिणामस्वरूप उसकी मृत्यु हुई होती है। ..." (प्रमुखता आपूर्तित)
साथ ही निर्धारित हुआ (निर्णय के 11वें अनुच्छेद में ही):
"... धारा 32 के प्रावधानों को आकर्षित करने के लिए, मृतक के बयान की स्वीकार्यता को स्थापित करने हेतु, अभियोजन पक्ष को यह साबित करना आवश्यक है कि बयान ऐसे व्यक्ति द्वारा दिया गया था जो मर चुका है या जिसे ढूँढा नहीं जा सकता है या जिसकी उपस्थिति बिना अनुचित विलम्ब या व्यय के प्राप्त नहीं की जा सकती है या वह साक्ष्य देने में असमर्थ है, और (यह साबित करना आवश्यक है कि) ऐसा बयान अधिनियम की धारा 32 की उप-धारा (1) से (8) में निर्दिष्ट किसी भी परिस्थिति में दिया गया था। ..."
साथ ही निर्धारित हुआ (निर्णय के 11वें अनुच्छेद में ही):
"...ऐसे बयान को ठोस सबूत के तौर पर मनवाने के लिए, उस (बयान)पर निर्भर करने वाले व्यक्ति या संस्था का यह कानूनी दायित्व है कि वो ऐसे बयान के बोले जाने को तथ्य साबित करे। अगर वो लिखित रूप में है, तो मुंशी (अर्थात उसको लिखने वाले व्यक्ति) को अदालत में पेश किया जाना चाहिए और अगर वो मौखिक है, तो दिवंगत व्यक्ति को वो बयान देते हुए सुनने वाले व्यक्ति की जांच करके उसे साबित किया जाना चाहिए। ..."
प्राथमिकी को अपराध का विश्वकोश होने की ज़रुरत नहीं है
पृष्ठ शीर्षभागकिसी प्राथमिकी से अपराध का (एक) विश्वकोश होने की उम्मीद नहीं की जा सकती है। इस रुख का समर्थन सुप्रीम कोर्ट ने भी किया है (नीचे देखें)। सुप्रीम कोर्ट का यह रुख आपराधिक मामलों में प्रथम सूचना रिपोर्ट के चरण के बाद नए अहम तथ्यों को शामिल करने की गुंजाइश पैदा करता है, और "द्वितीय सूचना रिपोर्ट" की भी (इस विषय को नीचे भी कवर किया गया है)। साथ ही जैसा कि ऊपर उल्लेख किया गया है यह भी सच है कि सभी अहम तथ्यों और परिस्थितियों को प्राथमिकी में दर्ज़ किया जाना चाहिए, क्योंकि प्राथमिकी के बाद नए अहम तथ्यों को शामिल करना विरोधाभासी संस्करण बनाने के बराबर है। ये दोनों रुख / कथन परस्पर विरोधाभासी प्रतीत होते हैं, और इस लेखक को लगता है कि आपके दहेज़ मामले में भी कुछ ऐसा ही होने की संभावना है। आपके अदालती मामले में इसके परिणामस्वरुप विरोधाभासी प्रतीत होने वाली सूरत-ए-हाल पर निर्णय लेना न्यायालय का काम है।
सर्वोच्च न्यायालय के ऐसे निर्णय जिन में घोषित किया गया है कि प्राथमिकी को अपराध का विश्वकोश होने की आवश्यकता नहीं है
पृष्ठ शीर्षभागसर्वोच्च न्यायालय के ऐसे कई निर्णय हैं जिनमें माना गया है कि किसी प्राथमिकी को अपराध का (एक) विश्वकोश होने की आवश्यकता नहीं है। ऐसे कुछ निर्णयों [14] [15] [16] [17] के प्रासंगिक अंश यहाँ पुन: प्रस्तुत किए गए हैं–
आशाबाई मच्छिंद्र अधागले बनाम महाराष्ट्र राज्य एवं अन्य
पृष्ठ शीर्षभागआशाबाई मच्छिंद्र अधागले बनाम महाराष्ट्र राज्य एवं अन्य नामक मामले का फ़ैसला सुप्रीम कोर्ट की पूर्ण पीठ ने निर्णीत किया था। उक्त पीठ में अरिजीत पसायत, मुकुंदकम शर्मा और एच.एल. दत्तू शामिल थे। यह एक बहुत ही महत्वपूर्ण निर्णय है, क्योंकि इसे एक पूर्ण पीठ ने पारित किया था।
सुप्रीम कोर्ट
समतुल्य उद्धरण: (2009) 3 SCC 789;
आशाबाई मच्छिन्द्र अधागले बनाम महाराष्ट्र राज्य एवं अन्य
फ़ैसले की तारीख: 12/02/2009
भारत के सर्वोच्च न्यायालय की पूर्ण पीठ द्वारा निर्णीत
पसायत, ए. (J)
शर्मा, एम. (J)
दत्तू, एच.एल. (J)
निर्धारित हुआ (निर्णय के 14वें अनुच्छेद में):
"इस बात को दोहराने की कोई आवश्यकता नहीं है कि ऐफ़आईआर से एक विश्वकोश होने की अपेक्षा नहीं की जाती है। जैसा कि अपीलकर्ता के विद्वान वकील ने सही तर्क दिया है, आरोपी अनुसूचित जाति या अनुसूचित जनजाति से है या नहीं है, इस विषय का विश्लेषण तब किया जा सकता है जब मामले की जांच की जा रही हो।"
सुरजीत सिंह उर्फ़ गुरमीत सिंह बनाम पंजाब राज्य
पृष्ठ शीर्षभागसुरजीत सिंह उर्फ़ गुरमीत सिंह बनाम पंजाब राज्य सर्वोच्च न्यायालय का एक अन्य निर्णय है जिसमें उक्त सूत्रीकरण निहित है।
सर्वोच्च न्यायालय
समतुल्य उद्धरण: 1992 AIR 1389; 1992 SCR (2) 786;
सुरजीत सिंह उर्फ़ गुरमीत सिंह बनाम पंजाब राज्य
निर्णय की तिथि: 28/04/1992
भारत के सर्वोच्च न्यायालय की एक खंडपीठ द्वारा निर्णीत
पुंच्छी, एम.एम. (J)
जीवन रेड्डी, बी.पी. (J)
निर्धारित हुआ (निर्णय के 9वें अनुच्छेद में):
"...इस स्थिति में प्रथम सूचना रिपोर्ट में समाविष्ट चलाई गई गोलियों की संख्या से सम्बंधित और तलजीत सिंह की चोटों की अनुपस्थिति से सम्बंधित या अपीलकर्ता को सैन्य व्यक्ति नहीं बताये जाने वाली चूकें / वाले गलत विवरण कम महत्वपूर्ण हो जाते हैं। प्रथम सूचना रिपोर्ट पूरे मामले का विश्वकोश नहीं है और यह एक ठोस सबूत भी नहीं है। इसमें कोई संदेह नहीं है कि इसका महत्व है, लेकिन केवल निर्माता की पुष्टि या खंडन करने के प्रयोजन हेतु। यहाँ निर्माता एक युवा महिला थी जिसने अपनी आँखों के सामने अपने पति को खो दिया था। प्रथम सूचना रिपोर्ट –जो घटना के तीन घंटे के भीतर बहुत फ़ुर्ती से दर्ज़ करवाई गई थी– में इन विवरणों से सम्बद्ध कोई चूक या गलत विवरण, अभियोजन पक्ष के तर्क-वृन्द, या अपीलकर्ता की अपराध में भागीदारी के संबंध में दिए गए प्रत्यक्षदर्शियों के बयानों पर कोई प्रभाव नहीं डालेगा। ..."
मनोज @ भाऊ एवं अन्य बनाम महाराष्ट्र राज्य
पृष्ठ शीर्षभागमनोज @* भाऊ एवं अन्य बनाम महाराष्ट्र राज्य हत्या के एक मामले में एक छोटे से पेंच के साथ दायर करी गयी आपराधिक अपील से संबंधित है, । पेंच यह था कि यह अपील राज्य द्वारा प्रेषित की जा रही थी। निर्णय ने सभी पक्षों को इस मामूली सी हद तक मिश्रित परिणाम दिए, कि इसे केवल आंशिक रूप से ही स्वीकार किया गया था।
(टिप्पणी *) @ = उर्फ़
सर्वोच्च न्यायालय
समतुल्य उद्धरण: AIR 1999 SC 1620;
मनोज @ भाऊ एवं अन्य बनाम महाराष्ट्र राज्य
निर्णय की तिथि: 08/04/1999
भारत के सर्वोच्च न्यायालय की एक खंडपीठ द्वारा निर्णीत
पट्टनायक, जी.बी. (J)
शाह, एम.बी. (J)
निर्धारित हुआ (निर्णय के 4थे अनुच्छेद में):
"...बहस के दौरान विद्वान वरिष्ठ वकील श्री ललित ने आग्रह किया कि प्रथम सूचना रिपोर्ट काफ़ी हद तक अधूरी है और घटना का स्पष्ट विवरण उसमें नहीं दिया गया है। लेकिन यह बात पूरी तरह से स्थापित है कि प्रथम सूचना रिपोर्ट को साक्ष्यों का विश्वकोश होने की आवश्यकता नहीं है और (उस में) जो कहा जाना अनिवार्य होता है वह अभियोजन पक्ष का मुख्य दावा होता है। इस दृष्टिकोण से समझा जाए तो PW1 (अभियोजन पक्ष साक्षी संख्या 1) द्वारा दी गई प्रथम सूचना रिपोर्ट ((इस सन्दर्भ में) अर्थात उस के द्वारा प्रेषित पहली इत्तिला) के संबंध में कोई शिकायत नहीं करी जा सकती है।"
पुलिस अधीक्षक, सीबीआई एवं अन्य बनाम तपन कुमार सिंह
पृष्ठ शीर्षभागवर्तमान अनुभाग में हम जिस अवधारणा की चर्चा कर रहे हैं, उसका विस्तृत विवरण पुलिस अधीक्षक, सीबीआई एवं अन्य बनाम तपन कुमार सिंह के 24वें अनुच्छेद में उपलब्ध है।
सर्वोच्च न्यायालय
समतुल्य उद्धरण: (2003) 6 SCC 175; 2003 Cri LJ 2322;
पुलिस अधीक्षक, सीबीआई एवं अन्य बनाम तपन कुमार सिंह
निर्णय तिथि: 10/04/2003
भारत के सर्वोच्च न्यायालय की एक खंडपीठ द्वारा निर्णीत
हेगड़े, एन.एस. (J)
सिंह, बी.पी. (J)
निर्धारित हुआ (निर्णय के 24वें अनुच्छेद में):
"यह सर्वविदित है कि प्रथम सूचना रिपोर्ट कोई विश्वकोश नहीं है, जिसमें रिपोर्ट किए गए अपराध से संबंधित सभी तथ्य और विवरण प्रकट किए जाने ज़रूरी हैं।" (प्रमुखता आपूर्तित)
साथ ही निर्धारित हुआ (निर्णय के 24वें अनुच्छेद में ही):
"इस चरण पर यह पर्याप्त है कि पुलिस अधिकारी दी गई सूचना के आधार पर किसी संज्ञेय अपराध के हुए जाने का संदेह करता है, न कि यह कि उसे इस बात का यकीन हो वह संतुष्ट हो कि कोई संज्ञेय अपराध किया गया है। यदि उसके पास प्राप्त सूचना के आधार पर यह संदेह करने के कारण हैं कि कोई संज्ञेय अपराध किया गया है, तो वह सूचना को दर्ज़ करने और एक जांच करने को बाध्य है।"
साथ ही निर्धारित हुआ (निर्णय के 24वें अनुच्छेद में ही):
"वास्तविक परीक्षण यह है कि क्या प्रेषित सूचना किसी अपराध के हुए जाने का संदेह करने का कारण प्रदान करती है, जिसकी जांच करने के लिए संबंधित पुलिस अधिकारी (आपराधिक प्रक्रिया) संहिता की धारा 156 के तहत अधिकृत है। यदि ऐसा है, तो उसके पास सूचना को रिकॉर्ड करने और या तो स्वयं मामले की जांच करने या फिर किसी अन्य सक्षम अधिकारी को जांच करने के लिए नियुक्त करने के अलावा कोई विकल्प नहीं है।" (प्रमुखता आपूर्तित)
ऐफ़ आई आर में कुछ न्यूनतम तथ्यों का मौजूद होना आवश्यक है
पृष्ठ शीर्षभागहालांकि किसी प्राथमिकी को एक अपराध का विश्वकोश होने की आवश्यकता नहीं है, फिर भी यह आवश्यक है कि इसमें तथ्यों की एक आवश्यक न्यूनतम मात्रा का उल्लेख किया जाए। इस दृष्टिकोण का सुप्रीम कोर्ट ने भी कुछ निर्णयों में पक्ष-प्रचार किया है (नीचे देखें)।
सर्वोच्च न्यायालय निर्णय जिन में घोषित किया गया है कि ऐफ़.आई.आर. में कुछ न्यूनतम तथ्यों का विद्यमान होना आवश्यक है
पृष्ठ शीर्षभागसर्वोच्च न्यायालय के दो निर्णयों जिन में यह उल्लेख किया गया है कि प्रथम सूचना रिपोर्ट में कुछ न्यूनतम तथ्य आवश्यक हैं की ढाँचा मात्र रूपरेखाएँ यहां [18] [19] प्रस्तुत हैं।
आंध्र प्रदेश राज्य बनाम गोलकोंडा लिंगा स्वामी
पृष्ठ शीर्षभागआंध्र प्रदेश राज्य बनाम गोलकोंडा लिंगा स्वामी का प्रासंगिक भाग निम्नलिखित है।
सर्वोच्च न्यायालय
समतुल्य उद्धरण: (2004) 6 SCC 522;
आंध्र प्रदेश राज्य बनाम गोलकोंडा लिंगा स्वामी
निर्णय तिथि: 27/07/2004
भारत के सर्वोच्च न्यायालय की एक खंडपीठ द्वारा निर्णीत
वरियावा, एस.एन. (J)
पसायत, ए. (J)
निर्धारित हुआ (निर्णय के 11वें अनुच्छेद में):
"...हालांकि प्रथम सूचना रिपोर्ट का उद्देश्य पृष्ठभूमि परिदृश्य का विश्वकोश होना नहीं होता है, फिर भी ढाँचा मात्र लक्षणों में भी किसी अपराध के हुए जाने का खुलासा होना ज़रूरी होता है। इन प्रकरणों में स्थिति ऐसी नहीं है। इसलिए, उच्च न्यायालय का हस्तक्षेप किसी भी कानूनी दोष से ग्रस्त नहीं है, हालांकि उच्च न्यायालय द्वारा इंगित तर्कों को हमारा अनुमोदन प्राप्त नहीं है।"
अरुलवेलु एवं एक अन्य बनाम जन अभियोजक द्वारा राज्य प्रतिनिधित्व एवं एक अन्य
पृष्ठ शीर्षभागअरुलवेलु एवं एक अन्य बनाम जन अभियोजक द्वारा राज्य प्रतिनिधित्व एवं एक अन्य में फ़ैसला दलवीर भंडारी ने लिखा था। नीचे जो अंश उद्धरित किया गया है उसके अलावा निष्कर्ष में यह कहा गया था कि जब दो विचार संभव हैं, तो आरोपी के पक्ष में जो विचार होता है वो स्वीकार्यता योग्य है।
सर्वोच्च न्यायालय
समतुल्य उद्धरण: (2009) 10 SCC 206;
अरुलवेलु एवं एक अन्य बनाम जन अभियोजक द्वारा राज्य प्रतिनिधित्व एवं एक अन्य
निर्णय की तिथि: 07/10/2009
भारत के सर्वोच्च न्यायालय की एक खंडपीठ द्वारा निर्णीत
भंडारी, डी. (J)
चौहान, बी.एस. (J)
निर्धारित हुआ (निर्णय के 16वें अनुच्छेद में):
"उच्च न्यायालय ने टिप्पणी करी कि प्राथमिकी प्रकरण के इतिहास के सभी विवरणों को समाहित करने वाला विश्वकोश नहीं हो सकता। उच्च न्यायालय का यह रवैय्या सही नहीं दीखता है। प्रथम सूचना रिपोर्ट में कम से कम अभियोजन पक्ष की मोटी-मोटी कहानी का उल्लेख होना चाहिए और महत्वपूर्ण तथ्यों का उल्लेख न करने से प्राथमिकी की विश्वसनीयता प्रभावित हो सकती है।"
शिकायत की अस्वीकृति / संभावित अस्वीकृति / गारंटीशुदा अस्वीकृति
पृष्ठ शीर्षभागआपराधिक शिकायतों को पुलिस कुछ अक्सर ही खारिज कर देती है। अस्वीकृति की परिस्थितियाँ हर मामले में अलग-अलग होती हैं। कभी-कभी पुलिस असंतोषजनक कारणों से या ऐसे कारणों से प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज़ करने से इनकार कर देती है, जिन्हें वे स्पष्ट करने से इनकार कर देते हैं। कई बार शिकायत में ही कोई दम नहीं होता। कई बार शिकायतकर्ता आदतन शिकायतकर्ता होता है और कानूनी प्रक्रिया का दुरुपयोग करने की कोशिश करता है। ऐसी चार स्थितियां यहाँ नीचे विस्तृत रूप से वर्णित करी गई हैं।
यदि पुलिस स्टेशन में पुलिस प्राथमिकी दर्ज़ करने से इनकार कर दे तो शिकायतकर्ता क्या कर सकता है?
पृष्ठ शीर्षभागजैसा कि ऊपर बताया गया है, सबसे सरल दशा में प्राथमिकी दर्ज़ करवाने की प्रक्रिया सरल होती है। यह भी लिखा गया है कि अन्य मौकों में यह प्रक्रिया इससे लंबी होती है। ये "अन्य मौके" क्या होते हैं?
"अन्य मौके" वे अवसर होते हैं जब पुलिस शिकायत प्राप्त होने पर प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज़ करने से इनकार कर देती है। ऐसी स्थितियों में शिकायतकर्ता को उस ज़िले के एसपी (पुलिस अधीक्षक) / डीसीपी (पुलिस उप आयुक्त) के कार्यालय से संपर्क करने का कानूनी अधिकार होता है, जहां संबंधित पुलिस स्टेशन स्थित होता है। ऐसी स्थिति में उसे अपनी शिकायत की एक लिखित प्रति प्रेषित करनी पड़ती है। एसपी या डीसीपी, जो भी हो, बीएनएसएस की धारा 173 (4) (जो कि सीआरपीसी की धारा 154 (3) के समान है) के तहत प्राथमिकी दर्ज़ करने का आदेश जारी करने के लिए अधिकृत होता है। इसके अलावा, इस प्रकार से पंजीकृत प्राथमिकी का आईओ (जांच अधिकारी) कौन बने, उसे यह निर्णय लेने का भी अधिकार होता है।
यदि एसपी / डीसीपी भी प्राथमिकी पंजीकरण आदेश पारित करने से इनकार कर दे तो शिकायतकर्ता क्या कर सकता है?
पृष्ठ शीर्षभागऐसा भी हो सकता है कि एसपी / डीसीपी भी ऊपर बताए गए तरीके से प्रेषित शिकायत की प्रति प्राप्त होने के बाद प्राथमिकी दर्ज़ करने का आदेश देने से इनकार कर दे। ऐसी स्थितियों में शिकायतकर्ता को बीएनएसएस की धारा 175(3) ( जो कि सीआरपीसी की धारा 156(3) के समान है) के तहत क्षेत्र के न्यायिक मजिस्ट्रेट के समक्ष शिकायत के साथ प्रस्तुत होने का अधिकार होता है। ऐसे मजिस्ट्रेट को प्राथमिकी दर्ज़ करने का आदेश और प्रेषित आक्षेप में विद्यमान आरोपों की जांच करने का आदेश देने का अधिकार होता है।
ऐफ़ आई आर की बुनियाद के तौर पर सुनी-सुनाई बातें
पृष्ठ शीर्षभागविभिन्न लेखकों के किसी प्रथम सूचना रिपोर्ट को सुनी-सुनाई बातों पर आधारित होने देने के बारे में विभिन्न विचार हैं। ज़्यादातर लेखकों का कहना है कि यदि कोई व्यक्ति अस्पष्ट अथवा अविश्वसनीय जानकारी देता है, तो उसे एक ऐफ़आईआर का मुनासिब आधार नहीं माना जा सकता, भले ही वह लिखित रूप में ही क्यों न हो। हालांकि, जनक राज जय का मानना है कि सुनी-सुनाई बातें प्राथमिकी के लिए संपूर्णतः वैध आधार हैं। (जय, जे.आर., बेल लॉ एंड प्रोसीजर, यूनिवर्सल लॉ पब्लिशिंग कंपनी, दिल्ली, 2012) [10]
प्राथमिकी के बाद की शिकायतें / द्वितीय सूचना रिपोर्ट 😂
पृष्ठ शीर्षभागयदि शिकायतकर्ता द्वारा शिकायत के रूप में कोई बाद का दावा / कुछ बाद के दावे किया जाता है / किये जाते हैं, तो पुलिस उन्हें स्वीकार करने या उन्हें गंभीरता से लेने को बाध्य नहीं है। दहेज़ के मामलों में इस तरह के दावे बहुत आम हैं, क्योंकि असंतुष्ट पत्नियाँ जैसे ही महसूस करती हैं कि सरकारी मशीनरी उनके झूठों के प्रति अत्यंत ग्रहणशील है, वैसे ही उन्हें अपने मूल संस्करण को और अधिक अलंकृत करने, आकर्षक बनाने, और बढ़ा-चढ़ाकर प्रस्तुत करने की आवश्यकता महसूस होने लगती है। यह अंततः उनके विरुद्ध जा सकता है और जाता भी है, क्योंकि कानूनी प्रक्रिया के दौरान सामने आते जाने वाले विभिन्न संस्करणों के बीच बड़ी संख्या में विसंगतियाँ उत्पन्न हो जाती हैं और होती रहती हैं। याद रखें कि कानून में S.I.R या Second Information Report (एस.आई.आर. या द्वितीय सूचना रिपोर्ट) की कोई अवधारणा नहीं है, हालाँकि यह (Sir / "सर") पुलिस द्वारा आपके 'ससुर' से बात करते समय इस्तेमाल किया जाने वाला पसंदीदा संबोधन है।
अतिरिक्त पठन
पृष्ठ शीर्षभागप्रस्तुत लेख के अतिरिक्त आप Typical FIR u/s 498a/406/34 (Part 1) और / अथवा Typical FIR u/s 498a/406/34 (Part 2) के बारे में अंग्रेज़ी में लिखित लेख भी पढ़ सकते हैं।
निम्नलिखित में से एक या दोनों (अंग्रेजी में लिखित) लेखों में भी आपकी रुचि हो सकती है–
Conditions at the Women's Police Station और Interrogation and Investigation by the Police in Dowry Cases।
संदर्भ सूची :
पृष्ठ शीर्षभाग1) CrPC Section 154 - Information in cognizable cases | Devgan.in; devgan.in; Delhi; Undated; Retrieved on 08th May 2021
2) Section 154 in The Code Of Criminal Procedure, 1973; Indiankanoon.org; Delhi; Undated; Retrieved on 08th May 2021
3) Lalita Kumari vs. Govt. of Uttar Pradesh & Others on 12 November, 2013; Indiankanoon.org; Delhi; Undated; Retrieved on 08th May 2021
4) Mrs. Rupan Deol Bajaj & Another vs Kanwar Pal Singh Gill & Another on 12 October, 1995; Indiankanoon.org; Delhi; Undated; Retrieved on 08th May 2021
5) Gyanesh, K.; Notice by S.I.T. for 1984 riots; Ministry of Home Affairs; New Delhi; 23rd February, 2017; Retrieved on 08th May 2021
6) Nath, D.; RTI query reveals cops destroyed FIRs of 1984 riots; The Hindu; Chennai; 13th April, 2015; Retrieved on 08th May 2021
7) Section 468 in The Code Of Criminal Procedure, 1973; Indiankanoon.org; Delhi; Undated; Retrieved on 09th May 2021
8) CrPC Section 468 - Bar to taking cognizance after lapse of the period of limitation | Devgan.in; devgan.in; Delhi; Undated; Retrieved on 08th May 2021
9) Sridhar, M.; FIR, Arrest and Bail; Asia Book House; Hyderabad; 2020
10) Jai, J.R.; Bail Law and Procedures; Universal Law Publishing Company; Delhi; 2016
11) The State of Bombay vs Rusy Mistry and Another on 24 September, 1959; Indiankanoon.org; Delhi; Undated; Retrieved on 10th May 2021
12) Aghnoo Nagesia vs State of Bihar on 4 May, 1965; Indiankanoon.org; Delhi; Undated; Retrieved on 10th May 2021
13) Apren Joseph alias Current Kunjukunju & others vs. The State of Kerala; Indiankanoon.org; Delhi; Undated; Retrieved on 10th May 2021
14) Ashabai Machindra Adhagale vs State of Maharashtra & Others on 12 February, 2009; Indiankanoon.org; Delhi; Undated; Retrieved on 13th May 2021
15) Surjit Singh alias Gurmit Singh vs State of Punjab on 28 April, 1992; Indiankanoon.org; Delhi; Undated; Retrieved on 13th May 2021
16) Manoj @ Bhau & Others vs State of Maharashtra on 8 April, 1999; Indiankanoon.org; Delhi; Undated; Retrieved on 15th May 2021
17) Superintendent Of Police, C.B.I. and Others vs Tapan Kumar Singh on 10 April, 2003; Indiankanoon.org; Delhi; Undated; Retrieved on 15th May 2021
18) State of Andhra Pradesh vs Golconda Linga Swamy And Another on 27 July, 2004; Indiankanoon.org; Delhi; Undated; Retrieved on 15th May 2021
19) Arulvelu & Another vs State Represented By Public Prosecutor & Another on 7 October, 2009; Indiankanoon.org; Delhi; Undated; Retrieved on 15th May 2021
20) Section 32 of Indian Evidence Act– Cases in which statement of relevant fact by person who is dead or cannot be found, etc., is relevant; devgan.in; Delhi; Undated; Retrieved on 29th May 2021
21) Damodarprasad Chandrikaprasad & others vs State of Maharashtra on 29 November, 1971; Indiankanoon.org; Delhi; Undated; Retrieved on 30th May 2021
22) Tehal Singh and others vs State of Punjab on 27 October, 1978; Indiankanoon.org; Delhi; Undated; Retrieved on 30th May 2021
23) Rattan Singh vs The State of Himachal Pradesh on 11 December, 1996; Indiankanoon.org; Delhi; Undated; Retrieved on 30th May 2021
24) George & others vs State of Kerala & Another on 18 March, 1998; Indiankanoon.org; Delhi; Undated; Retrieved on 30th May 2021
25) Kans Raj vs State of Punjab & others on 26 April, 2000; Indiankanoon.org; Delhi; Undated; Retrieved on 30th May 2021
26) धारा 154 - दण्ड प्रक्रिया संहिता | Section 154 - Crpc in Hindi; hindi.lawrato.com; दिल्ली; बिना तिथि; १८ जून २०२५ को देखा गया
27) The Criminal Law (Amendment) Act, 2018, No. 22 OF 2018; www.mha.gov.in; Delhi; 11th August, 2018; Retrieved on 18th June 2025
28) परिसीमा-काल की समाप्ति के पश्चात् संज्ञान का वर्जन; hindi.lawrato.com; दिल्ली; बिना तिथि; १८ जून २०२५ को देखा गया
29) भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता; delhipolice.gov.in; दिल्ली; बिना तिथि; २१ जून २०२५ को देखा गया
30) भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता; mha.gov.in; दिल्ली; बिना तिथि; २३ जून २०२५ को देखा गया
31) Damodarprasad Chandrikaprasad & Others vs State Of Maharashtra; sci.gov.in; Delhi; 1971/11/29; Retrieved on 01st July 2025
32) Rattan Singh vs The State Of Himachal Pradesh; sci.gov.in; Delhi; 1996/12/11; Retrieved on 01st July 2025
33) Kans Raj vs State of Punjab & others; sci.gov.in; Delhi; 2000/04/26; Retrieved on 01st July 2025