प्राथमिकियाँ: परिचय एवं पंजीकरण प्रक्रिया

FIRs: Introduction and Registration Procedure
अगला लेख 

ऐफ़. आई. आर. का पूर्ण रूप

पृष्ठ शीर्षभाग  
अंग्रेज़ी के तीन अक्षरों से बने संक्षिप्त नाम ऐफ़.आई.आर. का पूर्ण रूप है फ़र्स्ट इन्फ़ॉर्मेशन रिपोर्ट। इसका हिंदी अर्थ है प्रथम सूचना रिपोर्ट। यह शब्दवृन्द हमारे देश में पुलिस रिपोर्ट का वर्णन करने के लिए इस्तेमाल किया जाता है। संक्षिप्त नाम ने अपना एक अलग ही जीवन प्राप्त कर लिया है और अब यह रोज़मर्रा के इस्तेमाल का शब्दवृन्द बन गया है। ऐफ़आईआर अथवा ऐफ़ आई आर। यह (इस शब्दवृन्द का रोज़ाना इस्तेमाल) खास तौर पर उन हलकों में सच है, जहाँ आप इन दिनों घूम रहे हैं, यानी वकीलों, पुलिस और जजों के बीच। "रिपोर्ट" शब्द का इस्तेमाल आम तौर पर "ऐफ़.आई.आर." के संक्षिप्त रूप में किया जाता है।

एक दिलचस्प बात यह है कि सीआरपीसी (आपराधिक प्रक्रिया संहिता) में कहीं भी यह परिभाषित नहीं किया गया है कि ऐफ़ आई आर क्या है। यहां तक ​​कि "फ़र्स्ट इनफ़ॉर्मेशन रिपोर्ट" (अर्थात "प्रथम सूचना रिपोर्ट") वाक्यांश का ज़िक्र भी संहिता / कोड (यानि सीआरपीसी) में कहीं नहीं है।

धारा 498ए के मामलों में पुलिस शिकायत मिलने पर तुरंत ऐफ़आईआर दर्ज़ नहीं करती है। धारा 304बी के मामलों में स्थिति इसके उलट है।


प्राथमिकी / प्रथम सूचना रिपोर्ट / ऐफ़ आई आर दर्ज़ करने की प्रक्रिया

पृष्ठ शीर्षभाग  
सबसे सरल स्थिति में ऐफ़ आई आर दर्ज़ करवाने की प्रक्रिया सरल है। कोई शिकायतकर्ता, जो आमतौर पर किसी अपराध का पीड़ित (या पीड़ितों में से एक) होता है, किसी अपराध के घटित होने की खबर लेकर पुलिस के पास पहुंचता है। अपराध या तो उक्त पुलिस स्टेशन के अधिकार क्षेत्र के भीतर या उसके अधिकार क्षेत्र के बाहर घटित हुआ होता है। कानून के अनुसार पुलिस को या तो उस शिकायतकर्ता से लिखित में शिकायत लेनी पड़ती है या फिर घटित अपराध के बारे में उसका मौखिक विवरण नोट करना पड़ता है। यदि शिकायतकर्ता द्वारा वर्णित अपराध (चाहे वह वर्णन सच हो या झूठ) एक या एक से अधिक संज्ञेय अपराधों का गठन करता है तो पुलिस को प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज़ करना आवश्यक होता है। यह आमतौर पर एसएचओ / पुलिस चौकी प्रभारी से अनुमोदन लेने के बाद किया जाता है। अन्य स्थितियों में उक्त प्रक्रिया लंबी होती है लेकिन यहां हम सबसे सरल स्थिति की बात कर रहे हैं।

संज्ञेय अपराध अपराधों की वह श्रेणी है जिसके बारे में पुलिस को ना सिर्फ़ न्यायालय की अनुमति के बिना फ़ौजदारी कार्रवाई शुरू करने का अधिकार है, बल्कि न्यायालय के आदेश की प्रतीक्षा किए बगैर ऐसी कार्रवाई शुरू करने का कर्त्तव्य है। इन अपराधों में अधिकांश ऐसे अपराध शामिल हैं जो भारतीय दंड संहिता या किसी अन्य कानून के तहत 3 या अधिक वर्षों के कारावास से दंडनीय हैं। सीआरपीसी धारा 154 [1][2][26][27] शिकायत प्राप्त होने पर अनिवार्य रूप से प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज़ करने का कानूनी आधार है। इस धारा को यहाँ (नीचे) पुनर्प्रस्तुत किया गया है—

आपराधिक प्रक्रिया धारा 154 – संज्ञेय मामलों में सूचनापृष्ठ शीर्षभाग  
(स्त्रोत: hindi.lawrato.com)

1) संज्ञेय अपराध के किए जाने से संबंधित प्रत्येक इतिला, यदि पुलिस थाने के भारसाधक अधिकारी को मौखिक दी गई है तो उसके द्वारा या उसके निदेशाधीन लेखबद्ध कर ली जाएगी और इतिला देने वाले को पढ़कर सुनाई जाएगी और प्रत्येक ऐसी इतिला पर, चाहे वह लिखित रूप में दी गई हो या पूर्वोक्त रूप में लेखबद्ध की गई हो, उस व्यक्ति द्वारा हस्ताक्षर किए जाएंगे जो उसे दे और उसका सार ऐसी पुस्तक में, जो उस अधिकारी द्वारा ऐसे रूप में रखी जाएगी जिसे राज्य सरकार इस निमित विहित करे, प्रविष्ट किया जाएगा।

परंतु यदि किसी स्त्री द्वारा, जिसके विरूद्ध भारतीय दंड संहिता (1860 का 45) की धारा 326A, धारा 326B, धारा 354, धारा 354A, धारा 354B, धारा 354C, धारा 354D, [1]धारा 376, धारा 376A, धारा 376AB, धारा 376B, धारा 376C, धारा 376D, धारा 376DA, धारा 376DB, धारा 376E, या धारा 509 के अधीन किसी अपराध के किए जाने की, अथवा अपराध का प्रयत्न किए जाने की कोई इत्तिला दी जाती है, तो ऐसी इत्तिला किसी महिला पुलिस अधिकारी या किसी महिला अधिकारी द्वारा अभिलिखित करी जाएगी;

परंतु यह और कि –
(a) यदि वह (पीड़ित या पीड़िता) व्यक्ति जिसके विरुद्ध किसी दूसरे (कथित अपराधी) व्यक्ति के द्वारा भारतीय दंड संहिता (1860 का 45) की धारा 354, धारा 354A, धारा 354B, धारा 354C, धारा 354D, [2]धारा 376, धारा 376A, धारा 376AB, धारा 376B, धारा 376C, धारा 376D, धारा 376DA, धारा 376DB, धारा 376E, या धारा 509 के अधीन अपराध के किए जाने का, अथवा करने का प्रयत्न किए जाने का. इल्ज़ाम लगाया गया है, अस्थायी या स्थायी रूप से मानसिक या शारीरिक रूप से निःशक्त है, तो ऐसी इत्तिला किसी पुलिस अधिकारी द्वारा उस व्यक्ति के, जो ऐसे अपराध की रिपोर्ट करने का इच्छुक है, निवास-स्थान पर, या यदि ऐसी वस्तुस्थिति हो, तो उस (अपराध की रिपोर्ट करने के इच्छुक) व्यक्ति की पसंद के किसी सुविधाजनक स्थान पर, दुभाषिये अथवा विशेष शिक्षक की उपस्थिति में अभिलिखित की जाएगी;

(b) ऐसी इत्तिला के अभिलेखन की वीडियो फ़िल्म तैयार करी जाएगी;

(c) पुलिस अधिकारी धारा 164 की उपधारा (5A) के खंड (a) के अधीन किसी न्यायिक मजिस्ट्रेट द्वारा उस व्यक्ति का कथन यथासंभवशीघ्र अभिलिखित कराएगा।

2) उपधारा (1) के अंतर्गत अभिलिखित जानकारी की प्रतिलिपि, इत्तिला देने वाले को तत्काल निःशुल्क दी जाएगी।

3) कोई भी व्यक्ति जो किसी पुलिस थाने के प्रभारी अधिकारी के उपधारा (1) में इंगित सूचना को अभिलिखित करने से इंकार करने से व्यथित है, वह ऐसी सूचना का सार लिखित रूप में और डाक द्वारा संबद्ध पुलिस अधीक्षक को भेज सकता है जो कि, यदि उसे यकीन हो जाता है कि ऐसी इत्तिला से किसी संज्ञेय अपराध का किया जाना प्रकट होता है तो, या तो स्वयं मामले का अन्वेषण करेगा या अपने अधीनस्थ किसी पुलिस अधिकारी द्वारा इस संहिता द्वारा उपबंधित शैली से अन्वेषण किए जाने का निर्देश देगा और ऐसे अधिकारी को उस अपराध के संबंध में उस पुलिस थाने के प्रभारी अधिकारी की सभी शक्तियां होंगी।

सीआरपीसी धारा 154 के फ़ुटनोट (हाशिये की टिप्पणियाँ)पृष्ठ शीर्षभाग  
(स्त्रोत: गृह मंत्रालय, भारत सरकार)

1) 1) कुछ शब्द दंड विधि (संशोधन) अधिनियम, 2018 (अधिनियम संख्या 22, 2018) की धारा 11(i) द्वारा 11 अगस्त 2018 से प्रतिस्थापित

2) कुछ शब्द दंड विधि (संशोधन) अधिनियम, 2018 (अधिनियम संख्या 22, 2018) की धारा 11(ii) द्वारा 11 अगस्त 2018 से प्रतिस्थापित

किसी भी ऐसी शिकायत, जो किसी संज्ञेय अपराध के होने का खुलासा करती है, की प्राप्ति पर तुरंत प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज करने की आवश्यकता को ललिता कुमारी मामले [3] में उच्चतम न्यायालय की संविधान पीठ के फ़ैसले में भी विस्तार से समझाया गया है।

प्रत्येक शिकायत की प्राप्ति 3 रजिस्टरों में दर्ज़ करी जाती है, जो प्रत्येक पुलिस स्टेशन में रखे होते हैं। एक दैनिक डायरी है और दूसरा शिकायतों का रजिस्टर है। एक तीसरा रजिस्टर भी है जिसे एफ़आईआर का रजिस्टर कहा जाता है। यदि किसी शिकायत पर प्राथमिकी दर्ज़ करी जाती है, तो यह तथ्य इन सभी 3 रजिस्टरों में दर्ज़ किया जाता है, जो कि क्रमशः दैनिक डायरी, शिकायतों का रजिस्टर और एफ़आईआर का रजिस्टर हैं। यदि किसी शिकायत पर प्राथमिकी दर्ज़ नहीं करी जाती है तो उक्त शिकायत का रिकॉर्ड इन 3 रजिस्टरों में से केवल पहले 2 रजिस्टरों में दर्ज़ किया जाता है, जो कि दैनिक डायरी और शिकायतों का रजिस्टर हैं।

संबंधित पुलिस स्टेशन को कानून के अनुसार शिकायतकर्ता को प्राथमिकी की एक प्रति निःशुल्क प्रदान करना आवश्यक है (संदर्भ सीआरपीसी धारा 154(1) उपर्युक्त)।


क्या शिकायतकर्ता के लिए ऐफ़ आई आर को हस्ताक्षरित करना अनिवार्य है?

पृष्ठ शीर्षभाग  
सीआरपीसी के अनुसार, कोई भी व्यक्ति जो किसी अपराध के बारे में पुलिस को सूचना देता है, उसे उस शिकायत पर हस्ताक्षर करना अनिवार्य है (सन्दर्भ सीआरपीसी धारा 154(1) ऊपर) जिसे वह प्रेषित करता है। वो इसे लिखित रूप में प्रेषित कर सकता है और प्रत्येक पृष्ठ पर अपने हस्ताक्षर कर सकता है, या फिर वो इसे संबंधित पुलिस स्टेशन के किसी भी कर्मचारी को लिखवा सकता है –जिसे उसे नोट करना पड़ेगा अथवा उसे टाइप करना पड़ेगा– और परिणामी लिखित शिकायत पर अपने हस्ताक्षर कर सकता है। ऐसा करने से इनकार करने पर उसे 3 महीने तक की कैद हो सकती है। यह प्रावधान लगभग कभी लागू नहीं होता। कम से कम इस लेखक ने ऐसा कुछ होते हुए कभी नहीं सुना।

इसके अलावा, शिकायतकर्ता को प्रथम सूचना रिपोर्ट की अपनी प्रति प्राप्त होने पर शिकायत रजिस्टर और प्राथमिकी रजिस्टर में यथोचित स्थानों पर अपना नाम हस्ताक्षरित करना आवश्यक है।



संदर्भ सूची :

पृष्ठ शीर्षभाग  

1)CrPC Section 154 - Information in cognizable cases | Devgan.in; devgan.in; Delhi; Undated; Retrieved on 08th May 2021

2)Section 154 in The Code Of Criminal Procedure, 1973; Indiankanoon.org; Delhi; Undated; Retrieved on 08th May 2021

3)Lalita Kumari vs. Govt. of Uttar Pradesh & Others on 12 November, 2013; Indiankanoon.org; Delhi; Undated; Retrieved on 08th May 2021

26)धारा 154 - दण्ड प्रक्रिया संहिता | Section 154 - Crpc in Hindi; hindi.lawrato.com; दिल्ली; बिना तिथि; १८ जून २०२५ को देखा गया

27)The Criminal Law (Amendment) Act, 2018 No. 22 OF 2018; www.mha.gov.in; Delhi; 11th August, 2018; Retrieved on 18th June 2025






द्वारा लिखित
मनीष उदार द्वारा प्रकाशित।

पृष्ठ को बनाया गया
अंतिम अद्यतन ०४ जुलाई २०२५ को किया गया