प्राथमिकियों को आमतौर से अदालत में सबूत के तौर पर इस्तेमाल नहीं किया जा सकता है

FIRs Cannot usually be Used as Evidence in Court
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क्या ऐफ़आईआर को सुबूत के तौर पर इस्तेमाल किया जा सकता है?

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मदभुशी श्रीधर ने अपनी पुस्तक में एक और दिलचस्प विषय को सम्बोधित किया है (इस लेख में देखें) कि क्या किसी प्राथमिकी को सबूत के तौर पर इस्तेमाल किया जा सकता है। उनका कहना है कि ऐफ़आईआर को सबूत नहीं माना जा सकता। वो सिर्फ़ एक सूचना-संग्रह होती है जो कानूनी प्रक्रिया को गति प्रदान करती है और पुलिस द्वारा करी जाने वाली जांच का आधार बनती है। गवाहों द्वारा दिए गए बयान, वकील द्वारा दिए गए तर्क, अदालत में पेश किए गए सबूत, ये सभी उपस्थित प्रकरण-विशेष का निपटारा करने के सन्दर्भ में प्रथम सूचना रिपोर्ट से बेहतर हैं। अगर ये सभी मद प्राथमिकी की पुष्टि करती हैं, तो दोषसिद्धि की संभावना कई गुना बढ़ जाती है। लेकिन अगर वे प्राथमिकी का विरोध करती हैं, तो मामला कमज़ोर हो जाता है, क्योंकि प्राथमिकी का इस्तेमाल इन चीज़ों को खारिज करने के लिए नहीं किया जा सकता। सच्चाई अदालत में सामने आती है, या कम से कम यह माना जाता है कि वो अदालत में ही सामने आती है, और प्रथम सूचना रिपोर्ट ऐसी कार्रवाईयों में निर्णायक कारक नहीं होती है।

उपरोक्त बात से BNS 85 / IPC 498a के आरोपी पुरुषों और उनके माता-पिता को बहुत साहस और उम्मीद मिलनी चाहिए, क्योंकि यह कानून के एक वरिष्ठ शिक्षक द्वारा प्रेषित स्पष्ट संकेत (का संक्षिप्त संस्करण) है कि एक अच्छा आपराधिक वकील आपकी BNS 85 / IPC 498a पत्नी, उसके परिवार और उसके प्रायोजकों द्वारा उपजाए गए झूठों की पूरी इमारत को ध्वस्त कर सकता है। इससे ऐसे पुरुषों को भी उम्मीद और हिम्मत मिलनी चाहिए जिन पर बेतरतीब ढंग से शारीरिक छेड़छाड़ / छेड़छाड़ / बलात्कार आदि का आरोप लगाया गया है।


सर्वोच्च न्यायालय के कुछ ऐसे निर्णय जो प्राथमिकी को साक्ष्य के रूप में प्रयुक्त करने से वर्जित करते हैं

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सुप्रीम कोर्ट के कई ऐसे फ़ैसले हैं जिनमें अदालत ने प्राथमिकी का ठोस सबूत के तौर पर प्रयोग होना प्रतिबंधित किया है। तीन पूर्ण-पीठ निर्णय [11][12][13] यहां उद्धृत किए गए हैं–


बॉम्बे राज्य बनाम रूसी मिस्त्री और एक अन्य

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इनमें से पहला और सबसे पुराना है बॉम्बे राज्य बनाम रूसी मिस्त्री और एक अन्य

सर्वोच्च न्यायालय
समतुल्य उद्धरण: AIR 1960 SC 391;
बॉम्बे राज्य बनाम रूसी मिस्त्री और एक अन्य
निर्णय की तिथि: 24/09/1959
भारत के सर्वोच्च न्यायालय की पूर्ण पीठ द्वारा निर्णय लिया गया
दास, एस. (J)
गजेंद्रगडकर, पी. (J)
सुब्बा राव, के. (J)

निर्धारित हुआ (निर्णय के 7वें अनुच्छेद में):
"...प्रथम सूचना रिपोर्ट, दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 154 के अंतर्गत दर्ज़ करी गई जानकारी होती है। यह किसी अपराध के घटित होने से संबंधित पुलिस अधिकारी को दी गई सूचना होती है। यह सूचना-प्रेषक द्वारा दी गई सूचना भी होती है, जिस पर जांच शुरू की जाती है। इसे जांच शुरू होने के बाद प्राप्त सूचना से अलग समझा जाना चाहिए। वो सूचना दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 161 और 162 के अंतर्गत आती है। यह भली भांति स्थापित है कि प्रथम सूचना रिपोर्ट ठोस सबूत नहीं है, बल्कि इसका उपयोग केवल अदालत में दिए गए सूचना-प्रेषक के साक्ष्य की पुष्टि या खंडन करने के लिए या उसकी विश्वसनीयता पर सवाल उठाने के लिए किया जा सकता है। इसका अर्थ यह है कि न्यायाधीश ज्यूरी (पंच समूह) के समक्ष ऐसी रिपोर्ट को ठोस सबूत के रूप में नहीं रख सकता है, अपितु केवल उसके उस हिस्से का उल्लेख कर सकता है, जिसका उपयोग उपर्युक्त उद्देश्यों में से किसी एक के लिए किया जाया गया हो।" (प्रमुखता आपूर्तित)


अघनू नागेसिया बनाम बिहार राज्य

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इस श्रृंखला में अगला निर्णय है अघनू नागेसिया बनाम बिहार राज्य

सर्वोच्च न्यायालय
समतुल्य उद्धरण: 1966 AIR 119; 1966 SCR (1) 134;
अघनू नागेसिया बनाम बिहार राज्य
निर्णय की तिथि: 04/05/1965
भारत के सर्वोच्च न्यायालय की पूर्ण पीठ द्वारा निर्णय लिया गया
बचावत, आर.एस. (J)
सुब्बा राव, के. (J)
दयाल, आर. (J)

निर्धारित हुआ (निर्णय के 10वें अनुच्छेद में):
"दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 154 प्रथम सूचना के अभिलेखन का प्रावधान करती है। सूचना रिपोर्ट अपने आप में ठोस साक्ष्य नहीं है। इसका उपयोग साक्ष्य अधिनियम की धारा 157 के अंतर्गत मुखबिर की पुष्टि करने या अधिनियम की धारा 145 के अंतर्गत उसका खंडन करने के लिए किया जा सकता है, यदि मुखबिर को गवाह के रूप में बुलाया जाता है। यदि प्रथम सूचना अभियुक्त द्वारा स्वयं दी जाती है, तो उसके द्वारा सूचना देने का तथ्य साक्ष्य अधिनियम की धारा 8 के अंतर्गत उसके आचरण के साक्ष्य के रूप में उसके विरुद्ध स्वीकार्य है। " (प्रमुखता आपूर्तित)


आप्रेन जोसेफ़ उर्फ़ ​​करेंट कुंजुकुंजू और अन्य बनाम केरल राज्य

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तीसरा निर्णय, जो उपरोक्त दो निर्णयों में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा अपनाए गए रुख को दोहराता है, आप्रेन जोसेफ़ उर्फ़ ​​करेंट कुंजुकुंजू और अन्य बनाम केरल राज्य  है।

सर्वोच्च न्यायालय
समतुल्य उद्धरण: 1973 AIR 1; 1973 SCR (2) 16; 1973 SCC (3) 114;
आप्रेन जोसेफ़ उर्फ़ ​​करेंट कुंजुकुंजू और अन्य बनाम केरल राज्य
निर्णय की तिथि: 01/09/1972
भारत के सर्वोच्च न्यायालय की पूर्ण पीठ द्वारा निर्णय लिया गया
दुआ, आई.डी. (J)
शेलत, जे.एम. (J)
खन्ना, एच.आर. (J)

निर्धारित हुआ (निर्णय के 10वें अनुच्छेद में):
"प्रथम सूचना रिपोर्ट अपराध के घटित होने से संबंधित एक रिपोर्ट है, जो पुलिस को दी जाती है और उसके द्वारा दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 154 के तहत दर्ज़ करी जाती है। जैसा कि प्रिवी काउंसिल ने एच.ई. बनाम ख्वाजा (1) में कहा है, पुलिस द्वारा सूचना रिपोर्ट की प्राप्ति और अभिलेख आपराधिक जांच शुरू करने के लिए एक पूर्व शर्त नहीं है। न ही अधिनियम में यह प्रावधान है कि ऐसी सूचना रिपोर्ट केवल किसी प्रत्यक्षदर्शी द्वारा ही दी जा सकती है।धारा 154 के तहत प्रथम सूचना रिपोर्ट को ठोस सबूत का एक खण्ड भी नहीं माना जाता है। इसका उपयोग केवल अदालत में सूचना-प्रेषक के साक्ष्य की पुष्टि या खंडन करने के लिए किया जा सकता है। लेकिन यह सूचना दर्ज़ होने के उपरांत सूचना-प्रेषक द्वारा स्थापित मामले का आधार होता है। यह बहुत उपयोगी होती है यदि इसे अलंकृत करने का समय और अवसर मिलने से पहले, या मुखबिर की याददाश्त फ़ीकी पड़ने से पहले दर्ज़ कर लिया जाए।" (प्रमुखता आपूर्तित)



संदर्भ सूची :

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11)The State of Bombay vs Rusy Mistry and Another on 24 September, 1959; Indiankanoon.org; Delhi; Undated; Retrieved on 10th May 2021

12)Aghnoo Nagesia vs State of Bihar on 4 May, 1965; Indiankanoon.org; Delhi; Undated; Retrieved on 10th May 2021

13)Apren Joseph alias Current Kunjukunju & others vs. The State of Kerala; Indiankanoon.org; Delhi; Undated; Retrieved on 10th May 2021





द्वारा लिखित
मनीष उदार द्वारा प्रकाशित।

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अंतिम अद्यतन ०९ जुलाई २०२५ को किया गया