वे परिस्थितियाँ जिन में ऐफ़ आई आर (का कुछ भाग) ठोस सुबूत बन जाता है
पृष्ठ शीर्षभागएक ऐफ़ आई आर (या उसका हिस्सा) तब ठोस सबूत बन जाता है जब उसे संबंधित अदालत द्वारा ठोस सबूत के रूप में स्वीकार कर लिया जाता है। ऐसा 3 सामान्य परिस्थितियों और कुछ अतिरिक्त परिस्थितियों में होता है, जिनमें से सभी को भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 32 में देखा जा सकता है। जहाँ तक 3 सामान्य परिस्थितियों का सवाल है, आप पहली परिस्थिति यहाँ (नीचे), दूसरी परिस्थिति यहाँ (नीचे), और तीसरी परिस्थिति यहाँ (नीचे)) देख सकते हैं। ये तीनों सामान्य परिस्थितियाँ भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 32(1) में वर्णित हैं, तथा ये सभी मृत्यु से संबंधित हैं।
ध्यान दें कि मृत व्यक्तियों द्वारा दिए गए कुछ कथन भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 8 और/या धारा 6 के अंतर्गत भी स्वीकार किए जा सकते हैं (भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 32(1) के अतिरिक्त) जैसा कि धारा 8 के सन्दर्भ में दामोदरप्रसाद चंद्रिकाप्रसाद [31] [21] (इस लेख में देखें) और धारा 6 के सन्दर्भ में रतन सिंह [32] [23] (इस लेख में देखें) में देखा जा सकता है।
साक्ष्य अधिनियम की धारा 32 के शेष भाग पर आएं तो, ध्यान दें कि सर्वोच्च न्यायालय की पूर्ण पीठ ने कंस राज [33] [25] (इस लेख में देखें) में घोषित किया है कि भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 32 की किसी भी उपधारा के तहत (न कि केवल धारा 32(1) के तहत) स्वीकृत कोई भी कथन उसके बाद मूल साक्ष्य बनता है, जब ऐसे कथन पर निर्भर करने वाले व्यक्ति या एजेंसी द्वारा यह साबित कर दिया जाता है कि ऐसा कथन वाकई संबंधित व्यक्ति द्वारा दिया गया था। यदि सुप्रीम कोर्ट के इस नज़रिये को स्पष्ट और असंदिग्ध कथन के रूप में स्वीकार किया जाता है तो यह कहना आवश्यक हो जाता है कि यदि न केवल मृत व्यक्तियों के बल्कि उन व्यक्तियों के भी जो मिल नहीं सकते और उन व्यक्तियों के भी जिनकी उपस्थिति प्राप्त करना कुछ ज़्यादा कठिन है, कुछ प्रकार के कथन किसी प्रथम सूचना रिपोर्ट में शामिल हैं, तो उक्त प्रथम सूचना रिपोर्ट ठोस साक्ष्य बन जाती है।
साक्ष्य अधिनियम की धारा 32(1) [20] का प्रालेख मात्र यहाँ निम्नलिखित है–
भारतीय साक्ष्य अधिनियम धारा 32(1): वे दशाएं जिनमें किसी ऐसे व्यक्ति द्वारा बोला हुआ प्रासंगिक तथ्य का कथन प्रासंगिक है जो मर चुका है या ढूँढा नहीं जा सकता है, इत्यादिपृष्ठ शीर्षभाग
किसी ऐसे व्यक्ति, जो मर चुका है, या जिसे ढूँढा नहीं जा सकता है, या जो साक्ष्य देने में असमर्थ हो गया है, या जिसकी (अदालत में) हाज़िरी किसी ऐसे विलम्ब या व्यय के बिना सुनिश्चित नहीं की जा सकती है, जो (विलम्ब या व्यय) मामले की परिस्थितियों के मद्देनज़र न्यायालय को अनुचित प्रतीत होता है, द्वारा दिए गए सुसंगत तथ्यों के लिखित या मौखिक कथन, निम्नलिखित मामलों में अपने आप में सुसंगत तथ्य होते हैं–
(1) जब वह (कथन) मृत्यु के कारण से संबंधित हो– जब वह कथन किसी व्यक्ति द्वारा उसकी (अपनी) मृत्यु के कारण के बारे में, या उस परिस्थित-समूह के किसी भी पहलू के बारे में बोला गया होता है जिसके परिणामस्वरूप उसकी मृत्यु हुई होती है, ऐसे मामलों में जिनमें उस व्यक्ति की मृत्यु के कारण पर सवाल उठ जाता है।
ऐसे कथन सुसंगत होते हैं, चाहे उन्हें देने वाला व्यक्ति, उनके बोले जाने के समय, मृत्यु होने की आशंका कर रहा था या नहीं कर रहा था, और उस कार्रवाई की प्रकृति चाहे जैसी भी हो, जिस (कार्रवाई) में उसकी मृत्यु के कारण पर सवाल उठ जाता है।
ऊपर बताई गई 3 सामान्यतः देखी जाने वाली परिस्थितियों का विस्तृत विवरण नीचे दिया गया है—
जब किसी प्राथमिकी में देहावसान पूर्व ऐलान समाविष्ट हो
पृष्ठ शीर्षभागयदि मृत्यु पूर्व कथन किसी प्रथम सूचना रिपोर्ट का हिस्सा होवे, तो वह प्रथम सूचना रिपोर्ट ठोस सबूत बन जाती है।
(यह कहना ज़्यादा तर्कसंगत है कि उस प्राथमिकी का वो हिस्सा ठोस सबूत बन जाता है जिसमें उक्त मृत्यु पूर्व कथन शामिल होता है, साथ ही वो हिस्सा भी जिसकी उत्पत्ति उक्त मृत्यु पूर्व कथन के अर्थ से सीधे रूप से हुई होती है। यहां यह भी अनुमान लगाया जा सकता है कि ऐसे मामलों में पूरी प्राथमिकी भी ठोस सबूत के रूप में मानने योग्य बन सकती है, यदि न्यायाधीश प्रस्तुत तथ्यों के समूचे ढांचे को ध्यान में रखते हुए ऐसा करने का फ़ैसला करता है, लेकिन अनुमान तो अनुमान ही होते हैं।)
यह ध्यान देने योग्य है कि प्रत्येक मृत्यु पूर्व कथन भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 32(1) के तहत साक्ष्य के रूप में स्वीकार्य है, लेकिन केवल तभी जब यह स्थापित हो जाए कि ऐसी घोषणा वास्तव में उस व्यक्ति द्वारा की गई थी जिसकी मृत्यु हो गई थी।
इसके अलावा ध्यान दें कि मृत्यु पूर्व कथन केवल उन मामलों में स्वीकार्य है जहां संबंधित व्यक्ति की मृत्यु होने के कारण पर प्रश्न उठ जाता है। उस कार्रवाई की प्रकृति जिस में इस पहलू पर प्रश्न उठ जाता है, महत्वहीन है। इसे कहने का एक अन्य तरीका यह है कि मृत्युपूर्व बयान सभी प्रकार की कानूनी कार्रवाईयों में स्वीकार्य होते हैं, न कि केवल हत्या/आत्महत्या से संबंधित कार्रवाईयों में, बशर्ते कि प्रासंगिक कार्यवाही-विशेष में मृत व्यक्ति की मृत्यु का कारण प्रश्नगत हो जावे।
जब किसी ऐफ़ आई आर में किसी मृत व्यक्ति की मृत्यु के संभावित कारण के बारे में घोषणा समाविष्ट हो
पृष्ठ शीर्षभागयदि कोई व्यक्ति अपनी मृत्यु के संभावित कारण के बारे में बयान देता है और बाद में उसकी मृत्यु हो जाती है और ऐसा बयान किसी प्राथमिकी का हिस्सा बन जाता है तो प्राथमिकी का वह हिस्सा जिसमें ऐसा बयान होता है और वह हिस्सा जो सीधे ऐसे बयान से निकला होता है, ठोस सबूत बन जाता है।
जब किसी प्राथमिकी (अर्थात ऐफ़ आई आर) में किसी मृत व्यक्ति की मृत्यु से संबंधित किसी परिस्थिति के बारे में घोषणा शामिल हो
पृष्ठ शीर्षभागयदि कोई व्यक्ति किसी परिस्थिति के बारे में बयान देता है, और बाद में यह हो जाता है / यह पता चलता है कि वह परिस्थिति किसी ऐसे आदान-प्रदान से संबंधित थी जिसके कारण उसकी मृत्यु हुई, तो प्राथमिकी का वह हिस्सा जिसमें ऐसा बयान होता है और वह हिस्सा जो सीधे ऐसे बयान से निकला होता है, वे ठोस सबूत बन जाते हैं। उक्त परिस्थिति संबंधित व्यक्ति की मृत्यु से बहुत पहले घटित हुई हो सकती है; इससे उक्त बयान की स्वीकार्यता प्रभावित नहीं होती है।
संदर्भ सूची :
पृष्ठ शीर्षभाग20) Section 32 of Indian Evidence Act– Cases in which statement of relevant fact by person who is dead or cannot be found, etc., is relevant; devgan.in; Delhi; Undated; Retrieved on 29th May 2021
21) Damodarprasad Chandrikaprasad & others vs State of Maharashtra on 29 November, 1971; Indiankanoon.org; Delhi; Undated; Retrieved on 30th May 2021
23) Rattan Singh vs The State of Himachal Pradesh on 11 December, 1996; Indiankanoon.org; Delhi; Undated; Retrieved on 30th May 2021
25) Kans Raj vs State of Punjab & others on 26 April, 2000; Indiankanoon.org; Delhi; Undated; Retrieved on 30th May 2021
31) Damodarprasad Chandrikaprasad & Others vs State Of Maharashtra; sci.gov.in; Delhi; 1971/11/29; Retrieved on 01st July 2025
32) Rattan Singh vs The State Of Himachal Pradesh; sci.gov.in; Delhi; 1996/12/11; Retrieved on 01st July 2025
33) Kans Raj vs State of Punjab & others; sci.gov.in; Delhi; 2000/04/26; Retrieved on 01st July 2025