शिकायतों की अस्वीकृति, सुनी-सुनाई बातें, और द्वितीय सूचना रिपोर्ट

Rejection of Complaints, Hearsay, and Second Information Report
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शिकायत की अस्वीकृति / संभावित अस्वीकृति / गारंटीशुदा अस्वीकृति

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आपराधिक शिकायतों को पुलिस कुछ अक्सर ही खारिज कर देती है। अस्वीकृति की परिस्थितियाँ हर मामले में अलग-अलग होती हैं। कभी-कभी पुलिस असंतोषजनक कारणों से या ऐसे कारणों से प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज़ करने से इनकार कर देती है, जिन्हें वे स्पष्ट करने से इनकार कर देते हैं। कई बार शिकायत में ही कोई दम नहीं होता। कई बार शिकायतकर्ता आदतन शिकायतकर्ता होता है और कानूनी प्रक्रिया का दुरुपयोग करने की कोशिश करता है। ऐसी चार स्थितियां यहाँ नीचे विस्तृत रूप से वर्णित करी गई हैं।


यदि पुलिस स्टेशन में पुलिस प्राथमिकी दर्ज़ करने से इनकार कर दे तो शिकायतकर्ता क्या कर सकता है?

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जैसा कि इस लेख में बताया गया है, सबसे सरल दशा में प्राथमिकी दर्ज़ करवाने की प्रक्रिया सरल होती है। यह भी लिखा गया है कि अन्य मौकों में यह प्रक्रिया इससे लंबी होती है। ये "अन्य मौके" क्या होते हैं?

"अन्य मौके" वे अवसर होते हैं जब पुलिस शिकायत प्राप्त होने पर प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज़ करने से इनकार कर देती है। ऐसी स्थितियों में शिकायतकर्ता को उस ज़िले के एसपी (पुलिस अधीक्षक) / डीसीपी (पुलिस उप आयुक्त) के कार्यालय से संपर्क करने का कानूनी अधिकार होता है, जहां संबंधित पुलिस स्टेशन स्थित होता है। ऐसी स्थिति में उसे अपनी शिकायत की एक लिखित प्रति प्रेषित करनी पड़ती है। एसपी या डीसीपी, जो भी हो, बीएनएसएस की धारा 173 (4) (जो कि सीआरपीसी की धारा 154 (3) के समान है) के तहत प्राथमिकी दर्ज़ करने का आदेश जारी करने के लिए अधिकृत होता है। इसके अलावा, इस प्रकार से पंजीकृत प्राथमिकी का आईओ (जांच अधिकारी) कौन बने, उसे यह निर्णय लेने का भी अधिकार होता है।


यदि एसपी / डीसीपी भी प्राथमिकी पंजीकरण आदेश पारित करने से इनकार कर दे तो शिकायतकर्ता क्या कर सकता है?

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ऐसा भी हो सकता है कि एसपी / डीसीपी भी ऊपर बताए गए तरीके से प्रेषित शिकायत की प्रति प्राप्त होने के बाद प्राथमिकी दर्ज़ करने का आदेश देने से इनकार कर दे। ऐसी स्थितियों में शिकायतकर्ता को बीएनएसएस की धारा 175(3) ( जो कि सीआरपीसी की धारा 156(3) के समान है) के तहत क्षेत्र के न्यायिक मजिस्ट्रेट के समक्ष शिकायत के साथ प्रस्तुत होने का अधिकार होता है। ऐसे मजिस्ट्रेट को प्राथमिकी दर्ज़ करने का आदेश और प्रेषित आक्षेप में विद्यमान आरोपों की जांच करने का आदेश देने का अधिकार होता है।


ऐफ़ आई आर की बुनियाद के तौर पर सुनी-सुनाई बातें

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विभिन्न लेखकों के किसी प्रथम सूचना रिपोर्ट को सुनी-सुनाई बातों पर आधारित होने देने के बारे में विभिन्न विचार हैं। ज़्यादातर लेखकों का कहना है कि यदि कोई व्यक्ति अस्पष्ट अथवा अविश्वसनीय जानकारी देता है, तो उसे एक ऐफ़आईआर का मुनासिब आधार नहीं माना जा सकता, भले ही वह लिखित रूप में ही क्यों न हो। हालांकि, जनक राज जय का मानना ​​है कि सुनी-सुनाई बातें प्राथमिकी के लिए संपूर्णतः वैध आधार हैं। (जय, जे.आर., बेल लॉ एंड प्रोसीजर, यूनिवर्सल लॉ पब्लिशिंग कंपनी, दिल्ली, 2012) [10]


प्राथमिकी के बाद की शिकायतें / द्वितीय सूचना रिपोर्ट 😂

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यदि शिकायतकर्ता द्वारा शिकायत के रूप में कोई बाद का दावा / कुछ बाद के दावे किया जाता है / किये जाते हैं, तो पुलिस उन्हें स्वीकार करने या उन्हें गंभीरता से लेने को बाध्य नहीं है। दहेज़ के मामलों में इस तरह के दावे बहुत आम हैं, क्योंकि असंतुष्ट पत्नियाँ जैसे ही महसूस करती हैं कि सरकारी मशीनरी उनके झूठों के प्रति अत्यंत ग्रहणशील है, वैसे ही उन्हें अपने मूल संस्करण को और अधिक अलंकृत करने, आकर्षक बनाने, और बढ़ा-चढ़ाकर प्रस्तुत करने की आवश्यकता महसूस होने लगती है। यह अंततः उनके विरुद्ध जा सकता है और जाता भी है, क्योंकि कानूनी प्रक्रिया के दौरान सामने आते जाने वाले विभिन्न संस्करणों के बीच बड़ी संख्या में विसंगतियाँ उत्पन्न हो जाती हैं और होती रहती हैं। याद रखें कि कानून में S.I.R या Second Information Report (एस.आई.आर. या द्वितीय सूचना रिपोर्ट) की कोई अवधारणा नहीं है, हालाँकि यह (Sir / "सर") पुलिस द्वारा आपके 'ससुर' से बात करते समय इस्तेमाल किया जाने वाला पसंदीदा संबोधन है।








द्वारा लिखित
मनीष उदार द्वारा प्रकाशित।

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अंतिम अद्यतन १४ जुलाई २०२५ को किया गया