कुछ सर्वोच्च न्यायालय निर्णय जिनमें प्राथमिकी के ठोस सबूत के रूप में प्रयोग को मंज़ूरी दी गई है

Some Supreme Court judgements permitting use of FIR as Substantive Evidence
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सर्वोच्च न्यायालय के कुछ ऐसे फ़ैसले जिन में प्राथमिकी को साक्ष्य के रूप में प्रयोग किये जाने को कानूनी मंज़ूरी दी गई है

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यहां सर्वोच्च न्यायालय के पांच निर्णयों का हवाला दिया जा रहा है, ताकि उन परिस्थितियों की विविधता को चित्रित किया जा सके, जिन के तहत किसी प्रथम सूचना रिपोर्ट को सबूत माना जा सकता है। [21][22][23][24][25]


दामोदरप्रसाद चंद्रिकाप्रसाद एवं अन्य बनाम महाराष्ट्र राज्य

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दामोदरप्रसाद चंद्रिकाप्रसाद एवं अन्य बनाम महाराष्ट्र राज्य सर्वोच्च न्यायालय द्वारा 1971 में निर्णित किया गया था।

सर्वोच्च न्यायालय
समतुल्य उद्धरण: 1972 AIR 622; 1972 SCR (2) 622;
दामोदरप्रसाद चंद्रिकाप्रसाद एवं अन्य बनाम महाराष्ट्र राज्य
निर्णय तिथि: 29/11/1971
भारत के सर्वोच्च न्यायालय के एकल न्यायाधीश द्वारा निर्णीत
रे, ए.एन. (J)

निर्धारित हुआ (निर्णय के 8वें अनुच्छेद में):
"...कुछ मामलों में, प्रथम सूचना रिपोर्ट का प्रयोग साक्ष्य अधिनियम की धारा 32(1) के तहत या साक्ष्य अधिनियम की धारा 8 के तहत मुखबिर की मृत्यु के कारण के बारे में (प्रमाण के) अथवा मुखबिर के आचरण के भाग के (प्रमाण के) रूप में किया जा सकता है। ..."


टहल सिंह एवं अन्य बनाम पंजाब राज्य

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टहल सिंह एवं अन्य बनाम पंजाब राज्य में तय किया गया मुख्य कानूनी मुद्दा यह था कि किसी मृत व्यक्ति द्वारा दिये गये बयान का ठोस साक्ष्य के रूप में स्वीकार्य होने के लिए क्या यह ज़रूरी है कि उस व्यक्ति ने वो बयान अपनी मृत्यु होने की आशंका की अवस्था में ही दिया हो?

सर्वोच्च न्यायालय
समतुल्य उद्धरण: AIR 1979 SC 1347; 1979 CriLJ 1031; 1980 Supp (1) SCC 400;
टहल सिंह एवं अन्य बनाम पंजाब राज्य
निर्णय की तिथि: 27/10/1978
भारत के सर्वोच्च न्यायालय की एक खंडपीठ द्वारा निर्णीत
सिंह, जे. (J)
रेड्डी, ओ.सी. (J)

निर्धारित हुआ (निर्णय के 4थे अनुच्छेद में):
"... हमे डॉ. चिताले के इस सुझाव में भी कोई दम नहीं दिखता कि हरमेल सिंह का बयान मृत्यु की आशंका में नहीं दिया गया था और इसलिए, वह अहमियत देने के लायक नहीं था। इस तथ्य के अलावा कि साक्ष्य अधिनियम की धारा 32 के तहत यह आवश्यक नहीं है कि कोई बयान मृत्यु हो जाने की आशंका में (ही) दिया जाना चाहिए, साक्ष्य से यह स्पष्ट है कि उस समय हरमेल सिंह की हालत गंभीर थी। ..." (प्रमुखता आपूर्तित)


रतन सिंह बनाम हिमाचल प्रदेश राज्य

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सर्वोच्च न्यायालय
समतुल्य उद्धरण: (1997) 4 SCC 161;
रतन सिंह बनाम हिमाचल प्रदेश राज्य
निर्णय की तिथि: 11/12/1996
भारत के सर्वोच्च न्यायालय की एक खंडपीठ द्वारा निर्णीत
आनंद, ए.एस. (J)
थॉमस, के.टी. (J)

निर्धारित हुआ (निर्णय के 15वें अनुच्छेद में):
"साक्ष्य अधिनियम की धारा 32(1) के अलावा भी, कांता देवी (अर्थात् जिस मृत व्यक्ति की चर्चा की जा रही है – Manish Udar) का उपरोक्त कथन हत्या के कृत्य के समय से निकटता के कारण साक्ष्य अधिनियम की धारा 6 के तहत स्वीकार किया जा सकता है। ..." (प्रमुखता आपूर्तित)

साथ ही निर्धारित हुआ (निर्णय के 16वें अनुच्छेद में):
"किसी भी दशा में, चाहे वह धारा 32(1) के तहत या साक्ष्य अधिनियम की धारा 6 के तहत स्वीकार्य हो, यह ठोस प्रमाण है जिस (के आधार) पर अभियुक्त के अपराध का निर्धारण करने की क्रिया को पुष्टि के साथ (जोड़ कर) या उसके (पुष्टि के) बिना अंजाम दिया जा सकता है।"


जॉर्ज एवं अन्य बनाम केरल राज्य एवं एक अन्य

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जॉर्ज एवं अन्य बनाम केरल राज्य एवं एक अन्य मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने घोषणा की थी कि यदि वह सूचक जिसकी शिकायत किसी प्रथम सूचना रिपोर्ट का आधार थी, अदालत में अपने बयान से पलट जाता है और गवाही के कटघरे में खड़ा हो कर कहता है कि उसने कोई शिकायत नहीं की थी, तो सबसे पहले तो उस प्राथमिकी-विशेष को किसी भी परिस्थिति में ठोस सबूत के रूप में इस्तेमाल नहीं किया जा सकता है, और दूसरे, उसका इस्तेमाल उक्त सूचक की (सूचना की) पुष्टि या खंडन करने के लिए भी नहीं किया जा सकता है।

सर्वोच्च न्यायालय
समतुल्य उद्धरण: [1998] 4 SCC 605;
जॉर्ज एवं अन्य बनाम केरल राज्य एवं एक अन्य
निर्णय की तिथि: 18/03/1998
भारत के सर्वोच्च न्यायालय की एक खंडपीठ द्वारा निर्णीत
मुखर्जी, एम.के. (J)
क्वाद्री, एस.एस.एम. (J)

निर्धारित हुआ (निर्णय के 30वें अनुच्छेद में):
"...आगे बढ़ने से पहले हमें यह कबूल करना पड़ेगा कि हम इस बात की थाह नहीं ले पाए हैं कि ट्रायल कोर्ट Ext. P.1 (अर्थात अभियोजन पक्ष द्वारा इस्तेमाल करी गई प्रदर्शित वस्तु संख्या 1, जो इस मामले में संबंधित प्राथमिकी थी – मनीष उदार) के प्रलेख पर कैसे भरोसा कर सकता है, जिसे P.W.1 (अर्थात अभियोजन पक्ष साक्षी संख्या 1) ने दर्ज़ किया था, और वो भी P.W. 3 और 4 के साक्ष्य को खारिज करने के उद्देश्य से। P.W.1 मुकर गया और उसने गवाही दी कि उसने पुलिस के सामने कोई बयान नहीं दिया, लेकिन बिंदीदार रेखाओं पर हस्ताक्षर कर दिए थे। यह कहना बहुत ही साधारण है कि ऐफ़.आई.आर. ठोस सबूत नहीं होता है (सिवाय यक़ीनन तब के जब इसे साक्ष्य अधिनियम की धारा 32(1) के तहत स्वीकृत कर लिया जाता है) और इसका इस्तेमाल इसके निर्माता की पुष्टि या खंडन करने के लिए किया जा सकता है; और इसी लिए, P.W.1 के कथित बयानों, जो कि Ext. P.1 में निहित हैं, की पुष्टि करने का प्रश्न ही उत्पन्न नहीं हो सकता है। इसके बावजूद ट्रायल कोर्ट ने टिप्पणी करी कि ".........सूचक के प्रथम बयान P.W.1 के साक्ष्य द्वारा और भी अधिक समर्थित हुआ है" और इसमें निहित बयानों (Ext. P.1) का इस्तेमाल P.W. 3 और 4 को अविश्वसनीय मानने के लिए ठोस सबूत के रूप में किया। फलतः यह कहा जाना ज़रूरी है कि प्रथम सूचना रिपोर्ट से निपटने में ट्रायल कोर्ट का रवैया कानूनी रूप से अस्वीकार्य था। ..." (प्रमुखता आपूर्तित)


कंस राज बनाम पंजाब राज्य एवं अन्य

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कंस राज बनाम पंजाब राज्य एवं अन्य मामले में, सर्वोच्च न्यायालय ने माना कि भारतीय साक्ष्य अधिनियम की समूची धारा 32 (न कि केवल धारा 32(1)) सुनी-सुनाई बातों पर प्रतिबन्ध के नियम का अपवाद है।

नुक्ताचीन लोग ग़ालिबन ये बोलेंगे कि इस निष्कर्ष / घोषणा के परिणाम, उस छोटे से विषय पर कि उक्त धारा के तहत एक या उस से अधिक बयानों वाली प्रत्येक प्रथम सूचना रिपोर्ट को ठोस प्रमाण के रूप में स्वीकार्य माना जाना चाहिए या नहीं माना जाना चाहिए, उक्त मामले में फ़ैसला सुनाने वाली सुप्रीम कोर्ट की पूर्ण पीठ द्वारा विस्तार से नहीं समझाए गए। कि अपेक्षित व्याख्या नहीं हुई। यह सच है। लेकिन इसका यह मतलब नहीं है कि उक्त निर्णय इस संबंध में बाध्य नहीं है। वह वास्तव में इसके विपरीत बाध्य है।

सुप्रीम कोर्ट
समतुल्य उद्धरण: AIR 2000 SC 2324(1); (2000) 5 SCC 207;
कंसास राज बनाम पंजाब राज्य एवं अन्य
फ़ैसले की तारीख: 26/04/2000
भारत के सर्वोच्च न्यायालय की पूर्ण पीठ द्वारा निर्णय लिया गया
पटनायक, जी.बी. (J)
सेठी, आर.पी. (J)
पाटिल, एस.वी. (J)

निर्धारित हुआ (निर्णय के 11वें अनुच्छेद में):
"निस्सन्देह साक्ष्य अधिनियम की धारा 32 सुनी-सुनाई बातों की प्रमाण के रूप में स्वीकृति पर प्रतिबन्ध के सामान्य नियम का अपवाद है और किसी व्यक्ति के लिखित या मौखिक, प्रासंगिक तथ्यों के बयान, उसकी मृत्यु के बाद साक्ष्य के रूप में स्वीकार्य हैं, यदि वे उसकी मृत्यु के कारण की अथवा उस आदान-प्रदान की किसी परिस्थिति का उल्लेख करते हैं जिसके परिणामस्वरूप उसकी मृत्यु हुई होती है। ..." (प्रमुखता आपूर्तित)

साथ ही निर्धारित हुआ (निर्णय के 11वें अनुच्छेद में ही):
"... धारा 32 के प्रावधानों को आकर्षित करने के लिए, मृतक के बयान की स्वीकार्यता को स्थापित करने हेतु, अभियोजन पक्ष को यह साबित करना आवश्यक है कि बयान ऐसे व्यक्ति द्वारा दिया गया था जो मर चुका है या जिसे ढूँढा नहीं जा सकता है या जिसकी उपस्थिति बिना अनुचित विलम्ब या व्यय के प्राप्त नहीं की जा सकती है या वह साक्ष्य देने में असमर्थ है, और (यह साबित करना आवश्यक है कि) ऐसा बयान अधिनियम की धारा 32 की उप-धारा (1) से (8) में निर्दिष्ट किसी भी परिस्थिति में दिया गया था। ..."

साथ ही निर्धारित हुआ (निर्णय के 11वें अनुच्छेद में ही):
"...ऐसे बयान को ठोस सबूत के तौर पर मनवाने के लिए, उस (बयान)पर निर्भर करने वाले व्यक्ति या संस्था का यह कानूनी दायित्व है कि वो ऐसे बयान के बोले जाने को तथ्य साबित करे। अगर वो लिखित रूप में है, तो मुंशी (अर्थात उसको लिखने वाले व्यक्ति) को अदालत में पेश किया जाना चाहिए और अगर वो मौखिक है, तो दिवंगत व्यक्ति को वो बयान देते हुए सुनने वाले व्यक्ति की जांच करके उसे साबित किया जाना चाहिए। ..."



संदर्भ सूची :

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21)Damodarprasad Chandrikaprasad & others vs State of Maharashtra on 29 November, 1971; Indiankanoon.org; Delhi; Undated; Retrieved on 30th May 2021

22)Tehal Singh and others vs State of Punjab on 27 October, 1978; Indiankanoon.org; Delhi; Undated; Retrieved on 30th May 2021

23)Rattan Singh vs The State of Himachal Pradesh on 11 December, 1996; Indiankanoon.org; Delhi; Undated; Retrieved on 30th May 2021

24)George & others vs State of Kerala & Another on 18 March, 1998; Indiankanoon.org; Delhi; Undated; Retrieved on 30th May 2021

25)Kans Raj vs State of Punjab & others on 26 April, 2000; Indiankanoon.org; Delhi; Undated; Retrieved on 30th May 2021






द्वारा लिखित
मनीष उदार द्वारा प्रकाशित।

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अंतिम अद्यतन ११ जुलाई २०२५ को किया गया