ज़ीरो ऐफ़आईआर / ऐसे थाने में शिकायत करना जिसके पास क्षेत्राधिकार न हो

Zero FIR / Complaining at a police station which does not have area jurisdiction
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क्या शिकायत केवल उस पुलिस स्टेशन में जमा करी जा सकती है जिसका क्षेत्राधिकार होता है? / ज़ीरो ऐफ़आईआर

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आजकल (अर्थात जून 2025 में) कानूनी रूप से जागरूक नागरिकों के दायरे में यह सामान्य ज्ञान है कि किसी भी अपराध-विशेष के बारे में पुलिस को दी जाने वाली शिकायत किसी भी पुलिस स्टेशन में जमा करवाई जा सकती है, और यह ज़रूरी नहीं है कि उसी पुलिस स्टेशन में शिकायत जमा करी जाए जिसका उस स्थान पर क्षेत्रीय अधिकार है जहां उक्त अपराध हुआ है। लेकिन जनता को ऐसी सुविधा उपलब्ध कराना किन कारणों से तर्कसंगत है? और इस तरह से शिकायत प्रेषित करने पर कैसी प्रक्रिया अपनाई जाती है? इन 2 सवालों के जवाब जानने के लिए आगे पढ़ें।

अक्सर ऐसा होता है कि अपराध-स्थल के सबसे नज़दीक स्थित थाना उस स्थल-विशेष का क्षेत्रीय पुलिस स्टेशन नहीं होता है। लेकिन यह भी सत्य है कि पीड़ित/शिकायतकर्ता के लिए –जो अपराध के बाद (सदमे और आघात के कारण) व्याकुलता और असमंजस की स्थिति में होता है– उस ख़ास थाने से संपर्क करना स्वाभाविक है जो अपराध के स्थान के सबसे नज़दीक होता है।

यह भी संभव है कि पीड़ित/शिकायतकर्ता को इस तथ्य की जानकारी ही न हो कि (कानून के अनुसार) क्षेत्रीय पुलिस स्टेशन ही ज़िम्मेदार पुलिस स्टेशन है, और इसलिए वह या तो निकटतम पुलिस स्टेशन या फिर किसी अन्य पुलिस स्टेशन में चला जाता है, जैसे कि उदाहरण के लिए वो पुलिस स्टेशन जो उस (पीड़ित) के कार्यस्थल के सबसे नज़दीक होता है।

ऐसा भी हो सकता है कि अपराध का क्रियान्वन चलती ट्रेन या बस या किसी अन्य परिवहन साधन में किया गया हो और पीड़ित/शिकायतकर्ता के लिए अपनी यात्रा को -पुलिस में शिकायत दर्ज़ करवाने के लिए- बीच में रोकना संभव न हो। ऐसे मामलों में पीड़ित की प्राथमिकता अपने घर/गंतव्य तक पहुंचना होती है, और अपने घर/गंतव्य तक पहुंचने के बाद ही वह अपने आप को शांत कर पाता है (यद्यपि केवल एक अधूरी हद तक) और आपराधिक शिकायत जमा करने के बारे में सोचना शुरू कर पाता है। दरअसल, उन स्थितियों में, जब पीड़ित अपराध के समय अपने घर से कहीं दूर जा रहा होता है, तो वह अक्सर पहले गंतव्य पर पहुंचता है, फिर वहां अपना काम यथासंभव अच्छे तरीके से करता है, फिर वापस अपने घर की यात्रा शुरू करता है और घर लौटने के बाद ही वह पुलिस में शिकायत प्रेषित करने की मानसिक दशा में आ पाता है।

बहुत अक्सर ऐसा भी होता है कि पीड़ित व्यक्ति / पीड़ित लोग अपराध के तुरंत बाद (चोटों या गंभीर मानसिक आघात के कारण) अस्पताल में भर्ती हो जाता है / हो जाते हैं और इसलिए वह / वे क्षेत्रीय पुलिस स्टेशन नहीं जा पाता है / पाते हैं। ऐसी दशाओं में पुलिस का उनके पास पहुंचकर उनकी शिकायत दर्ज़ करना मानवीय होता है। लेकिन ऐसा बहुत यदा-कदा ही किया जाता है। आमतौर पर ऐसा होता है कि पीड़ित के अस्पताल में रहने के दौरान शिकायत दर्ज़ नहीं होती है। आखिरकार उन्हें अस्पताल से छुट्टी मिल तो जाती है, लेकिन छुट्टी मिलने के बाद भी उन्हें एक निश्चित अवधि के लिए घर पर आराम करने की सलाह दी जाती है। ऐसे मामलों में अक्सर ऐसा होता है कि पीड़ित अपने निवास स्थान के सबसे नज़दीकी पुलिस स्टेशन में जाता है, न कि उस पुलिस स्टेशन में जिसका क्षेत्राधिकार उस स्थान पर होता है जहाँ अपराध हुआ था।

यहां तक ​​कि बिना चोट के मामलों में भी, अपराध के पीड़ित हमेशा मानसिक रूप से हिल जाते हैं, और पर्याप्त समय बीत जाने के बाद ही वे अपने संतुलन-धैर्य को अच्छी मात्रा में पुनः प्राप्त कर पाते हैं। कई ऐसे कारणों से जो कि अज्ञात होने के कारण यहाँ उल्लिखित नहीं किए जा सकते हैं, पीड़ित व्यक्ति मानसिक तनाव की स्थिति में किसी दूसरे पुलिस स्टेशन में जा सकते हैं, न कि उस पुलिस स्टेशन में जिस का अपराध-स्थल पर क्षेत्राधिकार होता है।

उपरोक्त सभी स्थितियों में शिकायतकर्ता जिस भी थाने में सबसे पहले जाता है, उसे पूर्ण रूप से अपनी शिकायत उस ही पुलिस स्टेशन में दर्ज़ करवाने की वैधानिक अनुमति है। उक्त पुलिस स्टेशन अपनी शिकायत रजिस्टर और अपनी दैनिक डायरी में इसकी प्रविष्टि करेगा, लेकिन अपने प्राथमिकी रजिस्टर में नहीं। वो (थाना) उस शिकायत को ज़ीरो ऐफ़.आई.आर. के रूप में दर्ज करेगा, जो कि दरअसल ऐफ़.आई.आर. नहीं होती है, अपितु ऐफ़.आई.आर. के वास्तविक पंजीकरण के लिए (ऐसी स्थिति में आवश्यक) 2 चरणीय प्रक्रिया में पहला चरण होती है।

इसके बाद उक्त पुलिस स्टेशन उक्त ज़ीरो ऐफ़.आई.आर. को उस पुलिस स्टेशन को अग्रेषित करेगा, जिसके पास उस पर क्षेत्राधिकार है, और बाद वाला पुलिस स्टेशन इसे अपने ऐफ़.आई.आर. रजिस्टर, शिकायतों के रजिस्टर और अपनी दैनिक डायरी में दर्ज़ करेगा।

ज़ीरो प्राथमिकियों की व्यवस्था उस समय भी मौजूद थी, जब दंड प्रक्रिया संहिता (1973) लागू थी, इस तथ्य के बावजूद कि ऐसी ऐफ़.आई.आर. के पंजीकरण के संबंध में सीआरपीसी में कोई प्रावधान-विशेष नहीं था। बीएनएसएस (भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता) को 25 दिसंबर 2023 को भारत के राजपत्र में अधिसूचित किया गया था, और यह 1 जुलाई, 2024 से लागू हो गया था। अब, बीएनएसएस की धारा 173 (1) [29] ज़ीरो ऐफ़.आई.आर. के लिए कानूनी आधार प्रदान करती है। इसमें कहा गया है कि "किसी संज्ञेय अपराध के घटित होने से संबंधित प्रत्येक सूचना, चाहे वह किसी भी क्षेत्र में घटित हुआ हो, मौखिक रूप से या इलेक्ट्रॉनिक संचार के माध्यम से दी जा सकती है..."।


भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता – धारा 173(1)पृष्ठ शीर्षभाग  
(source: delhipolice.gov.in)

173 – संज्ञेय मामलों में सूचना
(1) संज्ञेय अपराध के किए जाने से संबंधित प्रत्येक सूचना, उस क्षेत्र पर विचार किए बिना जहाँ अपराध किया गया है, मौखिक रूप से या इलैकट्रानिक संसूचना द्वारा पुलिस थाने के भारसाधक अधिकारी को दी जा सकेगी और यदि–

(i) मौखिक रूप से दी गई है, तो उसके द्वारा या उसके निदेश के अधीन लेखबद्ध की जाएगी और सूचना देने वाले को पढ़कर सुनाई जाएगी और प्रत्येक ऐसी सूचना पर, चाहे वह लिखित रूप में दी गई हो या पूर्वोक्त रूप में लेखबद्ध की गई हो, उस व्यक्ति द्वारा हस्ताक्षर किए जाएँगे ;

(ii) यदि इलैकट्रानिक संसूचना द्वारा दी गई है, तो उसे देने वाले व्यक्ति द्वारा तीन दिनों के भीतर हस्ताक्षरित किए जाने पर उस के द्वारा अभिलेख पर ली जाएगी, और उसका सार ऐसी पुस्तक में, जो उस अधिकारी द्वारा ऐसे रूप में रखी जाएगी, जिसे राज्य सरकार, इस निमित्त नियमों द्वारा निहित करे, प्रविष्ट किया जाएगा :

परंतु यदि किसी महिला द्वारा, जिसके विरुद्ध भारतीय न्याय संहिता, 2023 की धारा 64, धारा 65, धारा 66, धारा 67, धारा 68, धारा 69, धारा 70, धारा 71, धारा 74, धारा 75, धारा 76, धारा 77, धारा 78, धारा 79, या धारा 124 के अधीन किसी अपराध के किए जाने या किए जाने का प्रयत्न किए जाने का अभिकथन किया गया है, कोई सूचना दी जाती है तो ऐसी सूचना किसी महिला पुलिस अधिकारी या किसी महिला अधिकारी द्वारा अभिलिखित की जाएगी :

परंतु यह और कि–
(क) यदि वह व्यक्ति, जिसके विरुद्ध भारतीय न्याय संहिता, 2023 की धारा 64, धारा 65, धारा 66, धारा 67, धारा 68, धारा 69, धारा 70, धारा 71, धारा 74, धारा 75, धारा 76, धारा 77, धारा 78, धारा 79 या धारा 124** के अधीन किसी अपराध के किए जाने का या किए जाने का प्रयत्न किए जाने का अभिकथन किया गया है, अस्थायी या स्थायी रूप से मानसिक या शारीरिक रूप से दिव्यांग है, ऐसी सूचना किसी पुलिस अधिकारी द्वारा उस व्यक्ति के, जो ऐसे अपराध की रिपोर्ट करने की वांछा करता है, निवास स्थान या उस अपराध की रिपोर्ट होने की बाधा स्थित, निवास-स्थान पर या उस व्यक्ति के विकल्प के किसी सुगम स्थान पर, यथास्थिति, किसी द्विभाषिए या किसी विशेष शिक्षक की उपस्थिति में अभिलिखित की जाएगी ;

(ख) ऐसी सूचना के अभिलेखन की वीडियो फ़िल्म तैयार की जाएगी;

(ग) पुलिस अधिकारी धारा 183 की उपधारा (6) के खंड (क) के अधीन किसी मजिस्ट्रेट द्वारा उस व्यक्ति का कथन यथासंभवशीघ्र अभिलिखित कराएगा।




संदर्भ सूची :

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29) भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता; delhipolice.gov.in; दिल्ली; बिना तिथि; २१ जून २०२५ को देखा गया






द्वारा लिखित
मनीष उदार द्वारा प्रकाशित।

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अंतिम अद्यतन ०५ जुलाई २०२५ को किया गया