एक प्राथमिकी को किसी अपराध-विशेष का विश्वकोश होने की ज़रुरत नहीं है

An FIR is Not Required to be the Encyclopaedia of a Crime
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प्राथमिकी को अपराध का विश्वकोश होने की ज़रुरत नहीं है

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किसी प्राथमिकी से अपराध का (एक) विश्वकोश होने की उम्मीद नहीं की जा सकती है। इस रुख का समर्थन सुप्रीम कोर्ट ने भी किया है (नीचे देखें)। सुप्रीम कोर्ट का यह रुख आपराधिक मामलों में प्रथम सूचना रिपोर्ट के चरण के बाद नए अहम तथ्यों को शामिल करने की गुंजाइश पैदा करता है, और "द्वितीय सूचना रिपोर्ट" की भी (इस विषय को इस लेख में भी कवर किया गया है)। साथ ही जैसा कि इस लेख में उल्लेख किया गया है यह भी सच है कि सभी अहम तथ्यों और परिस्थितियों को प्राथमिकी में दर्ज़ किया जाना चाहिए, क्योंकि प्राथमिकी के बाद नए अहम तथ्यों को शामिल करना विरोधाभासी संस्करण बनाने के बराबर है। ये दोनों रुख / कथन परस्पर विरोधाभासी प्रतीत होते हैं, और इस लेखक को लगता है कि आपके दहेज़ मामले में भी कुछ ऐसा ही होने की संभावना है। आपके अदालती मामले में इसके परिणामस्वरुप विरोधाभासी प्रतीत होने वाली सूरत-ए-हाल पर निर्णय लेना न्यायालय का काम है।


सर्वोच्च न्यायालय के ऐसे निर्णय जिन में घोषित किया गया है कि प्राथमिकी को अपराध का विश्वकोश होने की आवश्यकता नहीं है

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सर्वोच्च न्यायालय के ऐसे कई निर्णय हैं जिनमें माना गया है कि किसी प्राथमिकी को अपराध का (एक) विश्वकोश होने की आवश्यकता नहीं है। ऐसे कुछ निर्णयों [14][15][16][17] के प्रासंगिक अंश यहाँ पुन: प्रस्तुत किए गए हैं–


आशाबाई मच्छिंद्र अधागले बनाम महाराष्ट्र राज्य एवं अन्य

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आशाबाई मच्छिंद्र अधागले बनाम महाराष्ट्र राज्य एवं अन्य नामक मामले का फ़ैसला सुप्रीम कोर्ट की पूर्ण पीठ ने निर्णीत किया था। उक्त पीठ में अरिजीत पसायत, मुकुंदकम शर्मा और एच.एल. दत्तू शामिल थे। यह एक बहुत ही महत्वपूर्ण निर्णय है, क्योंकि इसे एक पूर्ण पीठ ने पारित किया था।

सुप्रीम कोर्ट
समतुल्य उद्धरण: (2009) 3 SCC 789;
आशाबाई मच्छिन्द्र अधागले बनाम महाराष्ट्र राज्य एवं अन्य
फ़ैसले की तारीख: 12/02/2009
भारत के सर्वोच्च न्यायालय की पूर्ण पीठ द्वारा निर्णीत
पसायत, ए. (J)
शर्मा, एम. (J)
दत्तू, एच.एल. (J)

निर्धारित हुआ (निर्णय के 14वें अनुच्छेद में):
"इस बात को दोहराने की कोई आवश्यकता नहीं है कि ऐफ़आईआर से एक विश्वकोश होने की अपेक्षा नहीं की जाती है। जैसा कि अपीलकर्ता के विद्वान वकील ने सही तर्क दिया है, आरोपी अनुसूचित जाति या अनुसूचित जनजाति से है या नहीं है, इस विषय का विश्लेषण तब किया जा सकता है जब मामले की जांच की जा रही हो।"


सुरजीत सिंह उर्फ़ गुरमीत सिंह बनाम पंजाब राज्य

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सुरजीत सिंह उर्फ़ गुरमीत सिंह बनाम पंजाब राज्य सर्वोच्च न्यायालय का एक अन्य निर्णय है जिसमें उक्त सूत्रीकरण निहित है।

सर्वोच्च न्यायालय
समतुल्य उद्धरण: 1992 AIR 1389; 1992 SCR (2) 786;
सुरजीत सिंह उर्फ़ गुरमीत सिंह बनाम पंजाब राज्य
निर्णय की तिथि: 28/04/1992
भारत के सर्वोच्च न्यायालय की एक खंडपीठ द्वारा निर्णीत
पुंच्छी, एम.एम. (J)
जीवन रेड्डी, बी.पी. (J)

निर्धारित हुआ (निर्णय के 9वें अनुच्छेद में):
"...इस स्थिति में प्रथम सूचना रिपोर्ट में समाविष्ट चलाई गई गोलियों की संख्या से सम्बंधित और तलजीत सिंह की चोटों की अनुपस्थिति से सम्बंधित या अपीलकर्ता को सैन्य व्यक्ति नहीं बताये जाने वाली चूकें / वाले गलत विवरण कम महत्वपूर्ण हो जाते हैं। प्रथम सूचना रिपोर्ट पूरे मामले का विश्वकोश नहीं है और यह एक ठोस सबूत भी नहीं है। इसमें कोई संदेह नहीं है कि इसका महत्व है, लेकिन केवल निर्माता की पुष्टि या खंडन करने के प्रयोजन हेतु। यहाँ निर्माता एक युवा महिला थी जिसने अपनी आँखों के सामने अपने पति को खो दिया था। प्रथम सूचना रिपोर्ट –जो घटना के तीन घंटे के भीतर बहुत फ़ुर्ती से दर्ज़ करवाई गई थी– में इन विवरणों से सम्बद्ध कोई चूक या गलत विवरण, अभियोजन पक्ष के तर्क-वृन्द, या अपीलकर्ता की अपराध में भागीदारी के संबंध में दिए गए प्रत्यक्षदर्शियों के बयानों पर कोई प्रभाव नहीं डालेगा। ..."


मनोज @ भाऊ एवं अन्य बनाम महाराष्ट्र राज्य

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मनोज @* भाऊ एवं अन्य बनाम महाराष्ट्र राज्य  हत्या के एक मामले में एक छोटे से पेंच के साथ दायर करी गयी आपराधिक अपील से संबंधित है, । पेंच यह था कि यह अपील राज्य द्वारा प्रेषित की जा रही थी। निर्णय ने सभी पक्षों को इस मामूली सी हद तक मिश्रित परिणाम दिए, कि इसे केवल आंशिक रूप से ही स्वीकार किया गया था।

(टिप्पणी *) @ = उर्फ़

सर्वोच्च न्यायालय
समतुल्य उद्धरण: AIR 1999 SC 1620;
मनोज @ भाऊ एवं अन्य बनाम महाराष्ट्र राज्य
निर्णय की तिथि: 08/04/1999
भारत के सर्वोच्च न्यायालय की एक खंडपीठ द्वारा निर्णीत
पट्टनायक, जी.बी. (J)
शाह, एम.बी. (J)

निर्धारित हुआ (निर्णय के 4थे अनुच्छेद में):
"...बहस के दौरान विद्वान वरिष्ठ वकील श्री ललित ने आग्रह किया कि प्रथम सूचना रिपोर्ट काफ़ी हद तक अधूरी है और घटना का स्पष्ट विवरण उसमें नहीं दिया गया है। लेकिन यह बात पूरी तरह से स्थापित है कि प्रथम सूचना रिपोर्ट को साक्ष्यों का विश्वकोश होने की आवश्यकता नहीं है और (उस में) जो कहा जाना अनिवार्य होता है वह अभियोजन पक्ष का मुख्य दावा होता है। इस दृष्टिकोण से समझा जाए तो PW1 (अभियोजन पक्ष साक्षी संख्या 1) द्वारा दी गई प्रथम सूचना रिपोर्ट ((इस सन्दर्भ में) अर्थात उस के द्वारा प्रेषित पहली इत्तिला) के संबंध में कोई शिकायत नहीं करी जा सकती है।"


पुलिस अधीक्षक, सीबीआई एवं अन्य बनाम तपन कुमार सिंह

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वर्तमान अनुभाग में हम जिस अवधारणा की चर्चा कर रहे हैं, उसका विस्तृत विवरण पुलिस अधीक्षक, सीबीआई एवं अन्य बनाम तपन कुमार सिंह के 24वें अनुच्छेद में उपलब्ध है।

सर्वोच्च न्यायालय
समतुल्य उद्धरण: (2003) 6 SCC 175; 2003 Cri LJ 2322;
पुलिस अधीक्षक, सीबीआई एवं अन्य बनाम तपन कुमार सिंह
निर्णय तिथि: 10/04/2003
भारत के सर्वोच्च न्यायालय की एक खंडपीठ द्वारा निर्णीत
हेगड़े, एन.एस. (J)
सिंह, बी.पी. (J)

निर्धारित हुआ (निर्णय के 24वें अनुच्छेद में):
"यह सर्वविदित है कि प्रथम सूचना रिपोर्ट कोई विश्वकोश नहीं है, जिसमें रिपोर्ट किए गए अपराध से संबंधित सभी तथ्य और विवरण प्रकट किए जाने ज़रूरी हैं।" (प्रमुखता आपूर्तित)

साथ ही निर्धारित हुआ (निर्णय के 24वें अनुच्छेद में ही):
"इस चरण पर यह पर्याप्त है कि पुलिस अधिकारी दी गई सूचना के आधार पर किसी संज्ञेय अपराध के हुए जाने का संदेह करता है, न कि यह कि उसे इस बात का यकीन हो वह संतुष्ट हो कि कोई संज्ञेय अपराध किया गया है। यदि उसके पास प्राप्त सूचना के आधार पर यह संदेह करने के कारण हैं कि कोई संज्ञेय अपराध किया गया है, तो वह सूचना को दर्ज़ करने और एक जांच करने को बाध्य है।"

साथ ही निर्धारित हुआ (निर्णय के 24वें अनुच्छेद में ही):
"वास्तविक परीक्षण यह है कि क्या प्रेषित सूचना किसी अपराध के हुए जाने का संदेह करने का कारण प्रदान करती है, जिसकी जांच करने के लिए संबंधित पुलिस अधिकारी (आपराधिक प्रक्रिया) संहिता की धारा 156 के तहत अधिकृत है। यदि ऐसा है, तो उसके पास सूचना को रिकॉर्ड करने और या तो स्वयं मामले की जांच करने या फिर किसी अन्य सक्षम अधिकारी को जांच करने के लिए नियुक्त करने के अलावा कोई विकल्प नहीं है।" (प्रमुखता आपूर्तित)



संदर्भ सूची :

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14)Ashabai Machindra Adhagale vs State of Maharashtra & Others on 12 February, 2009; Indiankanoon.org; Delhi; Undated; Retrieved on 13th May 2021

15)Surjit Singh alias Gurmit Singh vs State of Punjab on 28 April, 1992; Indiankanoon.org; Delhi; Undated; Retrieved on 13th May 2021

16)Manoj @ Bhau & Others vs State of Maharashtra on 8 April, 1999; Indiankanoon.org; Delhi; Undated; Retrieved on 15th May 2021

17)Superintendent Of Police, C.B.I. and Others vs Tapan Kumar Singh on 10 April, 2003; Indiankanoon.org; Delhi; Undated; Retrieved on 15th May 2021






द्वारा लिखित
मनीष उदार द्वारा प्रकाशित।

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अंतिम अद्यतन १२ जुलाई २०२५ को किया गया